मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| विष्टभ्य चरणौ देव्या वीरको बाष्पगद्गदम्।<br>प्रोवाच मातः किंन्वेतत्क्व यासि कुपितान्तरा॥ २६<br><br>अहं त्वामनुयास्यामि व्रजन्तीं स्नेहवर्जिताम्।<br>नो चेत् पतिष्ये शिखरात् तपोनिष्ठे त्वयोज्झितः॥ २७<br><br>उन्नाम्य वदनं देवी दक्षिणेन तु पाणिना।<br>उवाच वीरकं माता शोकं पुत्रक मा कृथाः॥ २८<br><br>शैलाग्रात् पतितुं नैव न चागन्तुं मया सह।<br>युक्तं ते पुत्र वक्ष्यामि येन कार्येण तच्छृणु॥ २९<br><br>कृष्णेत्युक्त्वा हरेणाहं निन्दिता चाप्यनिन्दिता।<br>साहं तपः करिष्यामि येन गौरीत्वमाप्नुयाम्॥ ३०<br><br>एष स्त्रीलम्पटो देवो यातायां मय्यनन्तरम्।<br>द्वाररक्षा त्वया कार्या नित्यं रन्ध्रान्ववेक्षिणा॥ ३१<br><br>यथा न काचित् प्रविशेद्योषिदत्र हरान्तिकम्।<br>दृष्ट्वा परां स्त्रियं चात्र वदेथा मम पुत्रक॥ ३२<br><br>शीघ्रमेव करिष्यामि यथायुक्तमनन्तरम्।<br>एवमस्त्विति देवीं स वीरकः प्राह साम्प्रतम्॥ ३३<br><br>मातुराज्ञामृताह्लादप्लाविताङ्गो गतज्वरः।<br>जगाम कक्ष्यां संद्रष्टुं प्रणिपत्य च मातरम्॥ ३४ | छोड़कर आप कहाँ जा रही हैं?' तत्पश्चात् वीरक देवीके दोनों चरणोंको पकड़कर बाष्पगद्गद वाणीमें बोला—'माँ! यह क्या हो गया ? आप क्रुद्ध होकर कहाँ जा रही हैं? तपोनिष्ठे! इस प्रकार स्नेह छोड़कर जाती हुई आपके पीछे मैं भी चलूँगा, अन्यथा आपके त्याग देनेपर मैं पर्वतशिखरसे कूदकर प्राण दे दूँगा ॥ २१–२७॥<br><br>तदनन्तर माता पार्वती अपने दाहिने हाथसे वीरकके मुखको ऊपर उठाकर बोलीं—'बेटा! शोक मत करो। तुम्हारा पर्वतशिखरसे कूदना या मेरे साथ चलना उचित नहीं है। पुत्र! मैं जिस कार्यसे जा रही हूँ, वह तुम्हें बतला रही हूँ, सुनो। मेरे अनिन्द्य होनेपर भी शंकरजीने मुझे 'कृष्णा' कहकर मेरी निन्दा की है। इसलिये अब मैं तपस्या करूँगी, जिससे गौर वर्णकी प्राप्ति कर सकूँ। मेरे चले जानेके बाद ये महादेव स्त्रीलम्पट न हो जायें, इसके लिये तुम्हें सभी छिद्रोंपर दृष्टि रखते हुए नित्य द्वारकी रक्षा करनी चाहिये, जिससे यहाँ कोई स्त्री शंकरजीके निकट प्रवेश न करने पावे। बेटा! यहाँ किसी परायी स्त्रीको देखकर मुझे तुरंत सूचित करना। फिर उसके बाद जैसा उचित होगा, मैं शीघ्र ही उपाय कर लूँगी।' इसपर वीरकने देवीसे कहा—'माँ! ऐसा ही होगा।' इस प्रकार माताकी आज्ञारूपी अमृतके आह्लादसे आप्लावित अङ्गोंवाला वीरक शोकरहित हो माताके चरणोंमें प्रणाम कर अन्तःपुरकी रखवाली करनेके लिये चला गया॥ २८–३४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे कुमारसम्भवे देव्यास्तपोऽनुगमनं नाम पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १५५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके कुमारसम्भव-प्रसङ्गमें देवीका तपके लिये अनुगमन नामक एक सौ पचपनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १५५॥
एक सौ छप्पनवाँ अध्याय
कुसुमामोदिनी और पार्वतीकी गुप्त मन्त्रणा, पार्वतीका तपस्यामें निरत होना, आडि दैत्यका पार्वतीरूपमें शंकरके पास जाना और मृत्युको प्राप्त होना तथा पार्वतीद्वारा वीरकको शाप
| सूत उवाच<br><br>देवीं सापश्यदायान्तीं सखीं मातृर्विभूषिताम्।<br>कुसुमामोदिनीं नाम तस्य शैलस्य देवताम्॥ १<br><br>सापि दृष्ट्वा गिरिसुतां स्नेहविक्लवमानसा।<br>क्व पुत्रि गच्छसीत्युच्चैरालिङ्ग्योवाच देवता॥ २ | सूतजी कहते हैं—'ऋषियो! आगे बढ़नेपर पार्वतीनै शृङ्गारसे विभूषित कुसुमामोदिनी (देवी)-को आते देखा, जो पार्वतीकी माता मेनाकी सखी और पर्वतराजकी प्रधान देवता थीं। उधर पार्वतीको देखकर कुसुमामोदिनीका भी मन स्नेहसे व्याकुल हो उठा। तब उन देवताने पार्वतीका आलिङ्गन कर उच्चस्वरसे पूछा—'बेटी! कहाँ जा रही |