मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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६८० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तस्यां प्रतिहतायां तु मायायां युधि दानवः।<br>असृजद् घोरसंकाशं तमस्तीव्रं समन्ततः॥ २७<br>तमसा संवृते लोके दैत्येष्वात्तायुधेषु च।<br>स्वतेजसा परिवृतो दिवाकर इवावभौ॥ २८<br>त्रिशिखां भृकुटीं चास्य ददृशुर्दानवा रणे।<br>ललाटस्थां त्रिशूलाङ्कां गङ्गां त्रिपथगामिव॥ २९ | दिया। युद्धस्थलमें उस मायाके नष्ट हो जानेपर उस दानवने चारों ओर भयंकर दीखनेवाले घने अन्धकारकी सृष्टि की। उस समय सारा जगत् अन्धकारसे ढक गया और दैत्यगण अपना-अपना हथियार लिये डटे रहे। उसके मध्य अपने तेजसे घिरे हुए भगवान् नरसिंह सूर्यकी तरह शोभा पा रहे थे। दानवोंने रणभूमिमें नरसिंहके ललाटमें स्थित त्रिशूलकी-सी आकारवाली उनकी त्रिशिखा भृकुटिको देखा, जो त्रिपथगा गङ्गाकी तरह प्रतीत हो रही थी॥ २१—२९॥ |
| ततः सर्वासु मायासु हतासु दितिनन्दनाः।<br>हिरण्यकशिपुं दैत्यं विवर्णाः शरणं ययुः॥ ३०<br>ततः प्रज्वलितः क्रोधात् प्रदहन्निव तेजसा।<br>तस्मिन् क्रुद्धे तु दैत्येन्द्रे तमोभूतमभूज्जगत्॥ ३१<br>आवहः प्रवहश्चैव विवहोऽथ ह्युदावहः।<br>परावहः संवहश्च महाबलपराक्रमाः॥ ३२<br>तथा परिवहः श्रीमानुत्पातभयशंसाः।<br>इत्येवं क्षुभिताः सप्त मरुतो गगनेचराः॥ ३३<br>ये ग्रहाः सर्वलोकस्य क्षये प्रादुर्भवन्ति वै।<br>ते सर्वे गगने दृष्टा व्यचरन्त यथासुखम्॥ ३४<br>अयोगतश्चाप्यचरद् योगं निशि निशाकरः।<br>सग्रहः सह नक्षत्रै राकापतिररिन्दमः॥ ३५<br>विवर्णतां च भगवान् गतो दिवि दिवाकरः।<br>कृष्णं कबन्धं च तथा लक्ष्यते सुमहद्दिवि॥ ३६<br>अमुञ्चच्चार्चिषां वृन्दं भूमिवृत्तिर्विभावसुः।<br>गगनस्थश्च भगवानभीक्ष्णं परिदृश्यते॥ ३७<br>सप्त धूम्रनिभा घोरा सूर्याद्दिवि समुत्थिताः।<br>सोमस्य गगनस्थस्य ग्रहास्तिष्ठन्ति शृङ्गगाः॥ ३८<br>वामे तु दक्षिणे चैव स्थितौ शुक्रबृहस्पती।<br>शनैश्चरो लोहिताङ्गो ज्वलनाङ्गासमद्युती॥ ३९<br>समं समधिरोहन्तः सर्वे ते गगनेचराः।<br>शृङ्गानि शनकैर्घोरा युगान्तावर्तिनो ग्रहाः॥ ४० | इस प्रकार सभी मायाओंके नष्ट हो जानेपर तेजोहीन दैत्य अपने स्वामी हिरण्यकशिपुकी शरणमें गये। यह देख वह अपने तेजसे जगत्को जलाता-सा क्रोधसे प्रज्वलित हो उठा। उस दैत्येन्द्रके क्रुद्ध होनेपर सारा जगत् अन्धकारमय हो गया। पुनः आवह, प्रवह, विवह, उदावह, परावह, संवह तथा श्रीमान् परिवह—ये महान् बल एवं पराक्रमसे सम्पन्न आकाशचारी सातों वायुमार्ग उत्पातके भयकी सूचना देते हुए क्षुब्ध हो उठे। समस्त लोकोंके विनाशके अवसरपर जो ग्रह प्रकट होते हैं, वे सभी आकाशमें दृष्टिगोचर होकर सुखपूर्वक विचरण करने लगे। राहुने अमा एवं पूर्णिमाके बिना ही ग्रहणका दृश्य उपस्थित कर दिया। रातमें नक्षत्रों और ग्रहोंसहित राकापति शत्रुसूदन चन्द्रमा और दिनमें भगवान् सूर्य कान्तिहीन हो गये तथा आकाशमें अत्यन्त विशाल काले रंगका कबन्ध (धूमकेतु) दिखायी देने लगा। भगवान् अग्नि एक ओर पृथ्वीपर रहकर चिनगारियाँ छोड़ने लगे और दूसरी ओर वे निरन्तर आकाशमें भी स्थित दिखायी दे रहे थे। आकाशमण्डलमें धुएँकी-सी कान्तिवाले सात भयंकर सूर्य प्रकट हो गये। ग्रहगण आकाशमें स्थित चन्द्रमाके शिखरपर स्थित हो गये। उनके वामभागमें शुक्र और दाहिने भागमें बृहस्पति स्थित हो गये। अग्निके समान कान्तिमान् शनैश्चर और मङ्गल भी दृष्टिगोचर हुए। युगान्तके समय प्रकट होनेवाले वे सभी भयंकर ग्रह शनैः-शनैः एक साथ शिखरोंपर आरूढ़ हो आकाशमें विचरण करने लगे॥ ३०—४०॥ |
| चन्द्रमाश्च सनक्षत्रैर्ग्रहैः सह तमोनुदः।<br>चराचरविनाशाय रोहिणीं नाभ्यनन्दत॥ ४१<br>गृह्यते राहुणा चन्द्र उल्काभिरभिहन्यते।<br>उल्काः प्रज्वलिताश्चन्द्रे विचरन्ति यथासुखम्॥ ४२ | इसी प्रकार अन्धकारका विनाश करनेवाले चन्द्रमा नक्षत्रों और ग्रहोंके साथ रहकर चराचर जगत्का विनाश करनेके लिये रोहिणीका अभिनन्दन नहीं कर रहे थे। राहु चन्द्रमाको ग्रस्त कर रहा था और उल्काएँ उन्हें मार भी रही थीं। प्रज्वलित उल्काएँ चन्द्रलोकमें सुखपूर्वक |