मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ६५६ | * मत्स्यपुराण * |
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एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय
पार्वतीद्वारा वीरकको शाप, ब्रह्माका पार्वती तथा एकानंशाको वरदान, एकानंशाका विन्ध्याचलके लिये प्रस्थान, पार्वतीका भवनद्वारपर पहुँचना और वीरकद्वारा रोका जाना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| देव्युवाच<br>मातरं मां परित्यज्य यस्मात् त्वं स्नेहविकलवात्।<br>विहितावसरैः स्त्रीणां शंकरस्य रहोविधौ॥ १<br>तस्मात् ते परुषा रूक्षा जडा हृदयवर्जिता।<br>गणेश क्षारसदृशी शिला माता भविष्यति॥ २<br>निमित्तमेतद् विख्यातं वीरकस्य शिलोदये।<br>सोऽभवत् प्रक्रमेणैव विचित्राख्यानसंश्रयः॥ ३<br>एवमुत्सृष्टशापाया गिरिपुत्र्यास्त्वनन्तरम्।<br>निर्जगाम मुखात् क्रोधः सिंहरूपी महाबलः॥ ४<br>स तु सिंहः करालास्यो जटाजटिलकन्धरः।<br>प्रोद्धूतलम्बलाङ्गूलो दंष्ट्रोत्कटमुखाटटः॥ ५<br>व्यावृत्तास्यो ललज्जिह्वः क्षामकुक्षिश्चिखादिषुः।<br>तस्याशु वर्तितुं देवी व्यवस्यत सती तदा॥ ६<br>ज्ञात्वा मनोगतं तस्या भगवांश्चतुराननः।<br>आजगामाश्रमपदं सम्पदामाश्रयं तदा।<br>आगम्योवाच देवेशो गिरिजां स्पष्टया गिरा॥ ७ | देवीने कहा—गणेश्वर वीरक! चूँकि तुमने मुझ माताका परित्याग कर स्नेहसे विकल हो शंकरजीके एकान्तमें अन्य स्त्रियोंको प्रवेश करनेका अवसर दिया है, इसलिये अत्यन्त कठोर, स्नेहहीन, मूर्ख, हृदयरहित एवं राख-सदृशी रूखी शिला तुम्हारी माता होगी। वीरकका शिलासे उत्पन्न होनेमें यही कारण विख्यात है। आगे चलकर वही शाप क्रमशः विचित्र कथाओंका आश्रयस्थान बन गया। इस प्रकार पार्वतीके शाप दे देनेके पश्चात् क्रोध उनके मुखसे महाबली सिंहके रूपमें बाहर निकला। उस सिंहका मुख विकराल था, उसका कंधा जटाओंसे आच्छादित था, उसकी लम्बी पूँछ ऊपर उठी हुई थी, उसके मुखके दोनों किनारे भयंकर दाढ़ोंसे युक्त थे, वह मुख फैलाये हुए जीभ लपलपा रहा था, उसकी कुक्षि दुबली-पतली थी और वह किसीको खा जानेकी टोहमें था। यह देखकर पार्वतीदेवी शीघ्र ही उसपर आरूढ़ होनेकी चेष्टा करने लगीं। तब उनके मनोगत भावको जानकर भगवान् ब्रह्मा उस आश्रमस्थानपर आये जो सभी सम्पदाओंका आश्रयस्थान था। वहाँ आकर देवेश्वर ब्रह्मा गिरिजासे स्पष्ट वाणीमें बोले॥ १—७॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>किं पुत्रि प्राप्तुकामासि किमलभ्यं ददामि ते।<br>विरम्यतामतिक्लेशात्तपसोऽस्मान्मदाज्ञया॥ ८<br><br>तच्छ्रुत्वोवाच गिरिजा गुरुं गौरवगर्भितम्।<br>वाक्यं वाचा विरोद्गीर्णवर्णनिर्णीतवाञ्छितम्॥ ९ | ब्रह्माने कहा—पुत्रि! अब तुम मेरी आज्ञा मानकर इस अत्यन्त कष्टकर तपस्यासे विरत हो जाओ। बताओ, तुम क्या प्राप्त करना चाहती हो? मैं तुम्हें कौन-सी दुर्लभ वस्तु प्रदान करूँ? वह सुनकर गिरिजाने गौरवस्पद गुरुजन ब्रह्मासे अपने चिरकालसे निर्णीत मनोरथको स्पष्टाक्षरोंसे युक्त वाणीद्वारा व्यक्त करते हुए कहा॥ ८—९॥ |
| देव्युवाच<br>तपसा दुष्करेणाप्तः पतित्वे शङ्करो मया।<br>स मां श्यामलवर्णेति बहुशः प्रोक्तवान् भवः॥ १०<br>स्यामहं काञ्चनाकारा वाल्लभ्येन च संयुता।<br>भर्तुर्भूतपतेरङ्गेमेकतो निविशेऽङ्गवत्॥ ११ | देवी बोलीं—प्रभो! मैंने कठोर तपस्याके फलस्वरूप शंकरजीको पतिरूपमें प्राप्त किया है, किंतु वे मुझे बहुधा 'श्यामवर्णा—काले रंगकी' कहकर अपमानित करते रहते हैं। अतः मैं चाहती हूँ कि मेरा वर्ण सुवर्ण-सा गौर हो जाय, मैं उनकी परम वल्लभा बन जाऊँ और अपने भूतनाथ पतिदेवके शरीरमें एक ओर उन्हींके अङ्गकी तरह प्रविष्ट हो जाऊँ। |