मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १६३ * | ६७९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तामापतन्तीं सम्प्रेक्ष्य मृगेन्द्रः शक्तिमुज्ज्वलाम्।<br>हुङ्कारेणैव रौद्रेण बभञ्ज भगवांस्तदा॥ १३<br><br>रराज भग्ना सा शक्तिर्मृगेन्द्रेण महीतले।<br>सविस्फुलिङ्गा ज्वलिता महोल्केव दिवश्च्युता॥ १४<br><br>नाराचपङ्क्तिः सिंहस्य प्राप्ता रेजेऽविदूरतः।<br>नीलोत्पलपलाशानां मालेवोज्ज्वलदर्शना॥ १५<br><br>स गर्जित्वा यथान्यायं विक्रम्य च यथासुखम्।<br>तत्सैन्यमुत्सारितवांस्तृणाग्राणीव मारुतः॥ १६<br><br>ततोऽश्मवर्षं दैत्येन्द्रा व्यसृजन्त नभोगताः।<br>नगमात्रैः शिलाखण्डैर्गिरिशृङ्गैर्महाप्रभैः॥ १७<br><br>तदश्मवर्षं सिंहस्य महन्मूर्धनि पातितम्।<br>दिशो दश विशीर्णा वै खद्योतप्रकरा इव॥ १८<br><br>तदाश्मौघैर्दैत्यगणाः पुनः सिंहमरिन्दमम्।<br>छादयांचक्रिरे मेघा धाराभिरिव पर्वतम्॥ १९<br><br>न च तं चालयामासुर्दैत्यौघा देवसत्तमम्।<br>भीमवेगोऽचलश्रेष्ठं समुद्र इव मन्दरम्॥ २० | रही थी। तब उस उज्ज्वल शक्तिको अपनी ओर आती हुई देखकर भगवान् नरसिंहने अपने भयंकर हुंकारसे ही उसे तोड़कर टूक-टूक कर दिया। नरसिंहद्वारा तोड़ी गयी वह शक्ति ऐसी शोभा पा रही थी, जैसे आकाशमें भूतलपर गिरी हुई चिनगारियोंसहित प्रज्वलित महान् उल्का हो। नरसिंहके निकट पहुँची हुई (दैत्योंद्वारा छोड़े गये) बाणोंकी उज्ज्वल वर्णवाली पंक्ति नीले कमल-दलकी मालाकी तरह शोभा पा रही थी। यह देखकर भगवान् नरसिंहने न्यायतः पराक्रम प्रदर्शित कर सुखपूर्वक गर्जना की और उस दानवसेनाको वायुद्वारा उड़ाये गये क्षुद्र तिनकोंकी तरह खदेड़ दिया। तदुपरान्त दैत्येश्वरगण आकाशमें स्थित होकर पत्थरकी वर्षा करने लगे। पत्थरोंकी वह वर्षा नरसिंहके विशाल मस्तकपर गिरकर चूर-चूर हो जुगनुओंके समूहकी भाँति दसों दिशाओंमें बिखर गयी। तब दैत्यगणोंने पुनः पर्वत-सरीखे शिलाखण्डों, पर्वत-शिखरों और पत्थरोंसे उन शत्रुसूदन नरसिंहको इस प्रकार आच्छादित कर दिया, जैसे मेघ जलकी धाराओंद्वारा पर्वतको ढक देते हैं। फिर भी वह दैत्यसमुदाय उन देवश्रेष्ठ नरसिंहको उसी प्रकार विचलित नहीं कर सका, जैसे भयंकर वेगशाली समुद्र पर्वतश्रेष्ठ मन्दरको नहीं डिगा सका॥ १२–२०॥ |
| ततोऽश्मवर्षे विहते जलवर्षमनन्तरम्।<br>धाराभिरक्षमात्राभिः प्रादुरासीत्समन्ततः॥ २१<br><br>नभसः प्रच्युता धारास्तिग्मवेगाः समंततः।<br>आवृत्य सर्वतो व्योम दिशश्चोपविशस्तथा॥ २२<br><br>धारा दिवि च सर्वत्र वसुधायां च सर्वशः।<br>न स्पृशन्ति च ता देवं निपतन्त्योऽनिशं भुवि॥ २३<br><br>बाह्यतो ववृषुर्वर्षं नोपरिष्टाच्च ववृषुः।<br>मृगेन्द्रप्रतिरूपस्य स्थितस्य युधि मायया॥ २४<br><br>हतेऽश्मवर्षे तुमुले जलवर्षे च शोषिते।<br>सोऽसृजद् दानवो मायामग्निवायुसमीरिताम्॥ २५<br><br>महेन्द्रस्तोयदैः सार्धं सहस्राक्षो महाद्युतिः।<br>महता तोयवर्षेण शमयामास पावकम्॥ २६ | तदनन्तर पत्थरोंकी वृष्टिके विफल हो जानेपर चारों ओर मूसलाधार जलकी वृष्टि होने लगी। चारों ओर आकाशसे गिरती हुई वे तीव्र वेगशाली धाराएँ सब ओरसे आकाश, दिशाओं तथा विदिशाओंको आच्छादित करके लगातार भूतलपर गिर रही थीं। यद्यपि वे धाराएँ आकाश तथा पृथ्वीपर सर्वत्र सब प्रकारसे व्याप्त थीं, तथापि वे भगवान् नरसिंहका स्पर्श नहीं कर पा रही थीं। युद्धभूमिमें मायाद्वारा मृगेन्द्रका रूप धारण करनेवाले भगवान्के ऊपर वे धाराएँ नहीं गिर रही थीं, अपितु बाहर चारों ओर वर्षा कर रही थीं। इस प्रकार जब वह शिलावृष्टि नष्ट कर दी गयी और घनघोर जलवृष्टि सोख ली गयी, तब दानवराज हिरण्यकशिपुने अग्नि और वायुद्वारा प्रेरित मायाका विस्तार किया, किंतु परम कान्तिमान् सहस्र नेत्रधारी महेन्द्रने बादलोंके साथ वहाँ आकर जलकी घनघोर वृष्टिसे उस अग्निको शान्त कर |