मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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६५४ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत मूल (श्लोक) | हिन्दी अनुवाद |
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| ब्रह्मोवाच<br>न कश्चिच्च विना मृत्युं नरो दानव विद्यते।<br>यतस्ततोऽपि दैत्येन्द्र मृत्युः प्राप्यः शरीरिणा ॥ १७<br>इत्युक्तो दैत्यसिंहस्तु प्रोवाचाम्बुजसम्भवम्।<br>रूपस्य परिवर्तो मे यदा स्यात्पद्मसम्भव ॥ १८<br>तदा मृत्युर्मम भवेद्न्यथा त्वमरो ह्यहम्।<br>इत्युक्तस्तु तदोवाच तुष्टः कमलसम्भवः ॥ १९<br>यदा द्वितीयो रूपस्य विवर्तस्ते भविष्यति।<br>तदा ते भविता मृत्युरन्यथा न भविष्यति ॥ २०<br>इत्युक्तोऽमरतां मेने दैत्यसूनुर्महाबलः।<br>तस्मिन् काले तु संस्मृत्य तद्वधोपायमात्मनः ॥ २१<br>परिहर्त्तुं दृष्टिपथं वीरकस्याभवत्तदा।<br>भुजङ्गरूपी रन्ध्रेण प्रविवेश दृशः पथम् ॥ २२<br>परिहृत्य गणेशस्य दानवोऽसौ सुदुर्जयः।<br>अलक्षितो गणेशेन प्रविष्टोऽथ पुरान्तकम् ॥ २३<br>भुजङ्गरूपं संत्यज्य बभूवाथ महासुरः।<br>उमारूपी च्छलयितुं गिरिशं मूढचेतनः ॥ २४<br>कृत्वा मायां ततो रूपमप्रतर्क्यमनोहरम्।<br>सर्वावयवसम्पूर्णं सर्वाभिज्ञानसंवृतम् ॥ २५<br>कृत्वा मुखान्तरे दन्तान् दैत्यो वज्रोपमान् दृढान्।<br>तीक्ष्णाग्रान् बुद्धिमोहेन गिरिशं हन्तुमुद्यतः ॥ २६ | तब ब्रह्मा ने कहा था—'दानव! इस सृष्टिमें कोई भी मनुष्य मृत्युसे रहित नहीं है। दैत्येन्द्र! शरीरधारीको किसी-न-किसी प्रकारसे मृत्यु प्राप्त होती ही है। ऐसा कहे जानेपर दैत्यसिंह आदिने पद्मयोनि ब्रह्मासे कहा था—'पद्मसम्भव! जब मेरे रूपका परिवर्तन हो जाय तभी मेरी मृत्यु हो, अन्यथा मैं अमर बना रहूँ।' उसके द्वारा ऐसा कहे जानेपर उस समय कमलयोनि ब्रह्माने प्रसन्न होकर उससे कहा था कि 'ठीक है, जब तुम्हारे रूपका दूसरा परिवर्तन होगा, तभी तुम्हारी मृत्यु होगी, अन्यथा नहीं होगी।' ब्रह्माद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वह महाबली दैत्यपुत्र आदि अपनेको अमर मानने लगा। उस समय उसने अपनी मृत्युके उस उपायका स्मरणकर वीरकके दृष्टिमार्गको बचानेके लिये सर्पका रूप धारण कर लिया और एक बिलमें प्रविष्ट हो गया। फिर वह परम दुर्जय दानव गणेश्वर वीरकके दृष्टिपथको बचाकर उनसे अलक्षितरूपसे भगवान् शंकरके पास पहुँच गया। तदनन्तर उस मोहित चित्तवाले महासुर आदिने शंकरजीको छलनेके लिये सर्पका रूप त्यागकर उमाका रूप धारण कर लिया। उसने मायाका आश्रय लेकर पार्वतीके ऐसे अकल्पनीय एवं मनोहर रूपका निर्माण किया था, जो सभी अवयवोंसे परिपूर्ण तथा सभी लक्षणोंसे युक्त था। फिर वह दैत्य मुखके भीतर वज्रके समान सुदृढ़ और तीखे अग्रभागवाले दाँतोंका निर्माण कर मूर्खतावश शंकरजीका वध करनेके लिये उद्यत हुआ॥ १७–२६॥ |
| कृत्वोमारूपसंस्थानं गतो दैत्यो हरान्तिकम्।<br>पापो रम्याकृतिश्चित्रभूषणाम्बरभूषितः ॥ २७ | तदनन्तर वह पापी दैत्य सुन्दर रूप एवं चित्र-विचित्र आभूषणों और वस्त्रोंसे विभूषित हो उमाका रूप धारण कर शंकरजीके निकट गया। |
| तं दृष्ट्वा गिरिशस्तुष्टस्तदाऽऽलिङ्ग्य महासुरम्।<br>मन्यमानो गिरिसुतां सर्वैरवयवान्तरैः ॥ २८ | उसे देखकर भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये। तब उन्होंने उस महासुरको सभी अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसे पार्वती मानते हुए उसका आलिङ्गन करके पूछा— |
| अपृच्छत् साधु ते भावो गिरिपुत्रि न कृत्रिमः।<br>या त्वं मदाशयं ज्ञात्वा प्राप्तेह वरवर्णिनि ॥ २९<br>त्वया विरहितं शून्यं मन्यमानो जगत्त्रयम्।<br>प्राप्ता प्रसन्नवदना युक्तमेवंविधं त्वयि ॥ ३० | 'गिरिजे! अब तो मेरे प्रति तुम्हारा भाव उत्तम है न? बनावटी तो नहीं है? सुन्दरि! (ऐसा प्रतीत होता है कि) तुम मेरे अभिप्रायको जानकर ही यहाँ आयी हो; क्योंकि तुम्हारे बिना मैं त्रिलोकीको सूना-सा मान रहा था। अब जो तुम प्रसन्नतापूर्वक यहाँ आ गयी हो, तुम्हारे लिये ऐसा करना उचित ही है।' |