मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ७०८ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| असृजन्मानवांस्तत्र ब्रह्मवंशाननुत्तमान्।<br>तेभ्योऽभवन्महात्मभ्यो बहुधा ब्रह्म शाश्वतम्॥ ८<br><br>एतदाश्चर्यभूतस्य विष्णोः कर्मानुकीर्तनम्।<br>कीर्तनीयस्य लोकेषु कीर्त्यमानं निबोध मे॥ ९ | तत्पश्चात् ब्रह्माके वंशमें उत्पन्न होनेवाले सर्वश्रेष्ठ मानवोंको उत्पन्न किया। उन महात्माओंके सम्पर्कसे एक ही शाश्वत ब्रह्म अनेक रूपोंमें विभक्त हो गया। लोकोंमें वर्णन करनेयोग्य भगवान् विष्णुके कर्मोंका यह अनुकीर्तन परम आश्चर्यजनक है। मैं उसका वर्णन कर रहा हूँ, सुनो॥ १—९॥ |
| वृत्ते वृत्रवधे तत्र वर्तमाने कृते युगे।<br>आसीत् त्रैलोक्यविख्यातः संग्रामस्तारकामयः॥ १०<br><br>यत्र ते दानवा घोराः सर्वे संग्रामदुर्ज्जयाः।<br>घ्नन्ति देवगणान् सर्वान् सयक्षोरगराक्षसान्॥ ११<br><br>ते वध्यमाना विमुखाः क्षीणप्रहरणा रणे।<br>त्रातारं मनसा जग्मुर्देवं नारायणं प्रभुम्॥ १२<br><br>एतस्मिन्नन्तरे मेघा निर्वाणाङ्गारवर्चसः।<br>सार्कचन्द्रग्रहगणं छादयन्तो नभस्तलम्॥ १३<br><br>चण्डविद्युद्गणोपेता घोरनिर्ह्रादकारिणः।<br>अन्योन्यवेगाभिहताः प्रववुः सप्त मारुताः॥ १४<br><br>दीप्ततोयाशनिघनैर्वज्रवेगानलानिलैः।<br>रवैः सुघोरैरुत्पातैर्दह्यमानमिवाम्बरम्॥ १५<br><br>तत उल्कासहस्राणि निपेतुः खगतान्यपि।<br>दिव्यानि च विमानानि प्रपतन्त्युत्पतन्ति च॥ १६<br><br>चतुर्युगान्ते पर्याये लोकानां यद्भयं भवेत्।<br>अरूपवन्ति रूपाणि तस्मिन्नुत्पातलक्षणे॥ १७<br><br>जातं च निष्प्रभं सर्वं न प्राज्ञायत किञ्चन।<br>तिमिरौघपरिक्षिप्ता न रेजुश्च दिशो दश॥ १८<br><br>विवेश रूपिणी काली कालमेघावगुण्ठिता।<br>द्यौर्नभात्यभिभूतार्का घोरेण तमसावृता॥ १९ | राजन्! कृतयुगकी स्थितिके समय वृत्रासुरका वध हो जानेके पश्चात् त्रिलोकीमें विख्यात तारकामय संग्राम हुआ था। जिसमें संग्राममें कठिनतासे जीते जानेवाले सभी भयंकर दानव यक्ष, नाग और राक्षसोंसहित सभी देवगणोंका संहार कर रहे थे। इस प्रकार मारे जाते हुए वे देवगण शस्त्ररहित हो युद्धसे विमुख हो गये और मनसे अपने रक्षक सामर्थ्यशाली भगवान् नारायणकी शरणमें गये। इसी बीच बुझते हुए अंगारकी-सी कान्तिवाले मेघोंने सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहगणोंसमेत आकाशमण्डलको आच्छादित कर लिया। वे प्रचण्ड बिजलियोंसे युक्त थे तथा भयंकर गर्जना कर रहे थे। पुनः एक-दूसरेके वेगसे आहत हो सातों प्रकारकी वायु बहने लगी। उस समय कौंधती हुई बिजली और जलसे युक्त बादलों, वज्रके समान वेगशाली अग्नि और वायुके झकोरोंने तथा अत्यन्त भयंकर शब्दोंसे युक्त उत्पातोंद्वारा आकाश जलता हुआ-सा दीख रहा था। आकाशमें उड़ती हुई हजारों उल्काएँ भूतलपर गिरने लगीं। दिव्य विमान लड़खड़ाते हुए गिरने लगे। चारों युगोंकी समाप्तिके समय लोकोंके लिये जैसा भयकारी विनाश उपस्थित होता है, वैसा ही उत्पात उस समय भी घटित हुआ। सभी रूपवती वस्तुएँ विकृत हो गयीं। सारा जगत् प्रकाशहीन हो गया, जिससे कुछ भी जाना नहीं जा सकता था। घने अन्धकारसे ढकी हुई दसों दिशाएँ शोभाहीन हो गयीं। उस समय काले मेघोंके अवगुण्ठनसे युक्त काला रूप धारण करनेवाली देवी आकाशमें प्रविष्ट हुई। घोर अन्धकारसे आवृत होनेके कारण सूर्यके छिप जानेसे आकाशमण्डलकी शोभा जाती रही॥ १०—१९॥ |
| तान् घनौघान् सतिमिरान् दोर्भ्यामाक्षिप्य स प्रभुः।<br>वपुः सन्दर्शयामास दिव्यं कृष्णवपुर्हरिः॥ २०<br><br>बलाहकाञ्जननिभं बलाहकतनूरुहम्।<br>तेजसा वपुषा चैव कृष्णां कृष्णमिवाचलम्॥ २१<br><br>दीप्तपीताम्बरधरं तप्तकाञ्चनभूषणम्।<br>धूमान्धकारवपुषं युगान्ताग्निमिवोत्थितम्॥ २२ | उसी समय सामर्थ्यशाली भगवान्ने अपने दोनों हाथोंसे अन्धकारसहित घन-समूहोंको दूर हटाकर कृष्णवर्णका दिव्य शरीर प्रकट किया। उसकी कान्ति काले मेघ और कज्जलके समान थी, उसके रोएँ भी काले मेघ-जैसे थे, वह तेज और शरीर-दोनोंसे कज्जलगिरिकी भाँति कृष्ण था, उसपर उद्दीप्त पीताम्बर शोभा पा रहा था, वह तपाये हुए स्वर्णमय आभूषणोंसे विभूषित, धुएँके अन्धकारकी-सी कान्तिसे युक्त तथा |