मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १६१ * | ६७३ |
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| खर्जूर्यो नारिकेलाश्च हरीतग्विभीतकाः ।<br>कालीयका द्रुकालाश्च हिङ्गवः पारियात्रकाः ॥ ६२<br>मन्दारकुन्दलक्ताश्च पतङ्गाः कुटजास्तथा।<br>रक्ताः कुरण्टकाश्चैव नीलाश्चागरुभिः सह ॥ ६३<br>कदम्बाश्चैव भव्याश्च दाडिमा बीजपूरकाः।<br>सप्तपर्णाश्च बिल्वाश्च मधुपैरावृतास्तथा ॥ ६४<br>अशोकाश्च तमालाश्च नानागुल्मलतावृताः।<br>मधूकाः सप्तपर्णाश्च बहवस्तीरगा द्रुमाः ॥ ६५ | खजूर, नारियल, हरीतकी, विभीतक, कालीयक, द्रुकाल, हींग, पारियात्रक, मन्दार, कुन्द, लक्त, पतंग, कुटज, लाल कुरण्टक, अगुरु, कदम्ब, सुन्दर अनार, बिजौरा नींबू, सप्तपर्ण, बेल, भँवरोंसे घिरे हुए अशोक, अनेकों गुल्मों और लताओंसे आच्छादित तमाल, महुआ और सप्तपर्ण आदि बहुत-से वृक्ष तटपर उगे हुए थे॥ ५१–६५॥ |
| लताश्च विविधाकाराः पत्रपुष्पफलोपगाः।<br>एते चान्ये च बहवस्तत्र काननजा द्रुमाः ॥ ६६<br>नानापुष्पफलोपेता व्यराजन्त समंततः।<br>चकोराः शतपत्राश्च मत्तकोकिलसारिकाः ॥ ६७<br>पुष्पिताः पुष्पिताग्रैश्च सम्पतन्ति महाद्रुमाः।<br>रक्तपीतारुणास्तत्र पादपाग्रगताः खगाः ॥ ६८<br>परस्परमवेक्षन्ते प्रहृष्टा जीवजीवकाः।<br>तस्यां सभायां दैत्येन्द्रो हिरण्यकशिपुस्तदा ॥ ६९<br>स्त्रीसहस्रैः परिवृतो विचित्राभरणाम्बरः।<br>अनर्घ्यमणिवज्रार्चिः शिखाज्वलितकुण्डलः ॥ ७०<br>आसीनश्चासने चित्रे दशनल्वप्रमाणतः।<br>दिवाकरनिभे दिव्ये दिव्यास्तरणसंस्तृते ॥ ७१<br>दिव्यगन्धवहस्तत्र मारुतः सुसुखो ववौ।<br>हिरण्यकशिपुर्दैत्य आस्ते ज्वलितकुण्डलः ॥ ७२<br>उपचेरुर्महादैत्यं हिरण्यकशिपुं तदा।<br>दिव्यतानेन गीतानि जगुर्गन्धर्वसत्तमाः ॥ ७३ | वहाँ पत्र, पुष्प और फलसे सुशोभित अनेकों प्रकारकी लताएँ फैली हुई थीं। ये तथा इनके अतिरिक्त अन्यान्य बहुत-से जंगली वृक्ष नाना प्रकारके पुष्पों और फलोंसे लदे हुए चारों ओर शोभा पा रहे थे। चकोर, शतपत्र (कठफोड़वा), मतवाली कोयल और मैना एक पुष्पित वृक्षके पल्लवसे उड़कर दूसरे पुष्पित महान् वृक्षपर बैठ रही थीं। वहाँ रक्त, पीत और अरुण वर्णवाले बहुतेरे पक्षी वृक्षोंके शिखरोंपर बैठे थे तथा चकोर प्रसन्न मनसे परस्पर एक-दूसरेकी ओर देख रहे थे। उसी सभामें उस समय दैत्यराज हिरण्यकशिपु सूर्यके समान चमकीले एवं दिव्य बिछौनोंसे आच्छादित एक दस नल्व* प्रमाणवाले रमणीय दिव्य सिंहासनपर आसीन था। वह विचित्र ढंगके आभूषणों और वस्त्रोंसे सुसज्जित तथा हजारों स्त्रियोंसे घिरा हुआ था। उसके कुण्डल बहुमूल्य मणियों और हीरेकी प्रभासे उद्भासित हो रहे थे। ऐसे उद्दीप्त कुण्डलोंसे विभूषित दैत्यराज हिरण्यकशिपु वहाँ विराजमान था। उस समय दिव्य गन्धसे युक्त परम सुखदायिनी वायु चल रही थी। परिचारकगण महादैत्य हिरण्यकशिपुकी सेवामें जुटे हुए थे। गन्धर्वश्रेष्ठ दिव्य तानद्वारा गीत आलाप रहे थे॥ ६६–७३॥ |
| विश्वाची सहजन्या च प्रम्लोचेत्यभिविश्रुता।<br>दिव्याथ सौरभेयी च समीची पुञ्जिकस्थली ॥ ७४<br>मिश्रकेशी च रम्भा च चित्रलेखा शुचिस्मिता।<br>चारुकेशी घृताची च मेनका चोर्वशी तथा ॥ ७५<br>एताः सहस्रशश्चान्या नृत्यगीतविशारदाः।<br>उपत्तिष्ठन्ति राजानं हिरण्यकशिपुं प्रभुम् ॥ ७६ | उस समय विश्वाची, सहजन्या, सुविख्यात प्रम्लोचा, दिव्या, सौरभेयी, समीची, पुंजिकस्थली, मिश्रकेशी, रम्भा, पवित्र मुसकानवाली चित्रलेखा, चारुकेशी, घृताची, मेनका तथा उर्वशी—ये तथा अन्य हजारों नाचने-गानेमें निपुण अप्सराएँ सामर्थ्यशाली दैत्यराज हिरण्यकशिपुकी सेवामें उपस्थित थीं। |
* चार सौ हाथका या किसी-किसीके मतसे एक सौ हाथका प्राचीन माप।