मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
पृष्ठ 698, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 698
६८८ * मत्स्यपुराण *
एक सौ पैंसठवाँ अध्याय
चारों युगोंकी व्यवस्थाका वर्णन
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
|---|---|
| चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तु कृतं युगम्।<br>तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा रविनन्दन ॥ १<br>यत्र धर्मश्चतुष्पादस्त्वधर्मः पादविग्रहः।<br>स्वधर्मनिरताः सन्तो जायन्ते यत्र मानवाः ॥ २<br>विप्राः स्थिता धर्मपरा राजवृत्तौ स्थिता नृपाः।<br>कृष्यामभिरता वैश्याः शूद्राः शुश्रूषवः स्थिताः ॥ ३<br>तदा सत्यं च शौचं च धर्मश्चैव विवर्धते।<br>सद्भिर्बाचरितं कर्म क्रियते ख्यायते च वै॥ ४<br>एतत्कार्त्तयुगं वृत्तं सर्वेषामपि पार्थिव।<br>प्राणिनां धर्मसङ्गानामपि वै नीचजन्मनाम् ॥ ५<br>त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते।<br>तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा परिकीर्त्यते ॥ ६<br>द्वाभ्यामधर्मः पादाभ्यां त्रिभिर्धर्मो व्यवस्थितः।<br>यत्र सत्यं च सत्त्वं च त्रेताधर्मो विधीयते ॥ ७<br>त्रेतायां विकृतिं यान्ति वर्णास्त्वेते न संशयः।<br>चतुर्वर्णस्य वैकृत्याद्यान्ति दौर्बल्यमाश्रमाः ॥ ८<br>एषा त्रेतायुगगतिर्विचित्रा देवनिर्मिता।<br>द्वापरस्य तु या चेष्टा तामपि श्रोतुमर्हसि ॥ ९ | रविनन्दन! कृतयुगकी अवधि चार हजार दिव्य वर्षोंकी बतलायी जाती है और उसकी संध्या उससे दुगुनी शती अर्थात् आठ सौ वर्षोंकी होती है। उस युगमें धर्म अपने चारों पादोंसे विद्यमान रहता है और अधर्म चतुर्थांशमात्र रहता है। उस युगमें उत्पन्न होनेवाले मानव अपने धर्ममें निरत रहते हैं। ब्राह्मण धर्म-पालनमें तत्पर रहते हैं। क्षत्रिय राज-धर्ममें स्थित रहते हैं। वैश्य कृषिकर्ममें लगे रहते हैं और शूद्र सेवाकार्यमें तल्लीन रहते हैं। उस समय सत्य, शौच और धर्मकी अभिवृद्धि होती है। सभी लोग सत्पुरुषोंद्वारा आचरित कर्मका अनुकरण करते हैं और उसकी प्रशंसा करते हैं। पार्थिव! कृतयुगका यह आचार सभी प्राणियोंमें पाया जाता है, चाहे वे धर्मप्राण विप्र आदि हों अथवा नीच जातिके हों। इसके बाद तीन हजार दिव्य वर्षोंका त्रेतायुग कहलाता है। उसकी संध्या उससे दुगुनी शती अर्थात् छः सौ वर्षकी कही गयी है। इस युगमें धर्म तीन चरणोंसे और अधर्म दो पादोंसे स्थित रहता है। उस समय त्रेताधर्म सत्य और सत्त्वगुणप्रधान माना जाता है। इसमें संदेह नहीं कि त्रेतायुगमें ये ब्राह्मणादि चारों वर्ण (कुछ) विकृत हो जाते हैं और इनके विकृत हो जानेके कारण चारों आश्रम भी दुर्बलताको प्राप्त हो जाते हैं। भगवान्द्वारा निर्मित त्रेतायुगकी यह विचित्र गति है। अब द्वापरयुगकी जो चेष्टा है, उसे भी सुनिये॥ १—९॥ |
| द्वापरं द्वे सहस्रे तु वर्षाणां रविनन्दन।<br>तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा युगमुच्यते ॥ १०<br>तत्र चार्थपराः सर्वे प्राणिनो रजसा हताः।<br>सर्वे नैष्कृतिकाः क्षुद्रा जायन्ते रविनन्दन ॥ ११<br>द्वाभ्यां धर्मः स्थितः पद्भ्यामधर्मस्त्रिभिरुत्थितः।<br>विपर्ययाच्छनैर्धर्मः क्षयमेति कलौ युगे ॥ १२<br>ब्राह्मण्यभावस्य ततस्तथौत्सुक्यं विशीर्यते।<br>व्रतोपवासास्त्यज्यन्ते द्वापरे युगपर्यये ॥ १३ | रविनन्दन! द्वापरयुग दो हजार दिव्य वर्षोंका होता है। उसकी संध्या चार सौ वर्षोंकी कही जाती है। सूर्यपुत्र! उस युगमें रजोगुणसे ग्रस्त सभी प्राणी अर्थपरायण होते हैं। उस युगमें जन्म लेनेवाले सभी प्राणी निष्कर्मी एवं क्षुद्र विचारवाले होते हैं। उस समय धर्म दो चरणोंसे स्थित रहता है और अधर्मकी वृद्धि तीन चरणोंसे होती है। इस प्रकार धीरे-धीरे परिवर्तन होनेके कारण कलियुगमें धर्म नष्ट हो जाता है। द्वापरयुगके परिवर्तनके समय लोगोंमें ब्राह्मणोंके प्रति आस्था नष्ट हो जाती है और लोग व्रत-उपवास आदिको छोड़ बैठते हैं। उस समय |