भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 671, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 671
* अध्याय १५८ *६६१

| अपश्यत् कृत्तिकाः स्नाताः षडर्कद्युतिसन्निभाः ।<br>पद्मपत्रे तु तद्वारि गृहीत्वोपस्थिता गृहम् ॥ ३३<br><br>हर्षादुवाच पश्यामि पद्मपत्रे स्थितं पयः ।<br>ततस्ता ऊचुरखिलं कृत्तिका हिमशैलजाम् ॥ ३४<br><br>कृत्तिका ऊचुः<br>दास्यामो यदि ते गर्भः सम्भूतो यो भविष्यति ।<br>सोऽस्माकमपि पुत्रः स्यादस्मन्नाम्ना च वर्तताम् ।<br>भवेल्लोकेषु विख्यातः सर्वेष्वपि शुभानने ॥ ३५<br><br>इत्युक्तोवाच गिरिजा कथं मद्गात्रसम्भवः ।<br>सर्वैरवयवैर्युक्तो भवतीभ्यः सुतो भवेत् ॥ ३६<br><br>ततस्तां कृत्तिका ऊचुर्विधास्यामोऽस्य वै वयम् ।<br>उत्तमान्युत्तमाङ्गानि यद्येवं तु भविष्यति ॥ ३७<br><br>उक्ता वै शैलजा प्राह भवत्वेवमनिन्दिताः ।<br>ततस्ता हर्षसम्पूर्णाः पद्मपत्रस्थितं पयः ॥ ३८<br><br>तस्यै ददुस्तया चापि तत्पीतं क्रमशो जलम् ।<br>पीते तु सलिले तस्मिंस्ततस्तस्मिन् सरोवरे ॥ ३९<br><br>विपाट्य देव्याश्च ततो दक्षिणां कुक्षिमुद्गतः ।<br>निष्चक्रामाद्भुतो बालः सर्वलोकविभासकः ॥ ४०<br><br>प्रभाकरप्रभाकारः प्रकाशकनकप्रभः ।<br>गृहीतनिर्मलोदग्रशक्तिशूलः षडाननः ॥ ४१<br><br>दीप्तो मारयितुं दैत्यान् कुत्सितान् कनकच्छविः ।<br>एतस्मात् कारणाद् देवः कुमारश्चापि सोऽभवत् ॥ ४२ | इतनेमें ही उनकी दृष्टि उस सरोवरमें स्नान कर निकली हुई छहों कृत्तिकाओंपर पड़ी जो सूर्यकी कान्तिके समान उद्भासित हो रही थीं तथा कमलके पत्तेके दोनेमें उस सरोवरके जलको लेकर घरकी ओर जानेके लिये उद्यत थीं। तब पार्वतींने उनसे हर्षपूर्वक कहा—'मैं कमलके पत्तेमें रखे हुए जलको देख रही हूँ।' यह सुनकर उन कृत्तिकाओंने पार्वतीसे सारा वृत्तान्त कह सुनाया॥ २७-३४॥<br><br>कृत्तिकाओंने कहा—शुभानने! यह जल हमलोग आपको दे देंगी, किंतु यदि आप यह प्रतिज्ञा करें कि इस जलके पान करनेसे जो गर्भ स्थित होगा, उससे उत्पन्न हुआ बालक हमलोगोंका भी पुत्र कहलाये और हमलोगोंके नामपर उसका नामकरण किया जाय। वह बालक सभी लोकोंमें विख्यात होगा। इस प्रकार कही जानेपर पार्वतींने कहा—'भला जो मेरे समान सभी अङ्गोंसे युक्त होकर मेरे शरीरसे उत्पन्न होगा, वह आप लोगोंका पुत्र कैसे हो सकेगा?' तब कृत्तिकाओंने पार्वतीसे कहा—'यदि हमलोग इस बालकके उत्तम मस्तकोंकी रचना करेंगी तो यह वैसा हो सकता है।' उनके ऐसा कहनेपर पार्वतींने कहा—'अनिन्द्य सुन्दरियो! ऐसा ही हो।' तब हर्षसे भरी हुई कृत्तिकाओंने कमलके पत्तेमें रखे हुए उस जलको पार्वतीको समर्पित कर दिया और पार्वतींने भी उस सारे जलको क्रमशः पी लिया। उस जलके पी लेनेपर उसी सरोवरके तटपर पार्वतीदेवीकी दाहिनी कोखको फाड़कर एक अद्भुत बालक निकल पड़ा जो समस्त लोकोंको उद्भासित कर रहा था। उसकी शरीरकान्ति सूर्यके समान थी। वह स्वर्ण-सदृश प्रकाशमान तथा हाथोंमें निर्मल एवं भयावनी शक्ति और शूल धारण किये हुए था। उसके छः मुख थे। वह सुवर्णकी-सी छविसे युक्त हो उद्दीप्त हो रहा था और पापाचारी दैत्योंको मारनेके लिये उद्यत-सा दीख रहा था। इसी कारण वे देव 'कुमार' नामसे भी प्रसिद्ध हुए॥ ३५-४२॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तारकोपाख्याने कुमारसम्भवो नामाष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकोपाख्यानमें कुमारसम्भव नामक एक सौ अट्ठावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १५८ ॥

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