भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय १५४ * । ६४७
संस्कृतहिन्दी
व्यालमालाकुलाः शैलसानुद्रुम-<br>दन्तिभिर्भिन्नसाराः परे सङ्गिनः ॥ ५५८<br>जाह्नवीयं जलं क्षुब्धतोयाकुलं<br>कूलं मा विशेथा बहुव्याघ्रदुष्टे वने।<br>वत्सासंख्येषु दुर्गा गणेश्वेष्वेतस्मिन्<br>वीरके पुत्रभावोपतुष्टान्तःकरणा तिष्ठतु ॥ ५५९<br>स्वस्य पितृजनप्रार्थितं<br>भव्यमायातिभाविन्यसौ भव्यता।तुम्हारे दूसरे साथी व्यालसमूहोंसे व्याकुल और पर्वतशिखर, वृक्ष और गजराजोंसे परास्त हो रहे हैं। गङ्गाका जल अत्यन्त क्षुब्ध हो रहा है, उसने तटको जर्जर कर दिया है, अतः वहाँ तथा बहुत-से दुष्ट व्याघ्रोंसे भरे हुए वनमें मत प्रवेश करना। इन पुत्ररूप असंख्य गणेश्वरोंमें इस वीरकपर दुर्गादेवी सदा पुत्रभावसे संतुष्ट अन्तःकरणवाली बनी रहें। अपने पितृजनोंद्वारा प्रार्थित भावी अवश्य घटित होती है, अतः यह भव्यता तुम्हें भविष्यमें प्राप्त होगी' ॥ ५५८-५५९ १/२ ॥
सोऽपि निर्वर्त्य सर्वान् गणान् सस्मय-<br>माह बालत्वलीलारसाविष्ठधीः ॥ ५६०<br>एष मात्रा स्वयं मे कृतभूषणो-<br>ऽत्र एष पटः पटलैर्बिन्दुभिः।<br>सिन्दुवारस्य पुष्पैरियं मालती-<br>मिश्रिता मालिका मे शिरस्याहिता ॥ ५६१<br>कोऽयमातोद्यधारी गणस्तस्य<br>दास्यामि हस्तादिदं क्रीडनम्।तदनन्तर बालक्रीडाके रसमें निमग्नबुद्धि वीरक भी वहाँसे लौटकर सभी गणोंसे हँसते हुए बोला—'मित्रो! देखो, स्वयं माताने मेरा यह शृङ्गार किया है। उन्होंने ही यह गुलाबी बिंदियोंसे युक्त वस्त्र पहनाया है और मालती-पुष्पोंसे मिली हुई यह सिन्दुवार-पुष्पोंकी माला मेरे सिरपर रखी है। यह आतोद्य नामक बाजा धारण करनेवाला कौन गण है? मैं उसे अपने हाथसे वह खिलौना दूँगा।' उधर
दक्षिणात्पश्चिमं पश्चिमादुत्तर-<br>मुत्तरात्पूर्वमभ्येत्य सख्या युता प्रेक्षती ॥ ५६२<br>तं गवाक्षान्तराद्वीरकं शैलपुत्री बहिः<br>क्रीडनं यज्जगन्मातुरप्येष चित्तभ्रमः।<br>पुत्रलुब्धो जनस्तत्र को मोहमायाति<br>न स्वल्पचेता जडो मांसविण्मूत्रसङ्घातदेहः॥ ५६३सखीके साथ पार्वती कभी दक्षिणसे पश्चिम, कभी पश्चिमसे उत्तर और कभी उत्तरसे पूर्वकी ओर घूम-घूमकर गवाक्ष मार्गसे बाहर खेलते हुए वीरककी ओर निहार रही थीं। जब जगन्माता पार्वतीके चित्तमें (पुत्रको खेलते हुए देखकर) इस प्रकार व्यामोह उत्पन्न हो जाता है, तब भला स्वल्पबुद्धि, मूर्ख, मांस, विष्ठा और मूत्रकी राशिसे भरे हुए शरीरको धारण करनेवाला ऐसा कौन पुत्रप्रेमी जन होगा जिसे मोह न प्राप्त हो।
द्रष्टुमभ्यन्तरं नाकवासेश्वरै-<br>रिन्दुमौलिं प्रविष्टेषु कक्षान्तरम्।<br>वाहनात्यावरोहा गणास्तैर्युतो लोक-<br>पालास्त्रमूर्तों ह्ययं खड्गो विक्षड्गकरः ॥ ५६४<br>निर्ममः कृतान्तः कस्य केनाहतो ब्रूत<br>मौनेभवन्तोऽस्त्रदण्डेन किं दुःस्पृहाः।<br>भीममूर्त्त्याननेनास्ति कृत्यं गिरौ<br>य एषोऽस्त्रज्ञेन किं वध्यते ॥ ५६५इसी बीच देवगण भगवान् चन्द्रशेखरका दर्शन करनेके लिये कक्षके भीतर प्रविष्ट हुए और प्रमथगण अपने वाहनोंपर आरूढ़ हो गये। उनसे घिरे हुए वीरकने लोकपाल यमके अस्त्र खड्गको म्यानसे खींचकर कहा—'तुमलोग बतलाओ, निर्दय कृतान्त किस कारण किसका वध करना चाहता है? तुमलोग मौन क्यों हो? अस्त्रदण्डसे क्या अलभ्य है? भयंकर आकृतिवाले मेरे वर्तमान रहते इस पर्वतपर ऐसा कौन-सा कार्य है जो अस्त्रद्वारा सिद्ध नहीं हो सकता ॥ ५६०-५६५ १/२ ॥
मा वृथा लोकपालानुगचित्तता<br>एवमेवैतदित्युचुरस्मै तदा देवताः।<br>देवदेवानुगं वीरकं लक्षणा प्राह<br>देवी वनं पर्वता निर्झराण्यग्निदेव्यान्यथो ॥ ५६६वीरकके इस प्रकार कहनेपर देवताओंने उनसे कहा—'वीरक! तुम्हें इस प्रकार लोकपालोंके चित्तका अनुगमन नहीं करना चाहिये।' फिर लक्षणादेवी देवाधिदेव महादेवके अनुचर वीरकसे बोलीं—'तुमलोग प्राणियोंकी