भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 712
७०२* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तदिच्छावो वरं देव त्वत्तोऽद्भुतमरिन्दम।<br>अमोघदर्शनोऽसि त्वं नमस्ते समितिञ्जय॥ २६<br><br>श्रीभगवानुवाच<br>किमर्थं हि द्रुतं ब्रूतं वरं ह्यसुरसत्तमौ।<br>दत्तायुष्कौ पुनर्भूयो रहो जीवितुमिच्छथः॥ २७<br><br>मधुकैटभावूचतुः<br>यस्मिन्न कश्चिन्मृत्यवान् देव तस्मिन् प्रभो वधम्।<br>तमिच्छावो वधश्चैव त्वत्तो नोऽस्तु महाव्रत॥ २८<br><br>श्रीभगवानुवाच<br>बाढं युवां तु प्रवरौ भविष्यत्कालसम्भवे।<br>भविष्यतो न संदेहः सत्यमेतद् ब्रवीमि वाम्॥ २९<br>वरं प्रदायाथ महासुराभ्यां<br>सनातनो विश्ववरः सुरोत्तमः।<br>रजस्तमोवर्गभवायनौ यमौ<br>ममन्थ तावूरुतलेन वै प्रभुः॥ ३०आपका दर्शन करनेके लिये यहाँ आये हैं। शत्रुसूदन! हम दोनों आपसे अद्भुत वर प्राप्त करना चाहते हैं। युद्धविजयी देव! आप अमोघदर्शन हैं, अर्थात् आपका दर्शन निष्फल नहीं होता। आपको नमस्कार है'॥ २१-२६॥<br><br>श्रीभगवान्ने कहा—श्रेष्ठ असुरो! तुमलोगोंकी क्या अभिलाषा है? शीघ्र वर माँगो। तुमलोगोंने अपनी आयु तो दे दी है, अब तुमलोग पुनः एकान्तमें कैसे जीवित रहना चाहते हो?॥ २७॥<br><br>मधु-कैटभ बोले—सामर्थ्यशाली देव! जिस स्थानपर कोई भी न मरा हो, वहाँ हम अपनी मृत्यु चाहते हैं। साथ ही महाव्रत! हमारी वह मृत्यु आपके हाथों होनी चाहिये॥ २८॥<br><br>श्रीभगवान्ने कहा—ठीक है, भविष्यकालमें तुम दोनों असुरोंमें श्रेष्ठ होकर उत्पन्न होओगे, इसमें संदेह नहीं है। यह मैं तुम दोनोंसे सत्य कह रहा हूँ। इस प्रकार विश्वमें श्रेष्ठ सनातन सुरवर भगवान्ने उन दोनों महान् असुरोंको वर प्रदान करनेके पश्चात् रजोगुण और तमोगुणके उत्पत्तिस्थानस्वरूप उन दोनों असुरोंको अपनी जाँघपर सुलाकर उनका कचूमर निकाल लिया॥ २९-३०॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावे सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रादुर्भाव-प्रसङ्गमें एक सौ सत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७०॥


एक सौ एकहत्तरवाँ अध्याय

ब्रह्माके मानस पुत्रोंकी उत्पत्ति, दक्षकी बारह कन्याओंका वृत्तान्त, ब्रह्माद्वारा सृष्टिका विकास तथा विविध देवयोनियोंकी उत्पत्ति

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मत्स्य उवाच<br>स्थित्वा च तस्मिन् कमले ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः।<br>ऊर्ध्वबाहुर्महातेजास्तपो घोरं समाश्रितः॥ १<br><br>प्रज्वलन्निव तेजोभिर्भाभिः स्वाभिस्तमोनुदः।<br>बभासे सर्वधर्मस्थः सहस्त्रांशुरिवांशुभिः॥ २<br><br>अथान्यद् रूपमास्थाय शम्भुर्नारायणोऽव्ययः।<br>आजगाम महातेजा योगाचार्यो महायशाः॥ ३<br><br>सांख्याचार्यो हि मतिमान् कपिलो ब्राह्मणो वरः।<br>उभावपि महात्मानौ स्तुवन्तौ क्षेत्रतत्परौ॥ ४मत्स्यभगवान्ने कहा—राजन्! ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महान् तेजस्वी ब्रह्मा उस कमलपर स्थित होकर हाथोंको ऊपर उठाये हुए घोर तपस्यामें संलग्न हो गये। उस समय सम्पूर्ण धर्मोंके निवासस्थान ब्रह्मा अपने तेज और अपनी कान्तिसे प्रज्वलित होते हुए-से अन्धकारका विनाश कर रहे थे और अपनी किरणोंसे प्रकाशित सूर्यकी तरह उद्भासित हो रहे थे। तदनन्तर जो जगत्का कल्याण करनेवाले अविनाशी महान् यशस्वी एवं योगके आचार्य हैं, वे महान् तेजस्वी नारायण दूसरा रूप धारण कर वहाँ आये। साथ ही ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ सांख्याचार्य बुद्धिमान्