भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 674, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 674
६६४* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा सर्वामरपदानुगः।<br>जगाम जगतां नाथः स्तूयमानोऽमरेश्वरैः ॥ २२<br>तारकस्य वधार्थाय जगतः कण्टकस्य वै।<br>ततश्च प्रेषयामास शक्रो लब्धसमाश्रयः ॥ २३<br>दूतं दानवसिंहस्य परुषाक्षरवादिनम्।<br>स तु गत्वाब्रवीद् दैत्यं निर्भयो भीमदर्शनः ॥ २४<br>दूत उवाच<br>शक्रस्त्वामाह देवेशो दैत्यकेतो दिवस्पतिः।<br>तारकासुर तच्छ्रुत्वा घट शक्त्या यथेच्छया ॥ २५<br>यज्जगद्दालनादाप्तं किल्बिषं दानव त्वया।<br>तस्याहं शासकस्तेऽद्य राजास्मि भुवनत्रये ॥ २६<br>श्रुत्वैतद् दूतवचनं कोपसंरक्तलोचनः।<br>उवाच दूतं दुष्टात्मा नष्टप्रायविभूतिकः ॥ २७<br>तारक उवाच<br>दृष्टं ते पौरुषं शक्र रणेषु शतशो मया।<br>निस्त्रपत्वान्न ते लज्जा विद्यते शक्र दुर्मते ॥ २८<br>एवमुक्ते गते दूते चिन्तयामास दानवः।<br>नालब्धसंश्रयः शक्रो वक्तुमेवं हि चार्हति ॥ २९<br>जितः स शक्रो नाकस्माज्जायते संश्रयाश्रयः।<br>निमित्तानि च दुष्टानि सोऽपश्यद् दुष्टचेष्टितः ॥ ३०<br>पांसुवर्षमसृक्पातं गगनादवनीतले।<br>भुजनेत्रप्रकम्पं च वक्त्रशोषं मनोभ्रमम् ॥ ३१<br>स्वकान्तावक्त्रपद्मानां म्लानतां च व्यलोकयत्।<br>दुष्टांश्च प्राणिनो रौद्रान्सोऽपश्यद् दुष्टवेदिनः ॥ ३२<br>तदचिन्त्यैव दितिजो न्यस्तचिन्तोऽभवत् क्षणात्।<br>यावद्गजघटाघण्टारणत्काररवोत्कटाम् ॥ ३३<br>तद्धतुरगसङ्घातक्षुण्णभूरेणुपिञ्जराम् ।<br>चञ्चलस्यन्दनोदग्रध्वजराजिविराजिताम् ॥ ३४देवताओंद्वारा ऐसा निवेदन किये जानेपर गुहने 'तथैति' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। तत्पश्चात् वे जगन्नाथ गुह देवेश्वरोंद्वारा स्तुति किये जाते हुए सम्पूर्ण देवगणोंके साथ जगत्के कण्टकस्वरूप तारकका वध करनेके लिये प्रस्थित हुए। तदुपरान्त सहायक उपलब्ध हो जानेपर इन्द्रने एक कठोर वचन बोलनेवाले दूतको दैत्यसिंह तारकके पास भेजा। वह भयंकर रूपधारी दूत दैत्यराजके पास जाकर निर्भय होकर बोला ॥ १९–२४॥<br><br>दूतने कहा—दैत्यकेतु तारकासुर! स्वर्गके अधीश्वर देवराज इन्द्रने तुम्हें कुछ संदेश कहला भेजा है, उसे सुनकर तुम शक्तिपूर्वक स्वेच्छानुसार प्रयत्न करो। (उन्होंने कहलाया है कि) 'दानव! जगत्का विनाश करके तुमने जो पाप कमाया है, तुम्हारे उस पापका शासन करनेके लिये मैं प्रस्तुत हूँ। इस समय मैं त्रिभुवनका राजा हूँ।' दूतकी ऐसी बात सुनकर तारकके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। उसकी विभूति प्रायः नष्ट हो चुकी थी। तब उस दुष्टात्माने दूतसे कहा॥ २५–२७॥<br><br>तारक बोला—इन्द्र! मैंने रणभूमिमें सैकड़ों बार तुम्हारे पुरुषार्थको देख लिया है। दुर्बुद्धि इन्द्र! निर्लज्ज होनेके कारण तुम्हें ऐसा कहते हुए लज्जा नहीं आती। ऐसा उत्तर पाकर दूतके चले जानेपर दानवराज तारक विचार करने लगा कि किसी विशिष्टकी सहायता प्राप्त हुए बिना इन्द्र इस तरहकी बातें नहीं कह सकते; क्योंकि वे हमसे पराजित हो चुके हैं। पता नहीं, अकस्मात् उन्हें कहाँसे सहायता उपलब्ध हो गयी है। इसी बीच उस दुष्ट चेष्टावाले दानवको अनर्थसूचक निमित्त दीख पड़े। उसी समय आकाशसे भूतलपर धूलकी वर्षा होने लगी तथा रक्तपात होने लगा। उसकी भुजाएँ और नेत्र काँपने लगे। उसका मुख सूख गया और उसके मनमें घबराहट उत्पन्न हो गयी। उसे अपनी पत्नियोंके मुखकमल मलिन दीख पड़ने लगे तथा अनर्थकी सूचना देनेवाले भयंकर दुष्ट प्राणियोंके दर्शन हुए, किंतु इन सबका कुछ भी विचार न कर दैत्य तारक क्षणभरमें ही चिन्तारहित हो गया। इतनेमें ही अट्टालिकापर बैठे हुए दैत्यने आती हुई देवताओंकी सेनाको देखा जिसमें गजयूथोंके बजते हुए घंटोंका उत्कट शब्द हो रहा था। उसी प्रकार जो घोड़ोंकी टापोंसे पिसी हुई धूलसे आच्छादित होनेके कारण पीली दीख रही थी तथा चलते हुए रथोंके ऊपर फहराते हुए ध्वजसमूहों,