भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 711, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 711
* अध्याय १७० *७०१

| ब्रह्मोवाच<br>एक इत्युच्यते लोकैरविचिन्त्यः सहस्रदृक् ।<br>तत्संयोगेन भवतोः कर्म नामावगच्छताम् ॥ १३ | ब्रह्माने कहा— जो ध्यानसे परे एवं हजारों नेत्रोंवाला है, उस परम पुरुषको तो लोग अद्वितीय बतलाते हैं, (परंतु तुम दोनों कौन हो?) अतः मैं तुम दोनोंके नाम और कर्मको जानना चाहता हूँ॥ १३॥ | | मधुकैटभावूचतुः<br>नावयोः परमं लोके किञ्चिदस्ति महामते ।<br>आवाभ्यां छाद्यते विश्वं तमसा रजसाथ वै ॥ १४<br>रजस्तमोमयावावामृषीणामवलङ्घितौ ।<br>छाद्यमानौ धर्मशीलौ दुस्तरौ सर्वदेहिनाम् ॥ १५<br>आवाभ्यामुह्यते लोको दुष्कराभ्यां युगे युगे ।<br>आवामर्थश्च कामश्च यज्ञः स्वर्गपरिग्रहः ॥ १६<br>सुखं यत्र मुदा युक्तं यत्र श्रीः कीर्तिरेव च ।<br>येषां यत्काङ्क्षितं चैव तत्तदावां विचिन्तय ॥ १७ | मधु-कैटभ बोले— महामते! जगत्में हम दोनोंसे उत्कृष्ट कुछ भी नहीं है। हमीं दोनोंने तमोगुण और रजोगुणद्वारा विश्वको आच्छादित कर रखा है। रजोगुण और तमोगुणसे व्याप्त होनेके कारण हम दोनों ऋषियोंके लिये अलङ्घनीय हैं। धर्म और शील-स्वभावका आच्छादन करनेवाले हम दोनों समस्त देहधारियोंके लिये अजेय हैं। प्रत्येक युगमें दुष्कर कर्म करनेवाले हमीं दोनों लोकका वहन करते हैं। अर्थ, काम, यज्ञ, स्वर्गसंकलन—यह सब हम दोनोंके लिये ही हैं। जहाँ जो कुछ प्रसन्नतायुक्त सुख, लक्ष्मी और कीर्ति है तथा प्राणियोंके जो मनोरथ हैं, उनके रूपमें हमीं दोनोंको जानना चाहिये॥ १४—१७॥ | | ब्रह्मोवाच<br>यत्नाद्योगवतो दृष्ट्या योगः पूर्वं मयार्जितः ।<br>तं समाधाय गुणवत्सत्त्वं चास्मि समाश्रितः ॥ १८<br>यः परो योगमतिमान् योगाख्यः सत्त्वमेव च ।<br>रजसस्तमसश्चैव यः स्रष्टा विश्वसम्भवः ॥ १९<br>ततो भूतानि जायन्ते सात्त्विकानीतराणि च ।<br>स एव हि युवां नाशे वशी देवो हनिष्यति ॥ २० | ब्रह्माने कहा— पूर्वकालमें मैंने यत्नपूर्वक योगदृष्टिद्वारा योगका उपार्जन किया था, उसी गुणशाली योगको धारण करके मैं सत्त्वगुणसे युक्त हो सका हूँ। जो परात्पर, योगकी बुद्धिसे युक्त, ‘योग’ नामवाले, सत्त्वगुणस्वरूप, रजोगुण और तमोगुणके रचयिता तथा विश्वको उत्पन्न करनेवाले हैं, जिनसे सात्त्विक, राजसिक और तामसिक प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है, वे ही देव तुम दोनोंका विनाश करनेमें समर्थ हैं, अतः वे ही तुम दोनोंका वध करेंगे॥ १८—२०॥ | | स्वपन्नेव ततः श्रीमान् बहुयोजनविस्तृतम् ।<br>बाहुं नारायणो ब्रह्मन् कृतवानात्ममायया ॥ २१<br>कृष्यमाणौ ततस्तस्य बाहुना बाहुशालिनः ।<br>चेरतुस्तौ विगलितौ शकुनाविव पीवरौ ॥ २२<br>ततस्तावाहुतुर्गत्वा तदा देवं सनातनम् ।<br>पद्मनाभं हृषीकेशं प्रणिपत्य स्थितावुभौ ॥ २३<br>जानीवस्त्वां विश्वयोनिं त्वामेकं पुरुषोत्तमम् ।<br>त्वमावां पाहि हेत्वर्थमिदं नौ बुद्धिकारणम् ॥ २४<br>अमोघदर्शनः स त्वं यतस्त्वां विद्मःशाश्वतम् ।<br>ततस्त्वामागतावावामभितः प्रसमीक्षितुम् ॥ २५ | ठीक उसी अवसरपर परब्रह्म श्रीमान् नारायणने शयन करते हुए ही अपनी मायासे अपने बाहुको अनेकों योजनके विस्तारवाला बना लिया। तब दीर्घ बाहुवाले भगवान्की उस भुजासे खींचे जाते हुए वे दोनों दैत्य स्थानसे भ्रष्ट होकर दो मोटे पक्षियोंकी भाँति घूमने लगे। इस प्रकार खिंचते हुए वे दोनों असुर अविनाशी पद्मनाभ हृषीकेशके निकट जा पहुँचे और उन्हें नमस्कार कर सामने खड़े हो गये और इस प्रकार बोले—‘देव! हम दोनों आपको विश्वका उत्पादक, अद्वितीय और पुरुषोत्तम जानते हैं। आप हम दोनोंकी रक्षा करें। हमलोगोंकी ऐसी बुद्धिका कारण किसी प्रयोजनकी सिद्धिके लिये है। आपका दर्शन अमोघ होता है। इसीलिये हम दोनों आपको अविनाशी मानते हैं। देव! इसी कारण हम दोनों |

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