भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६७४* मत्स्यपुराण *

| तत्रासीनं महाबाहुं हिरण्यकशिपुं प्रभुम्।<br>उपासते दितेः पुत्राः सर्वे लब्धवरास्तथा ॥ ७७<br>तमप्रतिमकर्माणं शतशोऽथ सहस्रशः।<br>बलिवैरोचनस्तत्र नरकः पृथिवीसुतः ॥ ७८<br>प्रह्लादो विप्रचित्तिश्च गविष्ठश्च महासुरः।<br>सुरहन्ता दुःखहन्ता सुनामा सुमतिर्वरः ॥ ७९<br>घटोदरो महापार्श्वः क्रथनः पिठरस्तथा।<br>विश्वरूपः सुरूपश्च स्वबलश्च महाबलः ॥ ८०<br>दशग्रीवश्च वाली च मेघवासा महासुरः।<br>घटास्योऽकम्पनश्चैव प्रजनश्चेन्द्रतापनः ॥ ८१<br>दैत्यदानवसङ्घाते सर्वे ज्वलितकुण्डलाः।<br>स्रग्विणोवाग्मिनः सर्वे सदैव चरितव्रताः ॥ ८२<br>सर्वे लब्धवराः शूराः सर्वे विगतमृत्युवः।<br>एते चान्ये च बहवो हिरण्यकशिपुं प्रभुम् ॥ ८३<br>उपासन्ति महात्मानं सर्वे दिव्यपरिच्छदाः।<br>विमानैर्विविधाकारैर्भ्राजमानैरिवाग्निभिः ॥ ८४<br>महेन्द्रवपुषः सर्वे विचित्राङ्गदबाहवः।<br>भूषिताङ्गा दितेः पुत्रास्तमुपासन्त सर्वशः ॥ ८५<br>तस्यां सभायां दिव्यायामसुराः पर्वतोपमाः।<br>हिरण्यवपुषः सर्वे दिवाकर समप्रभाः ॥ ८६<br>न श्रुतं नैव दृष्टं हि हिरण्यकशिपोर्यथा।<br>ऐश्वर्यं दैत्यसिंहस्य यथा तस्य महात्मनः ॥ ८७ | अनुपम कर्म करनेवाले सामर्थ्यशाली महाबाहु हिरण्यकशिपुके वहाँ विराजमान होनेपर वरप्राप्तिवाले सैकड़ों-हजारों दैत्य उसकी सेवा करते रहते थे। बलि, विरोचन, भूमि-पुत्र नरक, प्रह्लाद, विप्रचित्ति, महान् असुर गविष्ठ, सुरहन्ता, दुःखहन्ता, सुनामा, असुरश्रेष्ठ सुमति, घटोदर, महापार्श्व, क्रथन, पिठर, विश्वरूप, सुरूप, महाबली स्वबल, दशग्रीव, वाली, महान् असुर मेघवासा, घटास्य, अकम्पन, प्रजन और इन्द्रतापन—ये तथा इनके अतिरिक्त अन्य बहुत-से दैत्यों एवं दानवोंके समुदाय महान् आत्मबलसे सम्पन्न एवं सामर्थ्यशाली हिरण्यकशिपुकी सेवा कर रहे थे। उन सभीके कानोंमें चमकीले कुण्डल झलमला रहे थे और गलेमें माला शोभा पा रही थी। वे सभी बोलनेमें निपुण तथा सदा व्रतका पालन करनेवाले थे। वे सभी शूरवीर, वरदानसे सम्पन्न, मृत्युरहित और दिव्य वस्त्रोंसे विभूषित थे। वे अग्निके समान चमकीले विविध प्रकारके विमानोंसे सम्पन्न थे। उनके शरीर आभूषणोंसे विभूषित थे। उनकी भुजाओंपर विचित्र केयूर बँधा हुआ था और उनके शरीर महेन्द्रके समान सुन्दर थे। इस प्रकार वे दैत्य सब तरहसे हिरण्यकशिपुकी उपासना कर रहे थे। उस दिव्य सभामें बैठनेवाले सभी असुर पर्वतके समान विशालकाय थे। उनका शरीर स्वर्णके समान चमकीला था और उनकी कान्ति सूर्यके समान थी। महान् आत्मबलसे सम्पन्न उस दैत्यसिंह हिरण्यकशिपुका जैसा ऐश्वर्य था, वैसा न कभी देखा गया था और न सुना ही गया था॥ ७७–८७॥ | | कनकरजतचित्रवेदिकायां<br>परिहतरलविचित्रवीथिकायाम् ।<br>स ददर्श मृगाधिपः सभायां<br>सुरचितरत्नगवाक्षशोभितायाम् ॥ ८८<br>कनकविमलहारविभूषिताङ्गं<br>दितितनयं स मृगाधिपो ददर्श।<br>दिवसकरमहाप्रभाव्वलन्तं<br>दितिजसहस्रशतैर्निषेव्यमाणम् ॥ ८९ | जिसमें सुवर्ण और चाँदीकी सुन्दर वेदिकाएँ बनी थीं, रत्नजटित होनेके कारण जिसकी गलियाँ अत्यन्त मनोहर लग रही थीं और जो सुन्दर ढंगसे बनाये गये रत्नोंके झरोखोंसे सुशोभित थी। उस सभामें भगवान् नृसिंहने दितिनन्दन हिरण्यकशिपुको देखा, उसका शरीर स्वर्णनिर्मित विमल हारसे विभूषित था, वह सूर्यकी उत्कट प्रभाके समान उद्दीप्त हो रहा था और उसकी सैकड़ों-हजारों दैत्य सेवा कर रहे थे॥ ८८-८९॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नारसिंहप्रादुर्भावे एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नारसिंहप्रादुर्भावप्रसङ्गमें एक सौ एकसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६१॥