भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 680
६७०* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
देवा ऊचुः<br>वरप्रदानाद् भगवन् वधिष्यति स नोऽसुरः।<br>तत्प्रसीदाशु भगवन् वधोऽप्यस्य विचिन्त्यताम्॥ १९<br>भगवन् सर्वभूतानामादिकर्ता स्वयं प्रभुः।<br>स्रष्टा त्वं हव्यकव्यानामव्यक्तप्रकृतिर्बुधः॥ २०<br>सर्वलोकहितं वाक्यं श्रुत्वा देवः प्रजापतिः।<br>आश्वासयामास सुरान् सुशीतैर्वचनाम्बुभिः॥ २१<br>अवश्यं त्रिदशास्तेन प्राप्तव्यं तपसः फलम्।<br>तपसान्तेऽस्य भगवान् वधं विष्णुः करिष्यति॥ २२<br>तच्छ्रुत्वा विबुधा वाक्यं सर्वे पङ्कजजन्मनः।<br>स्वानि स्थानानि दिव्यानि विप्रजग्मुर्मुदान्विताः॥ २३देवताओंने कहा—भगवन्! आपके इस वरप्रदानसे तो वह असुर हमलोगोंका वध कर डालेगा। अतः प्रभो! कृपा कीजिये और शीघ्र ही उसके वधका भी उपाय सोचिये। भगवन्! आप स्वयं सम्पूर्ण प्राणियोंके आदिकर्ता, स्वामी, हव्य एवं कव्यके स्रष्टा, अव्यक्तप्रकृति और सर्वज्ञ हैं। देवताओंके समस्त लोकोंके लिये हितकारक ऐसे वचनको सुनकर प्रजापति ब्रह्माने अपने परम शीतल वचनरूपी जलसे देवताओंको संसिक्त एवं आश्वस्त करते हुए बोले—'देवगण! उसे अपनी तपस्याका फल तो अवश्य ही मिलना चाहिये। हाँ, तपस्याके पुण्यफलके समाप्त हो जानेपर भगवान् विष्णु उसका वध करेंगे।' कमलजन्मा ब्रह्माकी वह बात सुनकर सभी देवता हर्षपूर्वक अपने-अपने दिव्य स्थानोंको लौट गये॥ १९—२३॥
लब्धमात्रे वरे चाथ सर्वाः सोऽबाधत प्रजाः।<br>हिरण्यकशिपुर्दैत्यो वरदानेन दर्पितः॥ २४<br>आश्रमेषु महाभागान् स मुनीञ्छंसितव्रतान्।<br>सत्यधर्मपरान् दान्तान् धर्षयामास दानवः॥ २५<br>देवांस्त्रिभुवनस्थांश्च पराजित्य महासुरः।<br>त्रैलोक्यं वशमानीय स्वर्गे वसति दानवः॥ २६<br>यदा वरमदोत्सिक्तश्चोदितः कालधर्मतः।<br>यज्ञियानकरोद् दैत्यानयज्ञियांश्च देवताः॥ २७<br>तदादित्याश्च साध्याश्च विश्वे च वसवस्तथा।<br>सेन्द्रा देवगणा यक्षाः सिद्धद्विजमहर्षयः॥ २८<br>शरण्यं शरणं विष्णुमुपतस्थुर्महाबलम्।<br>देवदेवं यज्ञमयं वासुदेवं सनातनम्॥ २९उधर वर प्राप्त होते ही उस वरदानसे गर्वित हुआ दैत्यराज हिरण्यकशिपु सभी प्रजाओंको कष्ट देना प्रारम्भ किया। उस दानवने आश्रमोंमें जाकर उन महान् भाग्यशाली मुनियोंको, जो उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, सत्यधर्म-परायण और जितेन्द्रिय थे, धर्षित कर दिया। उस महान् असुरने त्रिभुवनमें स्थित सभी देवताओंको पराजित कर दिया। तब वह दानव त्रिलोकीको अपने अधीन करके स्वर्गमें निवास करने लगा। इस प्रकार कालधर्मकी प्रेरणासे जब उसने वरदानके मदसे उन्मत्त हो दैत्योंको यज्ञभागका अधिकारी बनाया और देवताओंको उनके समुचित यज्ञभागोंसे वञ्चित कर दिया, तब आदित्यगण, साध्यगण, विश्वेदेव, वसुगण, इन्द्रसहित देवगण, यक्ष, सिद्धगण और महर्षिगण—ये सभी उन महाबली विष्णुकी शरणमें गये, जो शरणदाता, देवाधिदेव, यज्ञमूर्ति, वसुदेवके पुत्र और अविनाशी हैं॥ २४—२९॥
देवा ऊचुः<br>नारायण महाभाग देवास्त्वां शरणं गताः।<br>त्रायस्व जहि दैत्येन्द्रं हिरण्यकशिपुं प्रभो॥ ३०<br>त्वं हि नः परमो धाता त्वं हि नः परमो गुरुः।<br>त्वं हि नः परमो देवो ब्रह्मादीनां सुरोत्तम॥ ३१देवताओंने कहा—महाभाग्यशाली नारायण! हम सभी देवता आपकी शरणमें आये हुए हैं, आप हमारी रक्षा कीजिये। प्रभो! आप दैत्यराज हिरण्यकशिपुका वध कीजिये। सुरोत्तम! आप ही हमलोगोंके परम पालक हैं, आप ही हमलोगोंके सर्वोत्कृष्ट गुरु हैं और आप ही हम ब्रह्मा आदि देवताओंके परम देव हैं॥ ३०-३१॥
विष्णुरुवाच<br>भयं त्यजध्वममरा अभयं वो ददाम्यहम् ।<br>तथैव त्रिदिवं देवाः प्रतिपद्यत मा चिरम्॥ ३२भगवान् विष्णुने कहा—देवताओ! तुमलोग भय छोड़ दो। मैं तुमलोगोंको अभयदान दे रहा हूँ। पहलेकी तरह पुनः तुमलोगोंका शीघ्र ही स्वर्गपर अधिकार हो जायगा।