मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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७१० मत्स्यपुराण
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रीकीर्तिकान्तिलक्ष्मीभिर्नदीभिरुपशोभितम् ।<br>कालयोगिमहापर्वप्रलयोत्पत्तिवेगिनम् ॥ ३६ | वह सभी स्त्री-रत्नों तथा श्री, कीर्ति, कान्ति और लक्ष्मीरूपी नदियोंसे सुशोभित था, उसमें समयानुसार महान् पर्व और प्रलयकी उत्पत्ति होती रहती थी, ऐसा वह योगरूप महान् तटवाला नारायण-महासागर था ॥ २९—३६ १/२ ॥ |
| तं तु योगमहापारं नारायणमहार्णवम् ।<br>दैवाधिदेवं वरदं भक्तानां भक्तवत्सलम् ॥ ३७<br><br>अनुग्रहकरं देवं प्रशान्तिकरणं शुभम् ।<br>हर्यश्वरथसंयुक्ते सुपर्णध्वजसेविते ॥ ३८<br><br>ग्रहचन्द्रार्करचिते मन्दराक्षवरावृते ।<br>अनन्तरश्मिभियुक्ते विस्तीर्णे मेरुगह्वरे ॥ ३९<br><br>तारकाचित्रकुसुमे ग्रहनक्षत्रबन्धुरे ।<br>भयेष्वभयदं व्योम्नि देवा दैत्यपराजिताः ॥ ४०<br><br>ददृशुस्ते स्थितं देवं दिव्ये लोकमये रथे ।<br>ते कृताञ्जलयः सर्वे देवाः शक्रपुरोगमाः ॥ ४१ | उस समय दैत्योंसे पराजित हुए देवताओंने आकाशमें उन देवाधिदेव भगवान्को, जो भक्तोंके वरदायक, भक्तवत्सल, अनुग्रह करनेवाले, प्रशान्तिकारक, शुभमय और भयके अवसरोंपर अभय प्रदान करनेवाले हैं, देखा। वे ऐसे लोकमय दिव्य रथपर विराजमान थे, जो इन्द्रके रथके समान था, जिसपर गरुडध्वज फहरा रहा था, जिसमें सभी ग्रह, चन्द्र और सूर्य उपस्थित थे, जो मन्दराचलकी श्रेष्ठ धुरीपर आधारित था, वह असंख्य किरणोंसे युक्त मेरुकी विस्तृत गुफा-जैसा लग रहा था, उसमें तारकाएँ विचित्र पुष्पोंके सदृश तथा ग्रह और नक्षत्र हंसके समान शोभा पा रहे थे। तब इन्द्र आदि वे सभी देवता हाथ जोड़कर जय-जयकार करते हुए उन शरणागतवत्सलकी शरणमें गये ॥ ३७—४१ १/२ ॥ |
| जयशब्दं पुरस्कृत्य शरण्यं शरणं गताः ।<br>स तेषां तां गिरं श्रुत्वा विष्णुर्दैवतदैवतम् ॥ ४२<br><br>मनश्चक्रे विनाशाय दानवानां महामृधे ।<br>आकाशे तु स्थितो विष्णुरुत्तमं वपुरास्थितः ॥ ४३<br><br>उवाच देवताः सर्वाः सप्रतिज्ञमिदं वचः ।<br>शान्तिं व्रजत भद्रं वो मा भैष्ट मरुतां गणाः ॥ ४४<br><br>जिता मे दानवाः सर्वे त्रैलोक्यं परिगृह्यताम् ।<br>ते तस्य सत्यसंधस्य विष्णोर्वाक्येन तोषिताः ॥ ४५<br><br>देवाः प्रीतिं समाजग्मुः प्राश्यामृतमिवोत्तमम् ।<br>ततस्तमः संहृतं तद्दिनेशश्च बलाहकाः ॥ ४६<br><br>प्रववुश्च शिवा वाता प्रशान्ताश्च दिशो दश ।<br>शुद्धप्रभाणि ज्योतींषि सोमश्चक्रुः प्रदक्षिणाम् ॥ ४७<br><br>न विग्रहं ग्रहाश्चक्रुः प्रशान्ताश्चापि सिन्धवः ।<br>विरजस्काभवन् मार्गा नाकवर्गादयस्त्रयः ॥ ४८<br><br>यथार्थमूहूः सरितो नापि चुक्षुभिरेऽर्णवाः ।<br>आसञ्छुभानीन्द्रियाणि नराणामन्तरात्मसु ॥ ४९ | इस प्रकार देवताओंकी वह आर्त-वाणी सुनकर देवाधिदेव भगवान् विष्णुने महासमरमें दानवोंका विनाश करनेको सोचा। तब उत्तम शरीर धारण करके आकाशमें स्थित हुए भगवान् विष्णु सभी देवताओंसे प्रतिज्ञापूर्वक ऐसी वाणी बोले—'देवगण! तुम्हारा कल्याण हो। तुमलोग शान्त हो जाओ, भय मत करो, ऐसा समझो कि मैंने सभी दानवोंको जीत लिया है। अब तुमलोग पुनः त्रिलोकीका राज्य ग्रहण करो।' इस प्रकार उन सत्यसंध भगवान् विष्णुके वचनसे वे देवगण परम संतुष्ट हुए और उन्हें ऐसी प्रसन्नता प्राप्त हुई, मानो उत्तम अमृत ही पान करनेको मिल गया हो। तदनन्तर वह निविड़ अन्धकार नष्ट हो गया। बादल विनष्ट हो गये। सुखदायिनी वायु चलने लगी और दसों दिशाएँ शान्त हो गयीं। ज्योतिर्गणोंकी प्रभा निर्मल हो गयी। तब चन्द्रमा और वे सभी ज्योतिर्गण प्रदक्षिणा करने लगे। ग्रहोंमें परस्पर विग्रहका भाव नष्ट हो गया। सागर प्रशान्त हो गये। मार्ग धूलरहित हो गये। स्वर्गादि तीनों लोकोंमें शान्ति स्थापित हो गयी। नदियाँ यथार्थरूपसे प्रवाहित होने लगीं। समुद्रोंका ज्वार-भाटा शान्त हो गया। मनुष्योंकी अन्तरात्माएँ तथा इन्द्रियाँ |