मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १६७ * | ६९५ |
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| श्रीभगवानुवाच | श्रीभगवान्ने कहा—'वत्स! मैं पुराणप्रसिद्ध हृषीकेश | | अहं ते जनको वत्स हृषीकेशः पिता गुरुः।<br>आयुष्प्रदाता पौराणः किं मां त्वं नोपसर्पसि॥ ४२ | ही तुम्हें जन्म देनेवाला तुम्हारा पिता और गुरु हूँ। मैंने ही तुम्हें दीर्घायु प्रदान किया है, तुम मेरे निकट क्यों नहीं | | मां पुत्रकामः प्रथमं पिता तेऽङ्गिरसो मुनिः।<br>पूर्वमाराधयामास तपस्तीव्रं समाश्रितः॥ ४३ | आ रहे हो? तुम्हारे पिता अङ्गिरा मुनिने पहले पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे कठोर तपका आश्रय ले मेरी आराधना | | ततस्त्वां घोरतपसा प्रावृणोदमितौजसम्।<br>उक्तवानहमात्मस्थं महर्षिममितौजसम्॥ ४४ | की थी और उस घोर तपस्याके परिणामस्वरूप तुम्हारे-जैसे अमित ओजस्वी पुत्रका वरदान माँगा था, तब मैंने उन आत्मज्ञानमें लीन एवं अमित पराक्रमी महर्षिको वरदान दिया था। अन्यथा तुम्हारे अतिरिक्त पञ्चभूतात्मक | | कः समुत्सहते चान्यो यो न भूतात्मकात्मजः।<br>द्रष्टुमेकार्णवगतं क्रीडन्तं योगवर्त्मना॥ ४५ | शरीरधारीका पुत्र दूसरा कौन है, जो एकार्णवके जलमें योगमार्गका आश्रय लेकर क्रीडा करते हुए मुझे देखनेका | | ततः प्रहृष्टवदनो विस्मयोत्फुल्ललोचनः।<br>मूर्ध्नि बद्धाञ्जलिपुटो मार्कण्डेयो महातपाः॥ ४६ | साहस कर सकता है? यह सुनकर महातपस्वी मार्कण्डेयका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा और उनके नेत्र विस्मयसे उत्फुल्ल हो गये। तब वे लोकपूजित दीर्घायु मुनि मस्तकपर | | नामगोत्रे ततः प्रोच्य दीर्घायुर्लोकपूजितः।<br>तस्मै भगवते भक्त्या नमस्कारमथाकरोत्॥ ४७ | हाथ जोड़कर नाम और गोत्रका उच्चारण करके भक्तिपूर्वक उन भगवान्को नमस्कार करते हुए बोले॥ ४२-४७॥ | | मार्कण्डेय उवाच | **मार्कण्डेयजीने कहा—**अनघ! मैं आपकी इस | | इच्छेयं तत्त्वतो मायामिमां ज्ञातुं तवानघ।<br>यदेकार्णवमध्यस्थः शेषे त्वं बालरूपवान्॥ ४८ | मायाको तत्त्वपूर्वक जानना चाहता हूँ, जो आप बालकका रूप धारण करके इस एकार्णवके जलके मध्यमें स्थित होकर शयन करते हैं। ऐश्वर्यशाली प्रभो! आप लोकमें | | किं संज्ञश्चैव भगवाँल्लोके विज्ञायसे प्रभो।<br>तर्कये त्वां महात्मानं को ह्यन्यः स्थातुमर्हति॥ ४९ | किस नामसे विख्यात होते हैं? मैं आपको एक महान् आत्मबल-सम्पन्न पुरुष मानता हूँ, अन्यथा दूसरा कौन इस प्रकार स्थित रह सकता है॥ ४८-४९॥ | | श्रीभगवानुवाच | **श्रीभगवान् बोले—**ब्रह्मन्! मैं सभी प्राणियोंको | | अहं नारायणो ब्रह्मन् सर्वभूः सर्वनाशनः।<br>अहं सहस्त्रशीर्षाख्यैः पदैरभिसंज्ञितः॥ ५० | उत्पन्न करनेवाला तथा सबका विनाशक नारायण हूँ। जो सहस्रशीर्ष आदि नामोंसे अभिहित होता है, वह मैं ही | | आदित्यवर्णः पुरुषो मखे ब्रह्ममयो मखः।<br>अहमग्निर्हव्यवाहो यादसां पतिरव्ययः॥ ५१ | हूँ। मैं ही आदित्यवर्ण पुरुष और यज्ञमें ब्रह्ममय यज्ञ हूँ। मैं ही हव्यको वहन करनेवाला अग्नि और जल-जन्तुओंका अविनाशी स्वामी हूँ। इन्द्रपदपर स्थित रहनेवाला | | अहमिन्द्रपदे शक्रो वर्षाणां परिवत्सरः।<br>अहं योगी युगाख्यश्च युगान्तावर्त एव च॥ ५२ | इन्द्र तथा वर्षोंमें परिवत्सर मैं हूँ। मैं ही योगी, युग नामसे प्रसिद्ध और युगोंका अन्त करनेवाला हूँ। समस्त | | अहं सर्वाणि सत्त्वानि दैवतान्यखिलानि तु।<br>भुजङ्गानामहं शेषस्तार्क्ष्यो वै सर्वपक्षिणाम्॥ ५३ | प्राणी और सम्पूर्ण देवता मेरे ही स्वरूप हैं। मैं सर्पोंमें शेषनाग और सम्पूर्ण पक्षियोंमें गरुड हूँ। मैं सभी प्राणियोंका | | कृतान्तः सर्वभूतानां विश्वेषां कालसंज्ञितः।<br>अहं धर्मस्तपश्चाहं सर्वाश्रमनिवासिनाम्॥ ५४ | अन्त करनेवाला तथा लोकोंका काल हूँ। चारों आश्रमोंमें निवास करनेवाले मनुष्योंका धर्म और तप मैं ही हूँ। मैं | | अहं चैव सरिद्दिव्या क्षीरोदश्च महार्णवः।<br>यत्तत्सत्यं च परममहमेकः प्रजापतिः॥ ५५ | दिव्य नदी गङ्गा और दुग्धरूपी जलसे भरा हुआ महासागर हूँ। जो परम सत्य है, वह मैं हूँ। मैं ही एकमात्र प्रजापति हूँ। |