भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 681, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 681
* अध्याय १६१ *६७१
एषोऽहं सगणं दैत्यं वरदानेन दर्पितम्।<br>अवध्यममरेन्द्राणां दानवेन्द्रं निहन्म्यहम्॥ ३३<br>एवमुक्त्वा तु भगवान् विसृज्य त्रिदशेश्वरान्।<br>वधं संकल्पयामास हिरण्यकशिपोः प्रभुः॥ ३४<br>साहाय्यं च महाबाहुरोङ्कारं गृह्य सत्वरम्।<br>अर्थोंकारसहायस्तु भगवान् विष्णुरव्ययः॥ ३५<br>हिरण्यकशिपुस्थानं जगाम हरिरीश्वरः।<br>तेजसा भास्कराकारः शशी कान्त्यैव चापरः॥ ३६<br>नरस्य कृत्वाधंतनुं सिंहस्यार्धतनुं तथा।<br>नारसिंहेन वपुषा पाणिं संस्पृश्य पाणिना॥ ३७<br>ततोऽपश्यत विस्तीर्णां दिव्यां रम्यां मनोरमाम्।<br>सर्वकामयुतां शुभ्रां हिरण्यकशिपोः सभाम्॥ ३८<br>विस्तीर्णां योजनशतं शतमध्यर्धमायताम्।<br>वैहायसीं कामगमां पञ्चयोजनविस्तृताम्॥ ३९<br>जराशोकक्लमापेतां निष्प्रकम्पां शिवां सुखाम्।<br>वेश्महर्म्यवतीं रम्यां ज्वलन्तीमिव तेजसा॥ ४०मैं सेनासहित उस दानवराज दैत्यका, जो वरदानकी प्राप्तिसे गर्वीला और देवेश्वरोंके लिये अवध्य हो गया है, वध करूँगा। ऐसा कहकर महाबाहु भगवान् विष्णुने देवेश्वरोंको विदा कर दिया और स्वयं शीघ्रतापूर्वक ओंकारको (सहायकरूपमें) साथ लेकर हिरण्यकशिपुके वधका विचार करने लगे। तदनन्तर जो सर्वव्यापक, अविनाशी, परमेश्वर, सूर्यके समान तेजस्वी और दूसरे चन्द्रमाके-से कान्तिमान् थे, वे भगवान् श्रीहरि ओंकारको साथ लेकर हिरण्यकशिपुके स्थानपर गये। उस समय वे आधा मनुष्यका और आधा सिंहका शरीर धारण कर नरसिंहारूपसे स्थित हो हाथसे हाथ मल रहे थे। तदनन्तर उन्होंने हिरण्यकशिपुकी चमकती हुई दिव्य सभा देखी, जो विस्तृत, अत्यन्त रुचिर, मनको लुभानेवाली और सम्पूर्ण अभिलषित पदार्थोंसे युक्त थी। सौ योजनके विस्तारमें फैली हुई वह सभा पचास योजन लम्बी और पाँच योजन चौड़ी थी। वह स्वेच्छानुसार आकाशमें उड़नेवाली तथा बुढ़ापा, शोक और थकावटसे रहित, निश्चल, कल्याणकारिणी, सुखदायिनी और परम रमणीय थी। उसमें अट्टालिकाओंसे युक्त भवन बने थे और वह तेजसे प्रज्वलित-सी हो रही थी॥ ३२—४०॥
अन्तःसलिलसंयुक्तां विहितां विश्वकर्मणा।<br>दिव्यरत्नमयैर्वृक्षैः फलपुष्पप्रदैर्युताम्॥ ४१<br>नीलपीतसितश्यामैः कृष्णैर्लोहितकैरपि।<br>अवतानैस्तथा गुल्मैर्मञ्जरीशतधारिभिः॥ ४२<br>सिताभ्रघनसङ्काशा प्लवन्तीव व्यदृश्यत।<br>रश्मिवती भास्वरा च दिव्यगन्धमनोरमा॥ ४३<br>सुसुखा न च दुःखा सा न शीता न च घर्मदा।<br>न क्षुत्पिपासे ग्लानिं वा प्राप्य तां प्राप्नुवन्ति ते॥ ४४<br>नानारूपैरुपकृतां विचित्रैरतिभास्वरैः।<br>स्तम्भैर्न बिभृता सा वै शाश्वती चाक्षपा सदा॥ ४५<br>अति चन्द्रं च सूर्यं च शिखिनं च स्वयम्प्रभा।<br>दीप्यते नाकपृष्ठस्था भासयन्तीव भास्करान्॥ ४६उसके भीतर जलाशय थे। वह फल-पुष्प प्रदान करनेवाले दिव्य रत्नमय वृक्षोंसे संयुक्त थी। उसे विश्वकर्माने बनाया था। वह नीले, पीले, श्वेत, श्याम, कृष्ण और लोहित रंगके आवरणों और सैकड़ों मंजरियोंसे युक्त गुल्मोंसे आच्छादित होनेके कारण श्वेत बादलकी तरह उड़ती हुई-सी दीख रही थी। उसमेंसे किरणें फूट रही थीं। वह चमकीली और दिव्य गन्धसे युक्त होनेके कारण मनोरम थी। वह सर्वथा सुखदायिनी थी। उसमें दुःख, सर्दी और धूपका नाम-निशान नहीं था। उसमें पहुँचकर दानवोंको भूख-प्यास और ग्लानिकी प्राप्ति नहीं होती थी। वह चित्र-विचित्र रंगवाले एवं अत्यन्त चमकीले नाना प्रकारके खम्भोंसे युक्त थी, परंतु उन खम्भोंपर आधारित नहीं थी। वहाँ रात नहीं होती थी, अपितु निरन्तर दिन ही बना रहता था। वह अपनी प्रभासे सूर्य, चन्द्रमा और अग्निका तिरस्कार कर रही थी तथा स्वर्गलोकमें स्थित होकर अनेकों सूर्योंको उद्भासित करती हुई-सी उद्दीप्त हो रही थी।