मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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६९६ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अहं सांख्यमहं योगोऽप्यहं तत्परमं पदम्।<br>अहमिज्याक्रिया चाहमहं विद्याधिपः स्मृतः॥ ५६<br>अहं ज्योतिरहं वायुरहं भूमिरहं नभः।<br>अहमापः समुद्राश्च नक्षत्राणि दिशो दश॥ ५७<br>अहं वर्षमहं सोमः पर्जन्योऽहमहं रविः।<br>क्षीरोदसागरे चाहं समुद्रे वडवामुखः॥ ५८ | मैं ही सांख्य, मैं ही योग और मैं ही वह परमपद हूँ। मैं ही यज्ञकी क्रिया और मैं ही विद्याका अधिपति कहलाता हूँ। मैं ही अग्नि, मैं ही वायु, मैं ही पृथ्वी, मैं ही आकाश, मैं ही जल, समुद्र, नक्षत्र और दसों दिशाएँ हूँ। मैं ही वर्ष, मैं ही चन्द्रमा, मैं ही बादल तथा मैं ही रवि हूँ। क्षीरसागरमें शयन करनेवाला मैं ही हूँ। मैं ही समुद्रमें बडवाग्नि हूँ॥ ५०—५८॥ |
| वह्निः संवर्तको भूत्वा पिबंस्तोयमयं हविः।<br>अहं पुराणः परमं तथैवाहं परायणम्॥ ५९<br>अहं भूतस्य भव्यस्य वर्तमानस्य सम्भवः।<br>यत्किञ्चित् पश्यसे विप्र यच्छृणोषि च किञ्चन॥ ६०<br>यल्लोके चानुभवसि तत्सर्वं मामनुस्मर।<br>विश्वं सृष्टं मया पूर्वं सृज्यं चाद्यापि पश्य माम्॥ ६१<br>युगे युगे च स्रक्ष्यामि मार्कण्डेयाखिलं जगत्।<br>तदेतदखिलं सर्वं मार्कण्डेयावधारय॥ ६२<br>शुश्रूषर्मम धर्मांश्च कुक्षौ चर सुखं मम।<br>मम ब्रह्मा शरीरस्थो देवैश्च ऋषिभिः सह॥ ६३<br>व्यक्तमव्यक्तयोगं मामवगच्छासुरद्विषम्।<br>अहमेकाक्षरो मन्त्रस्त्र्यक्षरश्चैव तारकः॥ ६४<br>परस्त्रिवर्गादोंकारस्त्रिवर्गार्थनिदर्शनः ।<br>एवमादिपुराणेशो वदन्नेव महामतिः॥ ६५<br>वक्त्रमाहूतवानाशु मार्कण्डेयं महामुनिम्।<br>ततो भगवतः कुक्षिं प्रविष्टो मुनिसत्तमः।<br>स तस्मिन् सुखमेकान्ते शुश्रूषुर्हसमव्ययम्॥ ६६<br>योऽहमेव विविधतनुं परिश्रितो<br>महार्णवे व्यपगतचन्द्रभास्करे।<br>शनैश्चरन् प्रभुरपि हंससंज्ञितो-<br>ऽसृजज्जगद्विरहितकालपर्यये॥ ६७ | मैं ही संवर्तक अग्नि बनकर जलरूप हविका पान करता हूँ। जैसे मैं पुराण-पुरुष हूँ, उसी प्रकार मैं सबके लिये आश्रयदाता भी हूँ। भूत, भविष्य और वर्तमानका उत्पत्तिस्थान मैं हूँ। विप्रवर! तुम जो कुछ देख रहे हो, जो कुछ सुन रहे हो और लोकमें जिसका अनुभव कर रहे हो, उस सबमें मेरा ही स्मरण करो। मार्कण्डेय! पूर्वकालमें मैंने ही विश्वकी सृष्टि की थी और इस समय भी सृष्टिकर्ता मुझे ही समझो। मार्कण्डेय! प्रत्येक युगमें मैं ही सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करता हूँ, अतः तुम इन सबका रहस्य इस प्रकार जानो। यदि तुम मेरे धर्मोंको सुनना चाहते हो तो मेरी कुक्षिमें प्रवेश करके सुखपूर्वक विचरण करो। देवताओं और ऋषियोंके साथ ब्रह्मा मेरे शरीरमें ही विद्यमान हैं। मुझे ही व्यक्त (प्रकट) और अव्यक्त (अप्रकट) योगवाला तथा असुरोंका शत्रु समझो। मैं ही एक अक्षर तथा तीन अक्षरोंवाला तारक मन्त्र हूँ। त्रिवर्गसे परे तथा त्रिवर्गके अभिप्रायको निर्दिष्ट करनेवाला ओंकार मैं ही हूँ। आदि पुराणेश महाबुद्धिमान् भगवान् इस प्रकार कह ही रहे थे कि उन्होंने शीघ्र ही महामुनि मार्कण्डेयको अपने मुखमें समेट लिया। तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेय भगवान्की कुक्षिमें प्रविष्ट हो गये और उस एकान्त स्थानमें अविनाशी हंसधर्मको सुननेकी इच्छासे सुखपूर्वक विचरण करने लगे। (इतनेमें ही ऐसी ध्वनि सुनायी पड़ी—) मैं ही वह हूँ, जो चन्द्रमा और सूर्यसे रहित महार्णवके जलमें विविध शरीर धारण कर समर्थ होते हुए भी शनैः-शनैः विचरण करता हूँ और हंस नामसे पुकारा जाता हूँ तथा काल-परिवर्तनके समाप्त होनेपर पुनः जगत्की सृष्टि करता हूँ॥ ५९—६७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावे सप्तषष्ठ्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रादुर्भाव-प्रसङ्गमें एक सौ सड़सठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६७॥