भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 667, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 667
* अध्याय १५७ *६५७

| तस्यास्तद् भाषितं श्रुत्वा प्रोवाच कमलासनः।<br>एवं भव त्वं भूयश्च भर्तुर्देहार्धधारिणी॥ १२<br><br>ततस्तत्याज भृङ्गाङ्गं फुल्लनीलोत्पलत्वचम्॥ १३<br><br>त्वचा सा चाभवद् दीप्ता घण्टाहस्ता त्रिलोचना।<br>नानाभरणपूर्णाङ्गी पीतकौशेयधारिणी॥ १४<br><br>तामब्रवीत्ततो ब्रह्मा देवीं नीलाम्बुजत्विषम्।<br>निशे भूधरजादेहसम्पर्कात्त्वं ममाज्ञया॥ १५<br><br>सम्प्राप्ता कृतकृत्यत्वमेकानंशा पुरा ह्यसि।<br>य एष सिंहः प्रोद्भूतो देव्याः क्रोधाद् वरानने॥ १६<br><br>स तेऽस्तु वाहनं देवि केतौ चास्तु महाबलः।<br>गच्छ विन्ध्याचलं तत्र सुरकार्यं करिष्यसि॥ १७<br><br>पञ्चालो नाम यक्षोऽयं यक्षलक्षपदानुगः।<br>दत्तस्ते किङ्करो देवि मया मायाशतैर्युतः॥ १८<br><br>इत्युक्ता कौशिकी देवी विन्ध्यशैलं जगाम ह।<br>उमापि प्राप्तसंकल्पा जगाम गिरिशान्तिकम्॥ १९ | पार्वतीके उस कथनको सुनकर कमलासन ब्रह्माने कहा—'ठीक है, तुम ऐसी ही होकर पुनः अपने पतिदेवके शरीरके अर्धभागको धारण करनेवाली हो जाओ।' ऐसा वरदान पाकर पार्वती ने अपने भ्रमर-सरीखे काले एवं खिले हुए नीले कमलके-से नीले चमड़ेको त्याग दिया। तब उनकी त्वचा उद्दीप्त हो उठी और वे तीन नेत्रोंसे भी युक्त हो गयीं। तदुपरान्त उन्होंने अपने शरीरको नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित कर पीले रंगकी रेशमी साड़ी धारण किया और हाथमें घण्टा ले लिया। तत्पश्चात् ब्रह्मा ने उस नीले कमलकी-सी कान्तिवाली देवीसे कहा—'निशे! तुम पहलेसे ही एकानंशा नामसे विख्यात हो और इस समय मेरी आज्ञासे पार्वतीके शरीरका सम्पर्क होनेके कारण तुम कृतकृत्य हो गयी हो। वरानने! पार्वतीदेवीके क्रोधसे जो यह सिंह प्रादुर्भूत हुआ है, वह तुम्हारा वाहन होगा और तुम्हारी ध्वजापर भी इस महाबलीका आकार विद्यमान रहेगा। अब तुम विन्ध्याचलको जाओ। वहाँ देवताओंका कार्य सिद्ध करो। देवि! जिसके पीछे एक लाख यक्ष चलते हैं, उस इस पञ्चाल नामक यक्षको मैं तुम्हें किंकरके रूपमें प्रदान कर रहा हूँ, यह सैकड़ों प्रकारकी मायाओंका ज्ञाता है।' ब्रह्माद्वारा ऐसा आदेश पाकर कौशिकी देवी विन्ध्यपर्वतकी ओर चली गयीं॥ १०—१८ १/२॥ | | प्रविशन्तीं तु तां द्वारादपकृष्य समाहितः।<br>रुरोध वीरको देवीं हेमवेत्रलताधरः॥ २०<br><br>तामुवाच च कोपेन रूपात्तु व्यभिचारिणीम्।<br>प्रयोजनं न तेऽस्तीह गच्छ यावन्न भेत्स्यसि॥ २१<br><br>देव्या रूपधरो दैत्यो देवं वञ्चयितुं त्विह।<br>प्रविष्टो न च दृष्टोऽसौ स वै देवेन घातितः॥ २२<br><br>घातिते चाहमाज्ञप्तो नीलकण्ठेन कोपिना।<br>द्वारेषु नावधानं ते यस्मात् पश्यामि वै ततः॥ २३<br><br>भविष्यसि न मद्द्वाःस्थो वर्षपूगान्यनेकंशः।<br>अतस्तेऽत्र न दास्यामि प्रवेशं गम्यतां द्रुतम्॥ २४ | इधर उमा भी अपना मनोवाञ्छित वरदान प्राप्त कर शंकरजीके पास चलीं। वहाँ द्वारपर हाथमें सोनेका डंडा धारण किये हुए वीरक सावधानीपूर्वक पहरा दे रहा था। उसने प्रवेश करती हुई पार्वतीको दरवाजेसे खींचकर रोक दिया और गौर रूपसे दूसरी स्त्री-सी प्रतीत होनेवाली उनसे क्रोधपूर्वक कहा—'तुम्हारा यहाँ कोई प्रयोजन नहीं है, अतः जबतक मैं तुम्हें पीट नहीं दे रहा हूँ, उससे पहले ही भाग जाओ। यहीं महादेवजीको छलनेके लिये एक दैत्य माता पार्वतीदेवीका रूप धारण कर प्रविष्ट हो गया था, जिसे मैं देख नहीं पाया था, किंतु महादेवजीने उसे यमलोकका पथिक बना दिया, उसे मारनेके बाद नीलकण्ठ शिवजीने क्रुद्ध होकर मुझे आज्ञा दी है कि अबसे तुम द्वारपर असावधानी मत करना। तभीसे मैं अच्छी तरह सजग होकर पहरा दे रहा हूँ। द्वारपर मेरे स्थित रहते हुए तुम अनेकों वर्षसमूहोंतक प्रविष्ट न हो सकोगी, इसलिये मैं तुम्हें भवनमें प्रवेश नहीं करने दूँगा। तुम शीघ्र ही यहाँसे चली जाओ'॥ १९—२४॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे कुमारसम्भवे वीरकशापो नाम सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १५७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके कुमारसम्भव-प्रसङ्गमें वीरक-शाप नामक एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १५७॥