मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय १७२ * | ७०९
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| चतुर्द्विगुणपीनांसं किरीटच्छन्नमूर्धजम्।<br>बभौ चामीकरप्रख्यैरायुधैरुपशोभितम्॥ २३<br><br>चन्द्रार्ककिरणोद्द्योतं गिरिकूटमिवोच्छ्रितम्।<br>नन्दकानन्दितकरं शराशीविषधारिणम्॥ २४<br><br>शक्तिचित्रफलोदग्रशङ्खचक्रगदाधरम् ।<br>विष्णुशैलं क्षमामूलं श्रीवृक्षं शार्ङ्गधन्विनम्॥ २५<br><br>त्रिदशोदारफलदं स्वर्गस्त्रीचारुपल्लवम्।<br>सर्वलोकमनःकान्तं सर्वसत्त्वमनोहरम्॥ २६<br><br>नानाविमानविटपं तोयदाम्बुमधुस्रवम्।<br>विद्याहंकारसाराढ्यं महाभूतप्ररोहणम्॥ २७<br><br>विशेषपत्रैर्निचितं ग्रहनक्षत्रपुष्पितम्।<br>दैत्यलोकमहास्कन्धं मर्त्यलोके प्रकाशितम्॥ २८ | प्रलयकालमें प्रकट हुई अग्निके समान उद्भासित हो रहा था, उसके कंधे दुगुने एवं चौगुने मोटे थे, उसके बाल किरीटसे ढके होनेके कारण शोभा पा रहे थे, वह स्वर्ण-सदृश चमकीले आयुधोंसे सुशोभित था, उससे चन्द्रमा और सूर्यकी किरणों-जैसी प्रभा निकल रही थी, वह पर्वत-शिखरकी तरह ऊँचा था, उसके हाथ नन्दक नामक खड्ग और विषैले सर्पों-जैसे बाणोंसे युक्त थे, वह चित्तल मछलीके समान विशाल शक्ति, शङ्ख, चक्र और गदा धारण किये हुए था, क्षमा जिसका मूल था, जो श्रीवृक्षसे सम्पन्न, शार्ङ्गधनुषसे युक्त, देवताओंको उत्तम फल देनेवाला, देवाङ्गणारूपी रुचिर पल्लवोंसे सुशोभित, सभी लोगोंके मनको प्रिय लगनेवाला, सम्पूर्ण जीवोंसे युक्त होनेके कारण मनोहर, नाना प्रकारके विमानरूपी वृक्षोंसे युक्त और बादलोंके मीठे जलको टपकानेवाला, विद्या और अहंकारके सारसे सम्पन्न तथा महाभूतरूपी वृक्षोंको उगानेवाला था, वह घने पत्तोंसे आच्छादित था, उसपर ग्रह-नक्षत्ररूप पुष्प खिले हुए थे, दैत्योंके लोक उसकी विशाल शाखाके रूपमें थे, ऐसा वह विष्णुशैल मृत्युलोकमें प्रकाशित हो रहा था॥ २०—२८॥ |
| सागराकारनिर्ह्रादं रसातलमहाश्रयम्।<br>मृगेन्द्रपाशैर्विततं पक्षजन्तुनिषेवितम्॥ २९<br><br>शीलार्थचारुगन्धाढ्यं सर्वलोकमहाद्रुमम्।<br>अव्यक्तानन्तसलिलं व्यक्ताहङ्कारफेनिलम्॥ ३०<br><br>महाभूततरङ्गौघं ग्रहनक्षत्रबुद्बुदम्।<br>विमानगरुतव्यासं तोयदाडम्बराकुलम्॥ ३१<br><br>जन्तुमत्स्यगणाकीर्णं शैलशङ्खकुलैर्युतम्।<br>त्रैगुण्यविषयावर्तं सर्वलोकतिमिङ्गिलम्॥ ३२<br><br>वीरवृक्षलतागुल्मं भुजगोत्कृष्टशैवलम्।<br>द्वादशार्कमहाद्वीपं रुद्रैकादशपत्तनम्॥ ३३<br><br>वस्वष्टपर्वतोपेतं त्रैलोक्याम्भोमहोदधिम्।<br>संध्यासंख्योर्मिसलिलं सुपर्णानिलसेवितम्॥ ३४<br><br>दैत्यरक्षोगणग्राहं यक्षोरगझषाकुलम्।<br>पितामहमहावीर्यं सर्वस्त्रीरत्नशोभितम्॥ ३५ | रसातलतक व्याप्त रहनेवाला वह नारायणरूप महासागर सागरकी भाँति शब्द कर रहा था, वह मृगेन्द्ररूपी पाशोंसे व्याप्त, पंखधारी जन्तुओंसे सेवित, शील और अर्थकी सुन्दर गन्धसे युक्त तथा सम्पूर्ण लोकरूपी महान् वृक्षसे सम्पन्न था, नारायणका अव्यक्त स्वरूप उसका अगाध जल था, वह व्यक्त अहंकाररूप फेनसे युक्त था, उसमें महाभूतगण लहरोंके समूह थे, ग्रह और नक्षत्र बुद्बुदकी तरह शोभा पा रहे थे, वह विमानोंके चलनेसे होनेवाले शब्दोंसे व्याप्त था, वह बादलोंके आडम्बरसे सम्पन्न, जलजन्तुओं और मत्स्यसमूहोंसे परिपूर्ण और समुद्रस्थ पर्वतों एवं शङ्खसमूहसे युक्त था। उसमें त्रिगुणयुक्त विषयोंकी भँवरें उठ रही थीं और सारा लोक तिमिंगिल (बहुत बड़ी मछली)-के समान था, वीरगण वृक्षों और लताओंके झुरमुट थे, बड़े-बड़े नाग सेवारके समान थे, बारहों आदित्य महाद्वीप और ग्यारहों रुद्र नगर थे, वह महासागर आठों वसुओंरूप पर्वतसे युक्त और त्रिलोकीरूप जलसे भरा हुआ था, उसके जलमें असंख्य संध्यरूप लहरें उठ रही थीं, वह सुपर्णरूप वायुसे सेवित, दैत्य और राक्षसगणरूप ग्राह तथा यक्ष एवं नागरूप मीनसे व्याप्त था, पितामह ब्रह्मा ही उसमें महान् पराक्रमी व्यक्ति थे, |