मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
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| * अध्याय १५९ * | ६६५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| विमानैश्चाद्भुताकारैश्चलितामरचामरैः ।<br>तां भूषणनिबद्धां च किंनरोद्गीतनादिताम्॥ ३५<br>नानानाकतरूत्फुल्लकुसुमापीडधारिणीम् ।<br>विकोशशस्त्रपरिष्कारां वर्मनिर्मलदर्शनाम्॥ ३६<br>बन्द्युद्घुष्टस्तुतिरसां नानावाद्यनिनादिताम्।<br>सेनां नाकसदां दैत्यः प्रासादस्थो व्यलोकयत्॥ ३७ | डुलाये जाते हुए देवताओंके चँवरों और अद्भुत आकारवाले विमानोंसे सुशोभित थी। जो आभूषणोंसे विभूषित, किन्नरोंके गानसे निनादित, नाना प्रकारके स्वर्गीय वृक्षोंके खिले हुए पुष्पोंको मस्तकपर धारण करनेवाले सैनिकोंसे युक्त, म्यानरहित शस्त्रास्त्रोंसे परिष्कृत और निर्मल कवचोंसे युक्त थी, जिसमें वन्दियोंद्वारा गायी जाती हुई स्तुतियोंके शब्द सुनायी पड़ रहे थे और जो नाना प्रकारके बाजोंसे निनादित हो रही थी॥ २८–३७॥ |
| चिन्तयामास स तदा किंचिदुद्भ्रान्तमानसः ।<br>अपूर्वः को भवेद् योद्धा यो मया न विनिर्जितः ॥ ३८ | उसे देखकर तारकका मन कुछ उद्भ्रान्त हो उठा। तब वह विचार करने लगा कि यह कौन अपूर्व योद्धा हो सकता है, जिसे मैंने पराजित नहीं किया है। |
| ततश्चिन्ताकुलो दैत्यः शुश्राव कटुकाक्षरम्।<br>सिद्धवन्दिभिरुद्घुष्टमिदं हृदयदारणम् ॥ ३९ | इस प्रकार वह दैत्य जब चिन्तासे व्याकुल हो रहा था, उसी समय उसने सिद्ध-वन्दियोंद्वारा गायी जाती हुई यह कठोर अक्षरोंवाली एवं हृदयविदारिणी गाथा सुनी ॥ ३८-३९ ॥ |
| अथ गाथा<br>जयातुलशक्तिदीधितिपिञ्जर<br>भुजदण्डचण्डरणरभस ।<br>सुखद कुमुदकाननविकासनेन्दो कुमार<br>जय दितिजकुलमहोदधिवडवानल ॥ ४० | कुमार! अप्रमेय शक्तिकी किरणोंसे आपका वर्ण पीला हो गया है। आप अपने भुजदण्डोंसे प्रचण्ड युद्धका दृश्य उत्पन्न कर देनेवाले, भक्तोंके लिये सुखदायक, कुमुदिनीके वनको विकसित करनेके लिये चन्द्रमा और दैत्यकुलरूप महासागरके लिये वडवानलके समान हैं, आपकी जय हो, जय हो। |
| षण्मुख मधुररवमयूररथ<br>सुरमुकुटकोटिघट्टितचरणनखाङ्कुरमहासन।<br>जय ललितचूड़ाकलापनवविमलदल-<br>कमलकान्त दैत्यवंशदुःसहदावानल ॥ ४१ | षण्मुख! मधुर शब्द करनेवाला मयूर आपका वाहन है, आपका सिंहासन देवताओंके मुकुटोंकी कोरसे संघट्टित चरणनखोंके अङ्कुरसे सुशोभित होता है, आपका रुचिर चूडासमूह नूतन एवं निर्मल कमलदलके सम्मेलनसे सुशोभित होता है, आप दैत्यवंशके लिये दुःसह दावानलके समान हैं, आपकी जय हो। |
| जय विशाख विभो जय<br>सकललोकतारक जय देवसेनानायक।<br>स्कन्द जय गौरीनन्दन घण्टाप्रिय<br>प्रिय विशाख विभो धृतपताकप्रकीर्णपटल।<br>कनकभूषण भासुरदिनकरच्छाय ॥ ४२ | ऐश्वर्यशाली विशाख! आपकी जय हो। आप सम्पूर्ण लोकोंका उद्धार करनेवाले हैं, आपकी जय हो। देवसेनाके नायककी जय हो। स्कन्द! आप गौरीनन्दन और घंटाके प्रेमी हैं। ऐश्वर्यशाली प्रिय विशाख! आप हाथमें पताकासमूह धारण करनेवाले हैं और आपकी छवि स्वर्णमय आभूषण धारण करनेसे सूर्यके समान चमकीली है, आपकी जय हो। |
| जय जनितसम्भ्रम लीलालूनाखिलाराते<br>जय सकललोकतारक दितिजा सुरवर तारकान्तक।<br>स्कन्द जय बाल सप्तवासर<br>जय भुवनावलिशोकविनाशन ॥ ४३ | आप भय उत्पन्न करनेवाले और लीलापूर्वक सम्पूर्ण शत्रुओंके विनाशकर्ता हैं, आपकी जय हो। आप सम्पूर्ण लोकोंके उद्धारक तथा असुरवर दैत्य तारकके विनाशकारक हैं, आपकी जय हो। सप्तदिवसीय बालक स्कन्द। आप समस्त भुवनोंके शोकका विनाश करनेवाले हैं, आपकी जय हो, जय हो ॥ ४०–४३॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे देवासुरसंग्रामे रणोद्योगो नामैकोनषष्ठ्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५९ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके देवासुरसंग्राममें रणोद्योग नामक एक सौ उनसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १५९ ॥