मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १६५ * | ६८९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तथा वर्षसहस्रं तु वर्षाणां द्वे शते अपि।<br>संध्यया सह संख्यातं क्रूरं कलियुगं स्मृतम्॥ १४<br>यत्राधर्मश्चतुष्पादः स्याद् धर्मः पादविग्रहः।<br>कामिनस्तपसा हीना जायन्ते तत्र मानवाः॥ १५<br>नैवातिसात्त्विकः कश्चिन्न साधुर्न च सत्यवाक्।<br>नास्तिका ब्रह्मभक्ता वा जायन्ते तत्र मानवाः॥ १६<br>अहंकारगृहीताश्च प्रक्षीणस्नेहबन्धनाः।<br>विप्राः शूद्रसमाचाराः सन्ति सर्वे कलौ युगे॥ १७<br>आश्रमाणां विपर्यासः कलौ सम्परिवर्तते।<br>वर्णानां चैव संदेहो युगान्ते रविनन्दन॥ १८ | क्रूर कलियुगका प्रवेश होता है, जिसकी संख्या संध्याके दो सौ वर्षोंसहित एक हजारकी बतलायी गयी है। उस युगमें अधर्म चारों पादोंसे प्रभावी हो जाता है और धर्म चतुर्थांशमात्र रह जाता है। उस युगमें जन्म लेनेवाले मानव कामपरायण और तपस्यासे हीन होते हैं। कलियुगमें उत्पन्न होनेवाले मानवोंमें न तो कोई अत्यन्त सात्त्विक होता है और न साधुस्वभाव एवं सत्यवादी ही होता है। सभी नास्तिक हो जाते हैं और अपनेको परब्रह्मका भक्त बतलाते हैं। लोग अहंकारके वशीभूत और प्रेमबन्धनसे रहित हो जाते हैं। कलियुगमें सभी ब्राह्मण शूद्रके समान आचरण करने लगते हैं। रविनन्दन ! कलियुगमें आश्रमोंमें भी परिवर्तन हो जाता है। युगान्तका समय आनेपर तो लोगोंमें वर्णोंका भी संदेह उत्पन्न हो जाता है॥ १०—१८॥ |
| विद्याद् द्वादशसाहस्रीं युगाख्यां पूर्वनिर्मिताम्।<br>एवं सहस्रपर्यन्तं तदहर्ब्राह्ममुच्यते॥ १९<br>ततोऽहनि गते तस्मिन् सर्वेषामेव जीविनाम्।<br>शरीरनिर्वृत्तिं दृष्ट्वा लोकसंहारबुद्धितः॥ २०<br>देवतानां च सर्वासां ब्रह्मादीनां महीपते।<br>दैत्यानां दानवानां च यक्षराक्षसपक्षिणाम्॥ २१<br>गन्धर्वाणामप्सरसां भुजङ्गानां च पार्थिव।<br>पर्वतानां नदीनां च पशूनां चैव सत्तम।<br>तिर्यग्योनिगतानां च सत्त्वानां कृमिणां तथा॥ २२<br>महाभूतपतिः पञ्च हृत्वा भूतानि भूतकृत्।<br>जगत्संहरणार्थाय कुरुते वशसं महत्॥ २३<br>भूत्वा सूर्यश्चक्षुषी चाददानो<br>भूत्वा वायुः प्राणिनां प्राणजालम्।<br>भूत्वा वह्निर्दहन् सर्वलोकान्<br>भूत्वा मेघो भूय उग्रोऽप्यवर्षत्॥ २४ | महीपते ! इस प्रकार पूर्वकालमें निर्मित बारह हजारकी युग-संख्या जाननी चाहिये। इस प्रकार जब एक हजार चतुर्युगी बीत जाती है, तब ब्रह्माका एक दिन कहा जाता है। ब्रह्माके उस दिनके व्यतीत हो जानेपर जीवोंके उत्पादक महाभूतपति श्रीहरि सभी प्राणियोंके शरीर-मोक्षको देखकर लोकसंहारकी भावनासे ब्रह्मा आदि सभी देवताओं, दैत्यों, दानवों, यक्षों, राक्षसों, पक्षियों, गन्धर्वों, अप्सराओं, नागों, पर्वतों, नदियों, पशुओं, तिर्यग्योनिमें उत्पन्न हुए जीवों तथा कीटोंके पञ्चमहाभूतोंका विनाश कर जगत्का संहार करनेके निमित्त महान् विनाशकारी दृश्य उत्पन्न कर देते हैं। उस समय वे सूर्य बनकर सभीके नेत्रोंकी ज्योति नष्ट कर देते हैं, वायुरूप होकर जीवोंके प्राणसमूहको समेट लेते हैं, अग्निका रूप धारणकर सभी लोकोंको जलाकर भस्म कर देते हैं तथा मेघ बनकर पुनः भयंकर वृष्टि करते हैं॥ १९—२४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावे पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रसङ्गमें एक सौ पैंसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६५॥