मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
पृष्ठ 660, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 660
| ६५० | * मत्स्यपुराण * |
|---|
एक सौ पचपनवाँ अध्याय
भगवान् शिवद्वारा पार्वतीके वर्णपर आक्षेप, पार्वतीका वीरकको अन्तःपुरका रक्षक नियुक्त कर पुनः तपश्चर्याके लिये प्रस्थान
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शर्व उवाच<br>शरीरे मम तन्वङ्गि सिते भास्यसितद्युतिः।<br>भुजङ्गीवासिता शुद्धा संश्लिष्टा चन्दने तरौ ॥ १<br>चन्द्रातपेन सम्पृक्ता रुचिराम्बरया तथा।<br>रजनीवासिते पक्षे दृष्टिदोषं ददासि मे ॥ २<br>इत्युक्ता गिरिजा तेन मुक्तकण्ठा पिनाकिना।<br>उवाच कोपरक्ताक्षी भ्रुकुटीकुटिलानना ॥ ३ | शिवजीने (विवाहके बाद एक बार पार्वतीसे) कहा—कृशाङ्गी पार्वति! कृष्ण कान्तिसे युक्त तुम मेरे श्वेत शरीरमें लिपटनेपर चन्दन-वृक्षमें लिपटी हुई सीधी काली नागिन-जैसी दीखती हो। तुम कृष्णपक्षमें चाँदनीके पीछे काले आकाश तथा अँधेरी रात्रिकी तरह मेरी दृष्टिको दूषित कर रही हो। भगवान् शंकरद्वारा इस प्रकार कही जानेपर पार्वती उनके गलेसे अलग हो गयीं। क्रोधके कारण उनके नेत्र लाल हो गये। तब वे मुख और भौंहोंको टेढ़ी करके बोलीं॥ १—३॥ |
| देव्युवाच<br>स्वकृतेन जनः सर्वो जाड्येन परिभूयते।<br>अवश्यमर्थी प्राप्नोति खण्डनं शशिमण्डन ॥ ४<br>तपोभिर्दीर्घचरितैर्यच्च प्रार्थितवत्यहम्।<br>तस्या मे नियतस्त्वेष ह्यवमानः पदे पदे ॥ ५<br>नैवास्मि कुटिला शर्व विषमा नैव धूर्जटे।<br>सविषस्त्वं गतः ख्यातिं व्यक्तं दोषाकराश्रयः ॥ ६<br>नाहं पूष्णोऽपि दशना नेत्रे चास्मि भगस्य हि।<br>आदित्यश्च विजानाति भगवान् द्वादशात्मकः ॥ ७<br>मूर्ध्नि शूलं जनयसि स्वैर्दोषैर्मामर्धिक्षिपन्।<br>यत्त्वं मामाह कृष्णेति महाकालेति विश्रुतः ॥ ८<br>यास्याम्यहं परित्यक्त्वा चात्मानं तपसा गिरिम।<br>जीवन्त्या नास्ति मे कृत्यं धूर्तेन परिभूतया ॥ ९<br>निशम्य तस्या वचनं कोपतीक्ष्णाक्षरं भवः।<br>उवाचाधिकसम्भ्रान्तिप्रणयोन्मिश्रया गिरा ॥ १० | देवीने कहा—चन्द्रभूषण! सभी लोग अपने द्वारा की गयी मूर्खताका दुष्परिणाम भोगते हैं। स्वार्थी मनुष्य जनसमाजमें अवश्य ही अपमानित होता है। दीर्घकालिक तपस्याद्वारा मैंने जिस मनोरथकी प्रार्थना की थी, उसीके परिणामस्वरूप मुझे यह पग-पगपर तिरस्कार प्राप्त हो रहा है। जटाधारी शंकर! (आपके कथनानुसार) न तो मैं कुटिल हूँ और न विषम ही हूँ, अपितु आप स्वयं स्पष्टरूपसे विषयुक्त अर्थात् विषयी और दोषोंके समूह (अथवा चन्द्रमा)-के आश्रयरूपसे प्रसिद्ध हैं। मैं पूषाके दाँत और भगके नेत्र भी नहीं हूँ। बारह भागोंमें विभक्त भगवान् सूर्य मुझे भलीभाँति जानते हैं। अपने दोषोंद्वारा मुझपर आक्षेप करते हुए आप मेरे सिरमें पीड़ा उत्पन्न कर रहे हैं। आपने मुझे जो 'कृष्णा' नामसे सम्बोधित किया है सो आप भी तो 'महाकाल' नामसे विख्यात हैं। अतः अब मैं जीवनका मोह त्यागकर तपस्या करनेके लिये पर्वतपर जाऊँगी; क्योंकि आप-जैसे धूर्तसे अपमानित होकर जीवित रहनेसे मैं अपना कोई प्रयोजन नहीं समझ रही हूँ। तब पार्वतीके इस प्रकार क्रोधके कारण तीखे अक्षरोंसे युक्त वचनको सुनकर भगवान् शंकर अतिशय प्रेमसे सनी हुई वाणीमें इस प्रकार बोले॥ ४—१०॥ |
| शर्व उवाच<br>अगात्मजासि गिरिजे नाहं निन्दापरस्तव।<br>त्वद्भक्तिबुद्ध्या कृतवांस्तवाहं नामसंश्रयम् ॥ ११ | शंकरजीने कहा—गिरिजे! तुम पर्वतकी पुत्री हो, अतः मैं तुम्हारी निन्दा करनेपर उतारू नहीं हूँ। यह तो मैंने तुम्हारे ऊपर भक्तिपूर्ण बुद्धिसे तुम्हारे नामका कारण बतलाया है। |