भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६४६ * मत्स्यपुराण *

शर्व उवाचशिवजीने कहा—
शर्व उवाच<br>एष एव सुतस्तेऽस्तु नयनानन्दहेतुकः।<br>त्वया मात्रा कृतार्थस्तु वीरकोऽपि सुमध्यमे॥ ५४७<br>इत्युक्ता प्रेषयामास विजयां हर्षणोत्सुका।<br>वीरकानयनायाशु दुहिता हिमभूभृतः॥ ५४८<br>सावरुह्य त्वरायुक्ता प्रासादादम्बरस्पृशः।<br>विजयोवाच गणपं गणमध्ये प्रवर्तिता॥ ५४९<br>एहि वीरक चापल्यात् त्वया देवः प्रकोपितः।<br>किमुत्तरं वदत्यर्थे नृत्येरङ्गे तु शैलजा॥ ५५०<br>इत्युक्तस्त्यक्तपाषाणशकलो मार्जिताननः।<br>आहूतस्तु तयोद्भूतमूलप्रस्तावशंसकः॥ ५५१<br>देव्याः समीपमागच्छद् विजयानुगतः शनैः।<br>प्रासादशिखरात्फुल्लरक्ताम्बुजनिभद्युतिः॥ ५५२<br>तं दृष्ट्वा प्रस्रुतानल्पस्वादुक्षीरपयोधरा।<br>गिरिजोवाच सस्नेहं गिरा मधुरवर्णया॥ ५५३**शिवजीने कहा—**सुमध्यमे! नेत्रोंको आनन्द प्रदान करनेवाला यह वीरक ही तुम्हारा पुत्र हो और वीरक भी तुम-जैसी माताको पाकर कृतार्थ हो जाय। इस प्रकार कही जानेपर पर्वतराजकी कन्या पार्वतीने हर्षसे उत्सुक होकर तुरंत ही वीरकको बुला लानेके लिये विजयाको भेजा। तब विजया शीघ्र ही उस गगनचुम्बी अट्टालिकासे नीचे उतरकर गणोंके मध्यमें पहुँची और गणेश्वर वीरकसे बोली—'वीरक! यहाँ आओ, तुम्हारी चञ्चलतासे भगवान् शंकर क्रुद्ध हो गये हैं। तुम्हारे इस नाच-रंगके विषयमें माता पार्वती भी देखो क्या कहती हैं।' विजयाके ऐसा कहनेपर वीरकने पाषाणखण्डको फेंक दिया और वह अपने मुखको धोकर माताद्वारा बुलाये जानेके मूल कारणके विषयमें सोचता हुआ विजयाके पीछे-पीछे पार्वतीदेवीके निकट आया। खिले हुए लाल कमलपुष्पकी-सी कान्तिवाली पार्वतीने अट्टालिकाके शिखरपरसे जब वीरकको आते हुए देखा तो उनके स्तनोंसे अधिक मात्रामें स्वादिष्ट दूध टपकने लगा। तब गिरिजा स्नेहपूर्वक मधुर वाणीमें वीरकसे बोलीं॥ ५४७–५५३॥
उमोवाच<br>एह्येहि यातोऽसि मे पुत्रतां<br>देवदेवेन दत्तोऽधुना वीरक।<br>इत्येवमङ्के निधायाथ तं पर्यचुम्बत्<br>कपोले शनैः कलवादिनम्॥ ५५४<br>मूर्ध्यापाघ्राय सम्मार्ज्य गात्राणि<br>ते भूषयामास दिव्यैः स्रजैर्भूषणैः।<br>किङ्किणीमेखलानूपुरै-<br>र्माणिक्यकेयूरहारोरुमूलगुणैः ॥ ५५५<br>कोमलैः पल्लवैश्चित्रितैश्चारुभि-<br>र्दिव्यमन्त्रोद्भवैस्तस्य शुभ्रैस्ततो<br>भूरिभिश्चाकरोन्मिश्र-<br>सिद्धार्थकै रङ्गरक्षाविधिम् ॥ ५५६<br>एवमादाय चोवाच कृत्वा स्रजं<br>मूर्ध्नि गोरोचनापत्रभङ्गोञ्ज्वलैः॥ ५५७<br>गच्छ गच्छाधुना क्रीड सार्धं गणै-<br>रप्रमत्तो वस शुभ्रवर्जी शनै-**उमाने कहा—**वीरक! आओ, यहाँ आओ, देवाधिदेवने तुम्हें मुझे प्रदान किया है। अब तुम मेरे पुत्रस्वरूप हो गये हो। ऐसा कहकर माता पार्वती वीरकको अपनी गोदमें बैठाकर उस मधुरभाषी पुत्रके कपोलोंका चुम्बन करने लगीं। उन्होंने उसका मस्तक सूँघकर शरीरके सभी अङ्गोंको नहलाकर स्वच्छ किया। फिर किंकिणी, कटिसूत्र, नूपुर, मणिनिर्मित केयूर, हार और ऊरुमूलगुण (कच्छी) आदि दिव्य आभूषणोंसे उसे स्वयं विभूषित किया। तत्पश्चात् अत्यन्त सुन्दर विचित्र रंगके कोमल पल्लवों, दिव्य मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित अनेकों माङ्गलिक सूक्तों तथा अनेक धातुओंके चूर्णोंसे मिश्रित सफेद सरसोंसे उसके अङ्गोंकी रक्षाका विधान किया। इस प्रकार उसे गोदमें लेकर मुखपर गोरोचनसे उज्ज्वल पत्रभंगीकी रचना करके उसके मस्तकपर माला डालकर कहा—'बेटा! अब जाओ और अपने साथी गणोंके साथ सावधान होकर खेलो। उनके साथ कपटरहित होकर निवास करो।