भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 673
* अध्याय १५९ *६६३

| देवा ऊचुः<br>नमः कुमाराय महाप्रभाय<br>स्कन्दाय च स्कन्दितदानवाय।<br>नवार्कविद्युद्द्युतये नमोऽस्तु ते<br>नमोऽस्तु ते षण्मुख कामरूप॥ १३<br>पिनद्धनानाभरणाय भर्त्रे<br>नमो रणे दारुणदारुणाय।<br>नमोऽस्तु तेऽर्कप्रतिमप्रभाय<br>नमोऽस्तु गुह्याय गुहाय तुभ्यम्॥ १४<br>नमोऽस्तु त्रैलोक्यभयापहाय<br>नमोऽस्तु ते बालकृपापराय।<br>नमो विशालामललोचनाय<br>नमो विशाखाय महाव्रताय॥ १५<br>नमो नमस्तेऽस्तु मनोहराय<br>नमो नमस्तेऽस्तु रणोत्कटाय।<br>नमो मयूरोज्ज्वलवाहनाय<br>नमोऽस्तु केयूरधराय तुभ्यम्॥ १६<br>नमो धृतोदग्रपताकिने नमो<br>नमः प्रभावप्रणताय तेऽस्तु।<br>नमो नमस्ते वरवीर्यशालिने<br>कृपापरो नो भव भव्यमूर्ते॥ १७<br>क्रियापरा यज्ञपतिं च स्तुत्वा<br>विरेमुरेवं त्वमराधिपाद्याः।<br>एवं तदा षड्वदनं तु सेन्द्रा<br>मुदा सुतुष्टश्च गुहस्ततस्तान्।<br>निरीक्ष्य नेत्रैरमलैः सुरेशान्<br>शत्रून् हनिष्यामि गतज्वराः स्थ॥ १८ | **देवताओंने कहा—**कामरूप षण्मुख! आप कुमार, महान् तेजस्वी, शिवतेजसे उत्पन्न और दानवोंका कचूमर निकालनेवाले हैं। आपकी शरीर-कान्ति उदयकालीन सूर्य एवं बिजलीकी-सी है। आपको हमारा बारंबार नमस्कार प्राप्त हो। आप नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित, जगत्के पालनकर्ता और रणभूमिमें भीषण दानवोंके लिये अत्यन्त भयंकर हैं, आपको प्रणाम है। सूर्य-सरीखे प्रतिभाशाली आपको अभिवादन है। गुह्य रूपवाले आप गुहको हमारा नमस्कार है। त्रिलोकीके भयको दूर करनेवाले आपको प्रणाम है। कृपा करनेमें तत्पर रहनेवाले बालरूप आपको अभिवादन है। विशाल एवं निर्मल नेत्रोंवाले आपको नमस्कार है। महान् व्रतका पालन करनेवाले आप विशाखको प्रणाम है। सामान्यतया मनोहर रूपधारी तथा रणभूमिमें भयानक रूपसे युक्त आपको बारंबार अभिवादन है। उज्ज्वल मयूरपर सवार होनेवाले आपको नमस्कार है। आप केयूरधारीको प्रणाम है। अत्यन्त ऊँचाईपर फहरानेवाली पताकाको धारण करनेवाले आपको अभिवादन है। प्रणतजनोंपर प्रभाव डालनेवाले आपको नमस्कार है। आप सर्वश्रेष्ठ पराक्रमसे सम्पन्न हैं। आपको बारंबार प्रणाम है। मनोहर रूपधारिन्! हमलोगोंपर कृपा कीजिये। इस प्रकार देवराज इन्द्र आदि सभी क्रियापरायण देवगण जब हर्षपूर्वक यज्ञपति षडाननकी स्तुति करके चुप हो गये, तब परम प्रसन्न हुए गुह अपने निर्मल नेत्रोंसे उन सुरेश्वरोंकी ओर निहारकर बोले—'देवगण! मैं आपलोगोंके शत्रुओंका संहार करूँगा, अब आपलोग शोकरहित हो जायँ'॥ १३–१८॥ | | कुमार उवाच<br>कं वः कामं प्रयच्छामि देवता ब्रूत निर्वृताः।<br>यद्यप्यसाध्यं हृद्यं वो हृदये चिन्तितं परम्॥ १९<br>इत्युक्तास्तु सुरास्तेन प्रोचुः प्रणतमौलयः।<br>सर्व एव महात्मानं गुहं तद्गतमानसाः॥ २०<br>दैत्येन्द्रस्तारको नाम सर्वामरकुलान्तकृत्।<br>बलवान् दुर्जयो दुष्टो दुराचारोऽतिकोपनः।<br>तमेव जहि हृद्योऽर्थ एषोऽस्माकं भयापह॥ २१ | **कुमारने पूछा—**देवगण! आपलोग निःसंकोच बतलायें कि मैं आपलोगोंकी कौन-सी अभिलाषा पूर्ण करूँ? वह उत्तम अभिलाषा, जिसे आपलोगोंने अपने हृदयमें चिरकालसे सोच रखा है, यदि दुःसाध्य भी होगी तो भी मैं उसे अवश्य पूर्ण करूँगा। कुमारद्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर सभी देवता उनके मनोऽनुकूल हो सिर झुकाकर महात्मा गुहसे बोले—'भय-विनाशक गुह! तारक नामवाले दैत्येन्द्रने सभी देवकुलोंका विनाश कर दिया है। वह बलवान्, दुर्जय, अत्यन्त दुष्ट, दुराचारी और अतिशय क्रोधी है, आप उसीका वध कीजिये। यही हमलोगोंकी हार्दिक अभिलाषा है।' |