भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 663
* अध्याय १५६ *६५३
सा चास्यै सर्वमाचख्यौ शंकरात्कोपकारणम्।<br>पुनश्चोवाच गिरिजा देवतां मातृसम्मताम्॥ ३<br><br>उमोवाच<br><br>नित्यं शैलाधिराजस्य देवता त्वमनिन्दिते।<br>सर्वतः संनिधानं ते मम चातीव वत्सला॥ ४<br><br>अतस्तु ते प्रवक्ष्यामि यद्विधेयं तदा धिया।<br>अन्यस्त्रीसम्प्रवेशस्तु त्वया रक्ष्यः प्रयत्नतः॥ ५<br><br>रहस्यत्र प्रयत्नेन चेतसा सततं गिरौ।<br>पिनाकिनः प्रविष्टायां वक्तव्यं मे त्वयानघे॥ ६<br><br>ततोऽहं संविधास्यामि यत्कृत्यं तदनन्तरम्।<br>इत्युक्ता सा तथेत्युक्त्वा जगाम स्वगिरिं शुभम्॥ ७<br><br>उमापि पितुरुद्यानं जगामाद्रिसुता द्रुतम्।<br>अन्तरिक्षं समाविश्य मेघमालामिव प्रभा॥ ८<br><br>ततो विभूषणान्यस्य वृक्षवल्कलधारिणी।<br>ग्रीष्मे पञ्चाग्निसंतप्ता वर्षासु च जलोषिता॥ ९<br><br>वन्याहारा निराहारा शुष्का स्थण्डिलशायिनी।<br>एवं साधयती तत्र तपसा संव्यवस्थिता॥ १०हो?'' तत्पश्चात् गिरिजाने उन देवीसे शंकरजीके प्रति उत्पन्न हुए अपने क्रोधके सारे कारणोंका वर्णन किया और फिर मातृ-तुल्य हितैषिणी देवतासे इस प्रकार कहा॥ १—३॥<br><br>उमा बोलीं—'अनिन्दिते! आप मेरे पिता पर्वतराज हिमाचलकी देवता हैं, अतः आपका यहाँ नित्य निवास है। साथ ही मुझपर भी आपका अत्यन्त स्नेह है, इसलिये इस समय जो कार्य करना है उसे मैं आपके ध्यानमें ला रही हूँ। आपको इस पर्वतपर सावधान चित्तसे निरन्तर प्रयत्नपूर्वक ऐसी देखभाल करनी चाहिये कि यहाँ शिवजीके पास एकान्तमें कोई अन्य स्त्री प्रवेश न करने पाये। अनघे! यदि कोई स्त्री शंकरजीके पास प्रवेश करती है तो आपको मुझे तुरंत उसकी सूचना देनी चाहिये। उसके बाद जो कुछ करना होगा, उसका विधान मैं कर लूँगी। ऐसा कहे जानेपर वे 'तथेति'—ऐसा ही करूँगी' यों कहकर अपने मङ्गलमय पर्वतकी ओर चली गयीं। इधर गिरिराजकुमारी उमा भी तुरंत ही मेघसमूहमें चमकती हुई बिजलीकी तरह आकाशमार्गसे अपने पिताके उद्यानमें जा पहुँची। वहाँ उन्होंने आभूषणोंका परित्याग कर वृक्षोंका वल्कल धारण कर लिया। वे ग्रीष्म-ऋतुमें पञ्चाग्नि तपती थीं, वर्षा-ऋतुमें जलमें निवास करती थीं और जाड़ेमें शुष्क बंजरभूमिपर शयन करती थीं। वनके फल-मूल ही उनके आहार थे तथा वे कभी-कभी निराहार ही रह जाती थीं। इस प्रकार साधना करती हुई वे वहाँ तपस्यामें संलग्न हो गयीं॥ ४—१०॥
ज्ञात्वा तु तां गिरिसुतां दैत्यस्तत्रान्तरे बली।<br>अन्धकस्य सुतो दृप्तः पितुर्वधमनुस्मरन्॥ ११<br><br>देवान् सर्वान् विजित्याजौ बकभ्राता रणोत्कटः।<br>आडिर्नामान्तरप्रेक्षी सततं चन्द्रमौलिनः॥ १२<br><br>आजगामामररिपुः पुरं त्रिपुरघातिनः।<br>स तत्रागत्य ददृशे वीरकं द्वार्यवस्थितम्॥ १३<br><br>विचिन्त्यासीद्वरं दत्तं स पुरा पद्मजन्मना।<br>हते तदान्धके दैत्ये गिरिशेनामरद्विषि॥ १४<br><br>आडिश्चकार विपुलं तपः परमदारुणम्।<br>तमागत्याब्रवीद् ब्रह्मा तपसा परितोषितः॥ १५<br><br>किमाडे दानवश्रेष्ठ तपसा प्राप्तुमिच्छसि।<br>ब्रह्माणमाह दैत्यस्तु निर्मृत्यृत्वमहं वृणे॥ १६इसी बीच अन्धकासुरका पुत्र एवं बकासुरका भ्राता आडि नामक दैत्य जो बलवान्, घमंडी, रणमें दुःसह, देवताओंका शत्रु और निरन्तर शंकरजीके छिद्रान्वेषणमें निरत रहनेवाला था, पार्वतीको तपस्यामें संलग्न जानकर अपने पिताके वधका अनुस्मरण करते हुए युद्धस्थलमें सभी देवताओंको पराजित कर त्रिपुरहन्ता शंकरजीके नगरमें आ धमका। वहाँ आकर उसने वीरकको द्वारपर स्थित देखा। तब वह पूर्वकालमें ब्रह्माद्वारा दिये गये अपने वरदानके विषयमें सोच-विचार करने लगा। शंकरजीद्वारा देवद्रोही अन्धक दैत्यके मारे जानेपर आडिने बहुत दिनोंतक परम कठोर तप किया था। तब उसकी तपस्यासे संतुष्ट हो ब्रह्माने उसके निकट आकर कहा था—'दानवश्रेष्ठ आडि! तुम तपस्याद्वारा क्या प्राप्त करना चाहते हो?' तब उस दैत्यने ब्रह्मासे कहा था—'प्रभो! मैं अमरताका वरदान चाहता हूँ'॥ ११—१६॥