मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 661, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १५५ * | ६५१ |
|---|
| विकल्पः स्वस्थचित्तेऽपि गिरिजे नैव कल्पना।<br>यद्येवं कुपिता भीरु त्वं तवाहं न वै पुनः॥ १२<br>नर्मवादी भविष्यामि जहि कोपं शुचिस्मिते।<br>शिरसा प्रणतश्चाहं रचितस्ते मयाञ्जलिः॥ १३<br>स्नेहेनावमानेन निन्दितेनैति विक्रियाम्।<br>तस्मान्न जातु रुष्टस्य नर्मस्पृष्टो जनः किल॥ १४<br>अनेकैशचाटुभिर्देवी देवेन प्रतिबोधिता।<br>कोपं तीव्रं न तत्याज सती मर्मणि घट्टिता॥ १५<br>अवष्टब्धमथास्फाल्य वासः शङ्करपाणिना।<br>विपर्यस्तालका वेगाद्यातुमैच्छत शैलजा॥ १६<br>तस्या व्रजन्त्याः कोपेन पुनराह पुरान्तकः।<br>सत्यं सर्वैरवयवैः सुतासि सदृशी पितुः॥ १७<br>हिमाचलस्य शृङ्गैस्तैर्मेघजालाकुलैर्नभः।<br>तथा दुरवगाह्योभ्यो हृदयेभ्यस्तवाशयः॥ १८<br>काठिन्याङ्कस्त्वमस्मभ्यं वनेभ्यो बहुधा गता।<br>कुटिलत्वं च वर्त्मभ्यो दुःसेव्यत्वं हिमादपि।<br>संक्रान्ति सर्वमेवैतत् तन्वङ्गि हिमभूधरात्॥ १९<br>इत्युक्ता सा पुनः प्राह गिरिशं शैलजा तदा।<br>कम्पकम्पितमूर्धा च प्रस्फुरद्दशनच्छदा॥ २०<br>उमोवाच<br>मा सर्वान् दोषदानेन निन्दान्यान् गुणिनो जनान्।<br>तवापि दुष्टसम्पर्कात्संक्रांतं सर्वमेव हि॥ २१<br>व्यालेभ्योऽधिकजिह्मात्वं भस्मना स्नेहबन्धनम्।<br>हृत्कालुष्यं शशाङ्कात्तु दुर्बोधित्वं वृषादपि॥ २२<br>तथा बहु किमुक्तेन अलं वाचा श्रमेण ते।<br>श्मशानवासात्रिर्भीस्त्वं नग्नत्वान्न तव त्रपा॥ २३<br>निर्घृणत्वं कपालित्वाद् दया ते विगता चिरम्।<br>इत्युक्त्वा मन्दिरात् तस्मान्निर्जगाम हिमाद्रिजा॥ २४<br>तस्यां व्रजन्त्यां देवेशगणैः किलकिलो ध्वनिः।<br>क्व मातर्गच्छसि त्यक्त्वा रुदन्तो धाविताः पुनः॥ २५ | गिरिजे! मेरे स्वस्थ चित्तमें भी तुम्हें विकल्पकी कल्पना नहीं करनी चाहिये। भीरु! यदि तुम इस प्रकार कुपित हो गयी हो तो अब मैं पुनः तुम्हारे साथ परिहासकी बात नहीं करूँगा। शुचिस्मिते! तुम क्रोध छोड़ दो। देखो, मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़कर सिर झुकाये हूँ। जो प्रेमयुक्त अवमानना तथा व्याजनिन्दासे क्रुद्ध हो जाता है, उस व्यक्तिके साथ कभी भी परिहासकी बात नहीं करनी चाहिये। इस प्रकार महादेवजीने अनेकों चाटुकारिताभरी बातोंसे पार्वतीको समझाया, परंतु सतीका वह उत्कट क्रोध शान्त नहीं हुआ; क्योंकि उस व्यङ्गसे उनका मर्मस्थल विद्ध हो गया था। तत्पश्चात् पार्वती शंकरजीके हाथसे पकड़े हुए अपने वस्त्रको छुड़ाकर बाल बिखेरे हुए वेगपूर्वक वहाँसे चली जानेकी चेष्टा करने लगीं। क्रोधावेशसे जानेके लिये उद्यत हुई पार्वतीसे त्रिपुरारिने पुनः कहा—‘तुम सचमुच ही सभी अवयवोंद्वारा अपने पिताके सदृश उनकी कन्या हो। जैसे हिमाचलके मेघसमूहसे व्याप्त ऊँचे शिखरोंके कारण आकाश दुर्गम्य हो जाता है, उसी तरह तुम्हारा हृदय भी दुःखगाह्य हृदयोंसे भी अत्यन्त कठोर है। तुम्हारे सभी चिह्न बहुधा वनोंकी अपेक्षा कठिनतासे परिपूर्ण हैं। तुम्हारी चालमें पहाड़ी मार्गोंसे भी बढ़कर कुटिलता है। तुम्हारा सेवन बर्फसे भी अधिक कठिन है। सूक्ष्माङ्गी पार्वती! ये सभी गुण तुम्हारे शरीरमें हिमाचलसे ही संक्रमित हुए हैं। शिवजीद्वारा इस प्रकार कही जानेपर पार्वतीका मस्तक क्रोधके कारण काँपने लगा और होंठ फड़कने लगे। तब वे पुनः शंकरजीसे बोलीं॥११—२०॥<br>उमाने कहा— भगवन्! आप अन्यान्य सभी गुणीजनोंमें दोष लगाकर उनकी निन्दा मत करें; क्योंकि आपमें भी तो सभी गुण दुष्टोंके संसर्गसे ही प्रविष्ट हुए हैं। आपमें सर्पोंके सम्पर्कसे अधिक टेढ़ापन, भस्मसे प्रेमहीनता, चन्द्रमासे हृदयकी कालिमा और वृषसे दुर्बोधता भर गयी है। आपके विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ? वह तो केवल वचनका परिश्रम ही होगा। आप श्मशानमें निवास करनेके कारण निर्भीक हो गये हैं। नग्न रहनेके कारण आपमें लज्जा रह नहीं गयी है। कपाली होनेके कारण आप निर्मम हो गये हैं और आपकी दया तो चिरकालसे नष्ट हो गयी है। ऐसा कहकर पार्वती उस भवनसे बाहर निकल गयीं। उनको इस प्रकार जाती देखकर देवेशके गण (प्रमथ) किलकारी मारकर रोते हुए उनके पीछे दौड़े और कहने लगे—‘माँ! हमलोगोंको |