भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 665
* अध्याय १५६ *६५५

| इत्युक्तो दानवेन्द्रस्तु तदाभाषत् स्मयञ्शनैः।<br>न चाबुध्यदभिज्ञानं प्रायस्त्रिपुरघातिनः॥ ३१<br><br>देव्युवाच<br>यातास्म्यहं तपश्चर्तुं वाल्लभ्याय तवातुलम्।<br>रतिश्च तत्र मे नाभूत्ततः प्राप्ता त्वदन्तिकम्॥ ३२<br><br>इत्युक्तः शङ्करः शङ्कां कांचिप्राप्यावधारयत्।<br>हृदयेन समाधाय देवः प्रहसिताननः॥ ३३<br><br>कुपिता मयि तन्वङ्गि प्रकृत्या च दृढव्रता।<br>अप्राप्तकामा सम्प्राप्ता किमेतत्संशयो मम॥ ३४<br><br>इति चिन्त्य हरस्तस्या अभिज्ञानं विधारयन्।<br>नापश्यद्वामपार्श्वे तु तदङ्गे पद्मलक्षणम्॥ ३५<br><br>लोमावर्तं तु रचितं ततो देवः पिनाकधृक्।<br>अबुध्यद्दानवीं मायामाकारं गूहयंस्ततः॥ ३६<br><br>मेढ्रे वज्रास्त्रमादाय दानवं तमसूदयत्।<br>अबुध्यद्वीरको नैव दानवेन्द्रं निषूदितम्॥ ३७<br><br>हरेण सूदितं दृष्ट्वा स्त्रीरूपं दानवेश्वरम्।<br>अपरिच्छिन्नतत्त्वार्था शैलपुत्र्यै न्यवेदयत्॥ ३८<br><br>दूतेन मारुतेनाशुगामिना नगदेवता।<br>श्रुत्वा वायुमुखाद्देवी क्रोधरक्तविलोचना।<br>अशपद्वीरकं पुत्रं हृदयेन विदूयता॥ ३९ | इस प्रकार कहे जानेपर दानवेन्द्र आडि मुसकराते हुए धीरे-धीरे बोला। वह त्रिपुरहन्ता शंकरजीद्वारा पार्वतीके शरीरमें लक्षित किये गये चिह्नको प्रायः नहीं जानता था॥ २७—३१॥<br><br>देवी (रूपधारी आडि)-ने कहा—'पतिदेव! आपके अतुलनीय पति-प्रेमकी प्राप्तिके अभिप्रायसे मैं तपस्या करने गयी थी, किंतु उसमें मेरा मन नहीं लगा, अतः पुनः आपके निकट लौट आयी हूँ। उसके ऐसा कहनेपर शंकरजीके मनमें कुछ शङ्का उत्पन्न हो गयी, परंतु उसे उन्होंने हृदयमें ही समाधान करके छिपा लिया। फिर वे मुसकराते हुए बोले—'सूक्ष्माङ्गि! तुम तो मुझपर कुपित होकर तपस्या करने गयी थी न? साथ ही तुम स्वभावसे ही सुदृढ़ प्रतिज्ञावाली हो, फिर बिना मनोरथ सिद्ध किये लौट आयी हो, यह क्या बात है? इससे तो मुझे संदेह हो रहा है।' ऐसा विचारकर शंकरजी पार्वतीके उस लक्षणका स्मरण करने लगे, जिसे उन्होंने पार्वतीके शरीरके बायें भागमें बालोंको घुमाकर पद्मके रूपमें बनाया था, परंतु वह उन्हें दिखायी न पड़ा।* तब पिनाकधारी महादेवने समझ लिया कि यह दानवी माया है। फिर तो उन्होंने अपने आकारको छिपाते हुए जननेन्द्रियमें वज्रास्त्रको अभिमन्त्रित करके उस दैत्यको मार डाला। इस प्रकार मारे गये दानवेन्द्र आडिकी बात वीरकको नहीं ज्ञात हुई। उधर इसके यथार्थ तत्त्वको न जाननेवाली हिमाचलकी देवता कुसुमामोदिनीने शंकरजीद्वारा स्त्रीरूपधारी दानवेश्वरको मारा गया देखकर अपने शीघ्रगामी दूत वायुद्वारा पार्वतीको इसकी सूचना भेज दी। वायुके मुखसे वह संदेश सुनकर पार्वती देवीके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। तब वे दुःखी हृदयसे अपने पुत्र वीरकको शाप देते हुए बोलीं॥ ३२—३९॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे कुमारसम्भवे आडिवधो नाम षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १५६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके कुमारसम्भव-प्रसङ्गमें आडिवध नामक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १५६॥


* यह महा-सौभाग्यजनक चिह्न है। भगवान् विष्णु तथा अन्य भाग्यशालियोंके शरीरमें ऐसा चिह्न श्रीवत्स नामसे प्रसिद्ध है।