भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 676

६६६ * मत्स्यपुराण *


एक सौ साठवाँ अध्याय

तारकासुर और कुमारका भीषण युद्ध तथा कुमारद्वारा तारकका वध

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
श्रुत्वैतत्तारकः सर्वमुद्घुष्टं देववन्दिभिः।<br>सस्मार ब्रह्मणो वाक्यं वधं बालादुपस्थितम्॥ १<br><br>स्मृत्वा धर्मं ह्यवर्माङ्गः पदातिरपदानुगः।<br>मन्दिरात्र्निर्जगामाशु शोकग्रस्तेन चेतसा॥ २<br><br>कालनेमिमुखा दैत्याः संरम्भाद् भ्रान्तचेतसः।<br>योधा धावत गृहीत योजयध्वं वरूथिनीम्॥ ३<br><br>कुमारं तारको दृष्ट्वा बभाषे भीषणाकृतिः।<br>किं बाल योद्धुकामोऽसि क्रीड कन्दुकलीलया॥ ४<br><br>त्वया न दानवा दृष्टा यत्सङ्गरविभीषकाः।<br>बालत्वादथ ते बुद्धिरेवं स्वल्पार्थदर्शिनी॥ ५<br><br>कुमारोऽपि तमग्रस्थं बभाषे हर्षयन् सुरान्।<br>शृणु तारक शास्त्रार्थस्तव चैव निरूप्यते॥ ६<br><br>शास्त्रैरर्था न दृश्यन्ते समये निर्भयैर्भटैः।<br>शिशुत्वं मावमंस्था मे शिशुः कालभुजङ्गमः॥ ७<br><br>दुष्प्रेक्ष्यो भास्करो बालस्तथाहं दुर्जयः शिशुः।<br>अल्पाक्षरो न मन्त्रः किं सुस्फुरो दैत्य दृश्यते॥ ८ऋषियो! देववन्दियोंद्वारा उद्घोषित वह सारा प्रसङ्ग सुनकर तारकको ब्रह्माद्वारा कही हुई बालकके हाथसे वध होनेवाली बातका स्मरण हो आया। तब वह कालधर्मका स्मरण कर कवचरहित अवस्थामें अकेले पैदल ही तुरंत अपने भवनसे बाहर निकल पड़ा। उस समय उसका चित्त शोकसे ग्रस्त था। उसने पुकारकर कहा—'अरे कालनेमि आदि प्रमुख दैत्य योद्धाओ! यद्यपि आतुरतावश तुमलोगोंका चित्त उद्भ्रान्त हो उठा है, तथापि तुमलोग दौड़ो, इसे पकड़ लो और इस सेनाके साथ युद्ध करो।' तत्पश्चात् भयंकर आकृतिवाला तारक कुमारको देखकर बोला—'अरे बच्चे! क्या तुम युद्ध करना चाहते हो? यदि ऐसी बात है तो आओ और कन्दुकक्रीडाकी तरह खेलो। तुमने अभीतक रणभूमिमें भय उत्पन्न करनेवाले दानवोंको नहीं देखा है। बालक होनेके कारण तुम्हारी बुद्धि इस प्रकारके छोटे-मोटे प्रयोजनोंको देखनेवाली है अर्थात् दूरदर्शिनी नहीं है।' यह सुनकर कुमार भी देवताओंको हर्षित करते हुए आगे खड़े हुए तारकसे बोले—'तारक! सुनो, मैं तुम्हारे शास्त्रीय अर्थका निरूपण कर रहा हूँ। निर्भीक योद्धा समरभूमिमें शास्त्रीय प्रयोजनको नहीं देखते। तुम मेरे बालकपनकी अवहेलना मत करो। जैसे साँपका बच्चा कष्टकारक होता है और उदयकालीन सूर्यकी ओर भी नहीं देखा जा सकता, उसी तरह मैं दुर्जय बालक हूँ। दैत्य! थोड़े अक्षरोंवाला मन्त्र क्या महान् स्फूर्तिदायक नहीं देखा जाता?'॥ १—८॥
कुमारे प्रोक्तवत्येवं दैत्यश्चिक्षेप मुद्गरम्।<br>कुमारस्तं निरस्याथ वज्रेणामोघवर्चसा॥ ९कुमार इस प्रकारकी बातें कह ही रहे थे कि दैत्यने उनपर मुद्गरसे आघात किया। तब कुमारने अपने अमोघ वर्चस्वी वज्रसे उसे निरस्त कर दिया।
ततश्चिक्षेप दैत्येन्द्रो भिन्दिपालमयोमयम्।<br>करेण तच्च जग्राह कार्तिकेयोऽमरारिहा॥ १०तत्पश्चात् दैत्येन्द्रने उन पर लोहनिर्मित भिन्दिपाल चलाया, किंतु देवशत्रुओंका विनाश करनेवाले कार्तिकेयने उसे हाथसे पकड़ लिया।
गदां मुमोच दैत्याय षण्मुखोऽपि खरस्वनाम्।<br>तया हतस्ततो दैत्यश्चकम्पेऽचलराडिव॥ ११फिर षडाननने उस दैत्यके ऊपर घोर शब्द करती हुई गदा फेंकी। उस गदासे आहत हो वह दैत्य पर्वतराजकी तरह काँप उठा।
मेने च दुर्जयं दैत्यस्तदा षड्वदनं रणे।<br>चिन्तयामास बुद्ध्या वै प्राप्तः कालो न संशयः॥ १२तब उस दैत्यने षडाननको रणभूमिमें अजेय मान लिया और वह बुद्धिसे विचार करने लगा कि निश्चय ही मेरा काल आ पहुँचा है।