मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ७०८ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| असृजन्मानवांस्तत्र ब्रह्मवंशाननुत्तमान्।<br>तेभ्योऽभवन्महात्मभ्यो बहुधा ब्रह्म शाश्वतम्॥ ८<br><br>एतदाश्चर्यभूतस्य विष्णोः कर्मानुकीर्तनम्।<br>कीर्तनीयस्य लोकेषु कीर्त्यमानं निबोध मे॥ ९ | तत्पश्चात् ब्रह्माके वंशमें उत्पन्न होनेवाले सर्वश्रेष्ठ मानवोंको उत्पन्न किया। उन महात्माओंके सम्पर्कसे एक ही शाश्वत ब्रह्म अनेक रूपोंमें विभक्त हो गया। लोकोंमें वर्णन करनेयोग्य भगवान् विष्णुके कर्मोंका यह अनुकीर्तन परम आश्चर्यजनक है। मैं उसका वर्णन कर रहा हूँ, सुनो॥ १—९॥ |
| वृत्ते वृत्रवधे तत्र वर्तमाने कृते युगे।<br>आसीत् त्रैलोक्यविख्यातः संग्रामस्तारकामयः॥ १०<br><br>यत्र ते दानवा घोराः सर्वे संग्रामदुर्ज्जयाः।<br>घ्नन्ति देवगणान् सर्वान् सयक्षोरगराक्षसान्॥ ११<br><br>ते वध्यमाना विमुखाः क्षीणप्रहरणा रणे।<br>त्रातारं मनसा जग्मुर्देवं नारायणं प्रभुम्॥ १२<br><br>एतस्मिन्नन्तरे मेघा निर्वाणाङ्गारवर्चसः।<br>सार्कचन्द्रग्रहगणं छादयन्तो नभस्तलम्॥ १३<br><br>चण्डविद्युद्गणोपेता घोरनिर्ह्रादकारिणः।<br>अन्योन्यवेगाभिहताः प्रववुः सप्त मारुताः॥ १४<br><br>दीप्ततोयाशनिघनैर्वज्रवेगानलानिलैः।<br>रवैः सुघोरैरुत्पातैर्दह्यमानमिवाम्बरम्॥ १५<br><br>तत उल्कासहस्राणि निपेतुः खगतान्यपि।<br>दिव्यानि च विमानानि प्रपतन्त्युत्पतन्ति च॥ १६<br><br>चतुर्युगान्ते पर्याये लोकानां यद्भयं भवेत्।<br>अरूपवन्ति रूपाणि तस्मिन्नुत्पातलक्षणे॥ १७<br><br>जातं च निष्प्रभं सर्वं न प्राज्ञायत किञ्चन।<br>तिमिरौघपरिक्षिप्ता न रेजुश्च दिशो दश॥ १८<br><br>विवेश रूपिणी काली कालमेघावगुण्ठिता।<br>द्यौर्नभात्यभिभूतार्का घोरेण तमसावृता॥ १९ | राजन्! कृतयुगकी स्थितिके समय वृत्रासुरका वध हो जानेके पश्चात् त्रिलोकीमें विख्यात तारकामय संग्राम हुआ था। जिसमें संग्राममें कठिनतासे जीते जानेवाले सभी भयंकर दानव यक्ष, नाग और राक्षसोंसहित सभी देवगणोंका संहार कर रहे थे। इस प्रकार मारे जाते हुए वे देवगण शस्त्ररहित हो युद्धसे विमुख हो गये और मनसे अपने रक्षक सामर्थ्यशाली भगवान् नारायणकी शरणमें गये। इसी बीच बुझते हुए अंगारकी-सी कान्तिवाले मेघोंने सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहगणोंसमेत आकाशमण्डलको आच्छादित कर लिया। वे प्रचण्ड बिजलियोंसे युक्त थे तथा भयंकर गर्जना कर रहे थे। पुनः एक-दूसरेके वेगसे आहत हो सातों प्रकारकी वायु बहने लगी। उस समय कौंधती हुई बिजली और जलसे युक्त बादलों, वज्रके समान वेगशाली अग्नि और वायुके झकोरोंने तथा अत्यन्त भयंकर शब्दोंसे युक्त उत्पातोंद्वारा आकाश जलता हुआ-सा दीख रहा था। आकाशमें उड़ती हुई हजारों उल्काएँ भूतलपर गिरने लगीं। दिव्य विमान लड़खड़ाते हुए गिरने लगे। चारों युगोंकी समाप्तिके समय लोकोंके लिये जैसा भयकारी विनाश उपस्थित होता है, वैसा ही उत्पात उस समय भी घटित हुआ। सभी रूपवती वस्तुएँ विकृत हो गयीं। सारा जगत् प्रकाशहीन हो गया, जिससे कुछ भी जाना नहीं जा सकता था। घने अन्धकारसे ढकी हुई दसों दिशाएँ शोभाहीन हो गयीं। उस समय काले मेघोंके अवगुण्ठनसे युक्त काला रूप धारण करनेवाली देवी आकाशमें प्रविष्ट हुई। घोर अन्धकारसे आवृत होनेके कारण सूर्यके छिप जानेसे आकाशमण्डलकी शोभा जाती रही॥ १०—१९॥ |
| तान् घनौघान् सतिमिरान् दोर्भ्यामाक्षिप्य स प्रभुः।<br>वपुः सन्दर्शयामास दिव्यं कृष्णवपुर्हरिः॥ २०<br><br>बलाहकाञ्जननिभं बलाहकतनूरुहम्।<br>तेजसा वपुषा चैव कृष्णां कृष्णमिवाचलम्॥ २१<br><br>दीप्तपीताम्बरधरं तप्तकाञ्चनभूषणम्।<br>धूमान्धकारवपुषं युगान्ताग्निमिवोत्थितम्॥ २२ | उसी समय सामर्थ्यशाली भगवान्ने अपने दोनों हाथोंसे अन्धकारसहित घन-समूहोंको दूर हटाकर कृष्णवर्णका दिव्य शरीर प्रकट किया। उसकी कान्ति काले मेघ और कज्जलके समान थी, उसके रोएँ भी काले मेघ-जैसे थे, वह तेज और शरीर-दोनोंसे कज्जलगिरिकी भाँति कृष्ण था, उसपर उद्दीप्त पीताम्बर शोभा पा रहा था, वह तपाये हुए स्वर्णमय आभूषणोंसे विभूषित, धुएँके अन्धकारकी-सी कान्तिसे युक्त तथा |
१७५- देवताओं और दानवोंका घमासान युद्ध, मयकी तामसी माया, और्वाग्निकी उत्पत्ति और महर्षि ऊर्वद्वारा हिरण्यकशिपुको उसकी प्राप्ति
* अध्याय १७२ * | ७०९
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| चतुर्द्विगुणपीनांसं किरीटच्छन्नमूर्धजम्।<br>बभौ चामीकरप्रख्यैरायुधैरुपशोभितम्॥ २३<br><br>चन्द्रार्ककिरणोद्द्योतं गिरिकूटमिवोच्छ्रितम्।<br>नन्दकानन्दितकरं शराशीविषधारिणम्॥ २४<br><br>शक्तिचित्रफलोदग्रशङ्खचक्रगदाधरम् ।<br>विष्णुशैलं क्षमामूलं श्रीवृक्षं शार्ङ्गधन्विनम्॥ २५<br><br>त्रिदशोदारफलदं स्वर्गस्त्रीचारुपल्लवम्।<br>सर्वलोकमनःकान्तं सर्वसत्त्वमनोहरम्॥ २६<br><br>नानाविमानविटपं तोयदाम्बुमधुस्रवम्।<br>विद्याहंकारसाराढ्यं महाभूतप्ररोहणम्॥ २७<br><br>विशेषपत्रैर्निचितं ग्रहनक्षत्रपुष्पितम्।<br>दैत्यलोकमहास्कन्धं मर्त्यलोके प्रकाशितम्॥ २८ | प्रलयकालमें प्रकट हुई अग्निके समान उद्भासित हो रहा था, उसके कंधे दुगुने एवं चौगुने मोटे थे, उसके बाल किरीटसे ढके होनेके कारण शोभा पा रहे थे, वह स्वर्ण-सदृश चमकीले आयुधोंसे सुशोभित था, उससे चन्द्रमा और सूर्यकी किरणों-जैसी प्रभा निकल रही थी, वह पर्वत-शिखरकी तरह ऊँचा था, उसके हाथ नन्दक नामक खड्ग और विषैले सर्पों-जैसे बाणोंसे युक्त थे, वह चित्तल मछलीके समान विशाल शक्ति, शङ्ख, चक्र और गदा धारण किये हुए था, क्षमा जिसका मूल था, जो श्रीवृक्षसे सम्पन्न, शार्ङ्गधनुषसे युक्त, देवताओंको उत्तम फल देनेवाला, देवाङ्गणारूपी रुचिर पल्लवोंसे सुशोभित, सभी लोगोंके मनको प्रिय लगनेवाला, सम्पूर्ण जीवोंसे युक्त होनेके कारण मनोहर, नाना प्रकारके विमानरूपी वृक्षोंसे युक्त और बादलोंके मीठे जलको टपकानेवाला, विद्या और अहंकारके सारसे सम्पन्न तथा महाभूतरूपी वृक्षोंको उगानेवाला था, वह घने पत्तोंसे आच्छादित था, उसपर ग्रह-नक्षत्ररूप पुष्प खिले हुए थे, दैत्योंके लोक उसकी विशाल शाखाके रूपमें थे, ऐसा वह विष्णुशैल मृत्युलोकमें प्रकाशित हो रहा था॥ २०—२८॥ |
| सागराकारनिर्ह्रादं रसातलमहाश्रयम्।<br>मृगेन्द्रपाशैर्विततं पक्षजन्तुनिषेवितम्॥ २९<br><br>शीलार्थचारुगन्धाढ्यं सर्वलोकमहाद्रुमम्।<br>अव्यक्तानन्तसलिलं व्यक्ताहङ्कारफेनिलम्॥ ३०<br><br>महाभूततरङ्गौघं ग्रहनक्षत्रबुद्बुदम्।<br>विमानगरुतव्यासं तोयदाडम्बराकुलम्॥ ३१<br><br>जन्तुमत्स्यगणाकीर्णं शैलशङ्खकुलैर्युतम्।<br>त्रैगुण्यविषयावर्तं सर्वलोकतिमिङ्गिलम्॥ ३२<br><br>वीरवृक्षलतागुल्मं भुजगोत्कृष्टशैवलम्।<br>द्वादशार्कमहाद्वीपं रुद्रैकादशपत्तनम्॥ ३३<br><br>वस्वष्टपर्वतोपेतं त्रैलोक्याम्भोमहोदधिम्।<br>संध्यासंख्योर्मिसलिलं सुपर्णानिलसेवितम्॥ ३४<br><br>दैत्यरक्षोगणग्राहं यक्षोरगझषाकुलम्।<br>पितामहमहावीर्यं सर्वस्त्रीरत्नशोभितम्॥ ३५ | रसातलतक व्याप्त रहनेवाला वह नारायणरूप महासागर सागरकी भाँति शब्द कर रहा था, वह मृगेन्द्ररूपी पाशोंसे व्याप्त, पंखधारी जन्तुओंसे सेवित, शील और अर्थकी सुन्दर गन्धसे युक्त तथा सम्पूर्ण लोकरूपी महान् वृक्षसे सम्पन्न था, नारायणका अव्यक्त स्वरूप उसका अगाध जल था, वह व्यक्त अहंकाररूप फेनसे युक्त था, उसमें महाभूतगण लहरोंके समूह थे, ग्रह और नक्षत्र बुद्बुदकी तरह शोभा पा रहे थे, वह विमानोंके चलनेसे होनेवाले शब्दोंसे व्याप्त था, वह बादलोंके आडम्बरसे सम्पन्न, जलजन्तुओं और मत्स्यसमूहोंसे परिपूर्ण और समुद्रस्थ पर्वतों एवं शङ्खसमूहसे युक्त था। उसमें त्रिगुणयुक्त विषयोंकी भँवरें उठ रही थीं और सारा लोक तिमिंगिल (बहुत बड़ी मछली)-के समान था, वीरगण वृक्षों और लताओंके झुरमुट थे, बड़े-बड़े नाग सेवारके समान थे, बारहों आदित्य महाद्वीप और ग्यारहों रुद्र नगर थे, वह महासागर आठों वसुओंरूप पर्वतसे युक्त और त्रिलोकीरूप जलसे भरा हुआ था, उसके जलमें असंख्य संध्यरूप लहरें उठ रही थीं, वह सुपर्णरूप वायुसे सेवित, दैत्य और राक्षसगणरूप ग्राह तथा यक्ष एवं नागरूप मीनसे व्याप्त था, पितामह ब्रह्मा ही उसमें महान् पराक्रमी व्यक्ति थे, |
७१० मत्स्यपुराण
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| श्रीकीर्तिकान्तिलक्ष्मीभिर्नदीभिरुपशोभितम् ।<br>कालयोगिमहापर्वप्रलयोत्पत्तिवेगिनम् ॥ ३६ | वह सभी स्त्री-रत्नों तथा श्री, कीर्ति, कान्ति और लक्ष्मीरूपी नदियोंसे सुशोभित था, उसमें समयानुसार महान् पर्व और प्रलयकी उत्पत्ति होती रहती थी, ऐसा वह योगरूप महान् तटवाला नारायण-महासागर था ॥ २९—३६ १/२ ॥ |
| तं तु योगमहापारं नारायणमहार्णवम् ।<br>दैवाधिदेवं वरदं भक्तानां भक्तवत्सलम् ॥ ३७<br><br>अनुग्रहकरं देवं प्रशान्तिकरणं शुभम् ।<br>हर्यश्वरथसंयुक्ते सुपर्णध्वजसेविते ॥ ३८<br><br>ग्रहचन्द्रार्करचिते मन्दराक्षवरावृते ।<br>अनन्तरश्मिभियुक्ते विस्तीर्णे मेरुगह्वरे ॥ ३९<br><br>तारकाचित्रकुसुमे ग्रहनक्षत्रबन्धुरे ।<br>भयेष्वभयदं व्योम्नि देवा दैत्यपराजिताः ॥ ४०<br><br>ददृशुस्ते स्थितं देवं दिव्ये लोकमये रथे ।<br>ते कृताञ्जलयः सर्वे देवाः शक्रपुरोगमाः ॥ ४१ | उस समय दैत्योंसे पराजित हुए देवताओंने आकाशमें उन देवाधिदेव भगवान्को, जो भक्तोंके वरदायक, भक्तवत्सल, अनुग्रह करनेवाले, प्रशान्तिकारक, शुभमय और भयके अवसरोंपर अभय प्रदान करनेवाले हैं, देखा। वे ऐसे लोकमय दिव्य रथपर विराजमान थे, जो इन्द्रके रथके समान था, जिसपर गरुडध्वज फहरा रहा था, जिसमें सभी ग्रह, चन्द्र और सूर्य उपस्थित थे, जो मन्दराचलकी श्रेष्ठ धुरीपर आधारित था, वह असंख्य किरणोंसे युक्त मेरुकी विस्तृत गुफा-जैसा लग रहा था, उसमें तारकाएँ विचित्र पुष्पोंके सदृश तथा ग्रह और नक्षत्र हंसके समान शोभा पा रहे थे। तब इन्द्र आदि वे सभी देवता हाथ जोड़कर जय-जयकार करते हुए उन शरणागतवत्सलकी शरणमें गये ॥ ३७—४१ १/२ ॥ |
| जयशब्दं पुरस्कृत्य शरण्यं शरणं गताः ।<br>स तेषां तां गिरं श्रुत्वा विष्णुर्दैवतदैवतम् ॥ ४२<br><br>मनश्चक्रे विनाशाय दानवानां महामृधे ।<br>आकाशे तु स्थितो विष्णुरुत्तमं वपुरास्थितः ॥ ४३<br><br>उवाच देवताः सर्वाः सप्रतिज्ञमिदं वचः ।<br>शान्तिं व्रजत भद्रं वो मा भैष्ट मरुतां गणाः ॥ ४४<br><br>जिता मे दानवाः सर्वे त्रैलोक्यं परिगृह्यताम् ।<br>ते तस्य सत्यसंधस्य विष्णोर्वाक्येन तोषिताः ॥ ४५<br><br>देवाः प्रीतिं समाजग्मुः प्राश्यामृतमिवोत्तमम् ।<br>ततस्तमः संहृतं तद्दिनेशश्च बलाहकाः ॥ ४६<br><br>प्रववुश्च शिवा वाता प्रशान्ताश्च दिशो दश ।<br>शुद्धप्रभाणि ज्योतींषि सोमश्चक्रुः प्रदक्षिणाम् ॥ ४७<br><br>न विग्रहं ग्रहाश्चक्रुः प्रशान्ताश्चापि सिन्धवः ।<br>विरजस्काभवन् मार्गा नाकवर्गादयस्त्रयः ॥ ४८<br><br>यथार्थमूहूः सरितो नापि चुक्षुभिरेऽर्णवाः ।<br>आसञ्छुभानीन्द्रियाणि नराणामन्तरात्मसु ॥ ४९ | इस प्रकार देवताओंकी वह आर्त-वाणी सुनकर देवाधिदेव भगवान् विष्णुने महासमरमें दानवोंका विनाश करनेको सोचा। तब उत्तम शरीर धारण करके आकाशमें स्थित हुए भगवान् विष्णु सभी देवताओंसे प्रतिज्ञापूर्वक ऐसी वाणी बोले—'देवगण! तुम्हारा कल्याण हो। तुमलोग शान्त हो जाओ, भय मत करो, ऐसा समझो कि मैंने सभी दानवोंको जीत लिया है। अब तुमलोग पुनः त्रिलोकीका राज्य ग्रहण करो।' इस प्रकार उन सत्यसंध भगवान् विष्णुके वचनसे वे देवगण परम संतुष्ट हुए और उन्हें ऐसी प्रसन्नता प्राप्त हुई, मानो उत्तम अमृत ही पान करनेको मिल गया हो। तदनन्तर वह निविड़ अन्धकार नष्ट हो गया। बादल विनष्ट हो गये। सुखदायिनी वायु चलने लगी और दसों दिशाएँ शान्त हो गयीं। ज्योतिर्गणोंकी प्रभा निर्मल हो गयी। तब चन्द्रमा और वे सभी ज्योतिर्गण प्रदक्षिणा करने लगे। ग्रहोंमें परस्पर विग्रहका भाव नष्ट हो गया। सागर प्रशान्त हो गये। मार्ग धूलरहित हो गये। स्वर्गादि तीनों लोकोंमें शान्ति स्थापित हो गयी। नदियाँ यथार्थरूपसे प्रवाहित होने लगीं। समुद्रोंका ज्वार-भाटा शान्त हो गया। मनुष्योंकी अन्तरात्माएँ तथा इन्द्रियाँ |
| * अध्याय १७३ * | ७११ |
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| महर्षयो वीतशोका वेदानुच्चैरधीयत।<br>यज्ञेषु च हविः पाकं शिवमप च पावकः॥ ५०<br><br>प्रवृत्तधर्माः संवृत्ता लोका मुदितमानसाः।<br>विष्णोर्दत्तप्रतिज्ञस्य श्रुत्वारिनिधने गिरम्॥ ५१ | शुभकारिणी हो गयीं। महर्षियोंका शोक नष्ट हो गया, वे उच्च स्वरसे वेदोंका अध्ययन करने लगे। यज्ञोंमें अग्निको पके हुए मङ्गलकारक हविकी प्राप्ति होने लगी। इस प्रकार शत्रुके विनाश करनेके विषयमें दत्तप्रतिज्ञ भगवान् विष्णुकी वाणी सुनकर सभी लोगोंका मन हर्षित हो गया, तब वे अपने-अपने धर्मोंमें संलग्न हो गये। |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तारकामयसंग्रामे द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७२ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकामयसंग्राममें एक सौ बहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७२ ॥
एक सौ तिहत्तरवाँ अध्याय
दैत्यों और दानवोंकी युद्धार्थ तैयारी
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्बोले— |
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| ततोऽभयं विष्णुवचः श्रुत्वा दैत्याश्च दानवाः।<br>उद्योगं विपुलं चक्रुर्यूद्धाय विजयाय च॥ १<br><br>मयस्तु काञ्चनमयं त्रिनल्वायतमक्षयम्।<br>चतुश्चक्रं सुविपुलं सुकम्पितमहायुगम्॥ २<br><br>किङ्किणीजालनिर्घोषं द्वीपिचर्मपरिष्कृतम्।<br>रुचिरं रत्नजालैश्च हेमजालैश्च शोभितम्॥ ३<br><br>ईहामृगगणाकीर्णं पक्षिपङ्क्तिविराजितम्।<br>दिव्यास्त्रतूणीरधरं पयोधरनिनादितम्॥ ४<br><br>स्वक्षं रथवरोदारं सूपस्थं गगनोपमम्।<br>गदापरिघसम्पूर्णं मूर्तिमन्तमिवार्णवम्॥ ५<br><br>हैमकेयूरवलयं स्वर्णमण्डलकूबरम्।<br>सपताकध्वजोपेतं सादित्यमिव मन्दरम्॥ ६<br><br>गजेन्द्राभोगवपुषं क्वचित् केसरिवर्चसम्।<br>युक्तमृक्षसहस्रेण समृद्धाम्बुदनादितम्॥ ७<br><br>दीप्तमाकाशगं दिव्यं रथं पररथारुजम्।<br>अध्यतिष्ठद्रणाकाङ्क्षी मेरुं दीप्त इवांशुमान्॥ ८ | रविनन्दन ! तदनन्तर देवताओंके लिये उपयुक्त भगवान् विष्णुके उस अभयदायक वचनको सुनकर दैत्य और दानव युद्ध एवं उसमें विजयप्राप्तिके लिये महान् उद्योग करने लगे। उस समय युद्धाकाङ्क्षी मय एक ऐसे दिव्य रथपर सवार हुआ, जो सोनेका बना हुआ था। वह अविनाशी रथ तीन नल्व* विस्तारवाला अत्यन्त विशाल तथा चार पहियों और परम सुन्दर महान् जुएसे युक्त था। उसमें क्षुद्र घंटिकाओंके रुनझुन शब्द हो रहे थे। वह गैंडेके चमड़ेसे आच्छादित, रत्नों और सुवर्णकी सुन्दर जालियोंसे सुशोभित, भेड़ियों और पङ्क्तिबद्ध पक्षियोंकी पच्चीकारीसे समलंकृत तथा दिव्यास्त्र और तरकससे परिपूर्ण था। उससे मेघकी गड़गड़ाहटके समान शब्द निकल रहा था। वह श्रेष्ठ रथ सुन्दर धुरी और सुदृढ़ मध्यभागसे युक्त, आकाशमण्डल-जैसा विस्तृत तथा गदा और परिघसे परिपूर्ण होनेके कारण मूर्तिमान् सागर-सा लग रहा था। उसके केयूर, वलय और कूबर (युगंधर) सोनेके बने हुए थे तथा उसपर पताकाएँ और ध्वज फहरा रहे थे, जिससे वह सूर्ययुक्त मन्दराचलकी भाँति शोभित हो रहा था। उसका ऊपरी भाग कहीं गजेन्द्र-चर्म तो कहीं सिंह-चर्म-जैसा चमक रहा था। उसमें एक हजार रीछ जुते हुए थे, वह घने बादलकी तरह शब्द कर रहा था, शत्रुओंके रथको रौंदनेवाला वह दीप्तिशाली रथ आकाशगामी था, उसपर बैठा हुआ मय ऐसा लग रहा था मानो दीप्तिमान् सूर्य सुमेरु पर्वतपर विराजमान हों॥ १—८॥ |
* एक फलाँगका एक प्राचीन माप।
७१२ * मत्स्यपुराण *
| Sanskrit Shloka | Hindi Meaning |
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| तारमुक्तक्रोशविस्तारं सर्वं हेममयं रथम्।<br>शैलाकारमसम्बाधं नीलाञ्जनचयोपमम्॥ ९<br>कार्ष्णायसमयं दिव्यं लोहेषाबद्धकूबरम्।<br>तिमिरोद्गारिकिरणं गर्जन्तमिव तोयदम्॥ १०<br>लोहजालेन महता सगवाक्षेण दंशितम्।<br>आयसैः परिघैः पूर्णं क्षेपणीयैश्च मुद्गरैः॥ ११<br>प्रासैः पाशैश्च विततैस्संयुक्तश्च कण्टकैः।<br>शोभितं त्रासयानैश्च तोमरैश्च परश्वधैः॥ १२<br>उद्यन्तं द्विषतां हेतोर्द्वितीयमिव मन्दरम्।<br>युक्तं खरसहस्रेण सोऽध्यारोहद्रथोत्तमम्॥ १३<br>विरोचनस्तु संक्रुद्धो गदापाणिरवस्थितः।<br>प्रमुखे तस्य सैन्यस्य दीप्तशृङ्ग इवाचलः॥ १४<br>युक्तं रथसहस्रेण हयग्रीवस्तु दानवः।<br>स्यन्दनं वाहयामास सपत्नानीकमर्दनः॥ १५<br>व्यायतं किष्कुसाहस्रं धनुर्विस्फारयन् महत्।<br>वाराहः प्रमुखे तस्थौ सप्ररोह इवाचलः॥ १६<br>खरस्तु विक्षरन् दर्पान्नेत्राभ्यां रोषजं जलम्।<br>स्फुरद्दन्तोष्ठनयनं संग्रामं सोऽभ्यकाङ्क्षत॥ १७ | इसी प्रकार जो अत्यन्त ऊँचा और दूरतक शब्द करनेवाला था, जिसके सभी अङ्ग स्वर्णमय थे, जो आकारमें पर्वतके समान और नीलाञ्जनकी राशि-सा दीख रहा था, काले लोहेका बना हुआ था, जिसके लोहेके हरसेमें कूबर बँधा हुआ था, जिसमें कहीं-कहीं अंधकारको फाड़कर किरणें चमक रही थीं, जो बादलकी तरह गर्जना कर रहा था, लोहेकी विशाल जाली और झरोखोंसे सुशोभित था, लोहनिर्मित परिघ, क्षेपणीय (ढेलवाँस) और मुद्गरोंसे परिपूर्ण था, भाला, पाश, बड़े-बड़े शङ्कु, कण्टक, भयदायक तोमर और कुठारोंसे सुशोभित था, शत्रुओंसे युद्ध करनेके लिये उद्यत दूसरे मन्दराचलकी भाँति दीख रहा था तथा जिसमें एक हजार गधे जुते हुए थे, ऐसे उत्तम दिव्य रथपर तारकासुर सवार हुआ। क्रोधसे भरा हुआ विरोचन हाथमें गदा लिये हुए उस सेनाके मुहानेपर खड़ा हुआ। वह देदीप्यमान शिखरवाले पर्वतके समान लग रहा था। शत्रुसेनाका मर्दन करनेवाले दानवश्रेष्ठ हयग्रीवने एक हजार रथके साथ अपने रथको आगे बढ़ाया। वाराह नामक दानव अपने एक हजार किष्कु* लम्बे विशाल धनुषका टंकार करते हुए सेनाके अग्रभागमें स्थित हुआ, जो वृक्षोंसहित पर्वत-सा दीख रहा था। खर नामक दैत्य अभिमानवश नेत्रोंसे रोषजनित जल गिराता हुआ संग्रामके लिये उद्यत हुआ, उस समय उसके दाँत, होंठ और नेत्र फड़क रहे थे॥ ९-१७॥ |
| त्वष्टा त्वष्टगजं घोरं यानमास्थाय दानवः।<br>व्यूहितुं दानवव्यूहं परिचक्राम वीर्यवान्॥ १८<br>विप्रचित्तिसुतः श्वेतः श्वेतकुण्डलभूषणः।<br>श्वेतशैलप्रतीकाशो युद्धायाभिमुखे स्थितः॥ १९<br>अरिष्टो बलिपुत्रश्च वरिष्ठोऽद्रिशिलायुधः।<br>युद्धायाभिमुखस्तस्थौ धराधरविकम्पनः॥ २०<br>किशोरस्त्वभिसंहर्षात्किशोर इति चोदितः।<br>सबला दानवाश्चैव सन्नह्यन्ते यथाक्रमम्॥ २१<br>अभवद् दैत्यसैन्यस्य मध्ये रविरिवोदितः।<br>लम्बस्तु नवमेघाभः प्रलम्बाम्बरभूषणः॥ २२<br>दैत्यव्यूहगतो भाति सनीहार इवांशुमान्।<br>स्वर्भानुरास्ययोधी तु दशनोष्ठेक्षणायुधः॥ २३ | इसी प्रकार पराक्रमी दानवराज त्वष्टा, जिसमें आठ हाथी जुते हुए थे, ऐसे भयंकर रथपर बैठकर दानवसेनाको व्यूहबद्ध करनेका प्रयत्न करने लगा। विप्रचित्तिका पुत्र श्वेत, जो श्वेत पर्वतके समान विशालकाय और श्वेत कुण्डलोंसे विभूषित था, युद्धके लिये सेनाके अग्रभागमें स्थित हुआ। बलिक पुत्र अरिष्ट, जो महान् बलसम्पन्न और पर्वतको कँपा देनेवाला था तथा पर्वत-शिलाएँ जिसकी आयुधभूता थीं, युद्धकी कामनासे सेनाके सम्मुख खड़ा हुआ। किशोर नामक दैत्य प्रेरित किये गये सिंह-किशोरकी तरह अत्यन्त हर्षके साथ दैत्य-सेनाके मध्यभागमें उपस्थित हुआ, जो उदयकालीन सूर्य-सा प्रतीत हो रहा था। नवीन मेघकी-सी कान्तिवाला लम्ब नामक दानव, जो लम्बे वस्त्रों और आभूषणोंसे विभूषित था, दैत्यसेनामें पहुँचकर कुहासेसे घिरे हुए सूर्यकी तरह शोभा पा रहा था। महान् ग्रह राहु, जो मुख, दाँत, होंठ और नेत्रोंसे युद्ध करनेवाला |
* बीस अंगुल या मतान्तरसे एक हाथका प्राचीन माप।
* अध्याय १७४ * ७१३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हसंस्तिष्ठति दैत्यानां प्रमुखे स महाग्रहः।<br>अन्ये हयगतास्तत्र गजस्कन्धगताः परे॥ २४<br><br>सिंहव्याघ्रगताश्चान्ये वराहर्क्षेषु चापरे।<br>केचित्खरोष्ट्रयातारः केचिच्छ्वापदवाहनाः॥ २५<br><br>पत्तिनस्त्वपरे दैत्या भीषणा विकृताननाः।<br>एकपादार्धपादाश्च ननृत्युर्युद्धकाङ्क्षिणः॥ २६<br><br>आस्फोटयन्तो बहवः क्ष्वेडन्तश्च तथापरे।<br>हृष्टशार्दूलनिर्घोषा नेदुर्दानवपुङ्गवाः॥ २७<br><br>ते गदापरिघैरुग्रैः शिलामुसलपाणयः।<br>बाहुभिः परिघाकारैस्तर्जयन्ति स्म देवताः॥ २८<br><br>पाशैः प्रासैश्च परिघैस्तोमेराङ्कुशपट्टिशैः।<br>चिक्रीडुस्ते शतघ्नीभिः शतधारैश्च मुद्गरैः॥ २९<br><br>गण्डशैलैश्च शैलैश्च परिघैश्चोत्तमायसैः।<br>चक्रैश्च दैत्यप्रवराश्चक्रुरानन्दितं बलम्॥ ३०<br><br>एतद्दानवसैन्यं तत् सर्वं युद्धमदोत्कटम्।<br>देवानभिमुखे तस्थौ मेघानीकमिवोद्धतम्॥ ३१<br><br>तदद्भुतं दैत्यसहस्रगाढं<br>वाय्वग्निशैलाम्बुदतोयकल्पम्।<br>बलं रणौघाभ्युदयेऽभ्युदीर्णं<br>युयुत्सयोन्मत्तमिवावभासे ॥ ३२ | था, हँसते हुए दैत्योंके आगे खड़ा हुआ। इस प्रकार अन्यान्य दानव भी क्रमशः सेनासहित कवच धारण करके युद्धके लिये प्रस्थित हुए। उनमें कुछ लोग घोड़ोंपर सवार थे तो कुछ लोग गजराजोंके कंधोंपर बैठे थे। दूसरे कुछ लोग सिंह, व्याघ्र, वराह और रीछोंपर सवार थे। कुछ गधे और ऊँटोंपर चढ़कर चल रहे थे तो किन्हींके वाहन चीते थे॥ १८—२५॥<br><br>दूसरे भीषण दैत्य, जिनमें कुछके मुख टेढ़े थे, किन्हींके एक पैर तथा किन्हींके आधा पैर ही था, युद्धकी अभिलाषासे पैदल ही नाचते हुए चल रहे थे। उन दानवश्रेष्ठोंमें कुछ ताल ठोंक रहे थे, बहुतेरे उछल-कूद रहे थे और कुछ हर्षित होकर सिंहनाद कर रहे थे। इस प्रकार वे दानवगण हाथोंमें भयंकर गदा, परिघ, शिला और मुसल धारण करके अपनी परिघाकार भुजाओंसे देवताओंको धमका रहे थे। उस समय श्रेष्ठ दैत्यगण पाश, भाला, परिघ, तोमर (लकड़ीका बना गोलाकार अस्त्र), अङ्कुश, पट्टिश, शतघ्नी (तोप), शतधार, मुद्गर, गण्डशैल, शैल, उत्तम लोहेके बने हुए परिघ और चक्रोंसे क्रीडा करते हुए दैत्यसेनाको आनन्दित करने लगे। इस प्रकार दानवोंकी वह सारी सेना युद्धके मदसे उन्मत्त हो देवताओंके सम्मुख खड़ी हुई, जो उमड़े हुए मेघोंकी सेना-सी प्रतीत हो रही थी। दानवोंकी वह अद्भुत एवं प्रचण्ड सेना, जो हजारों प्रधान दैत्योंसे भरी हुई तथा वायु, अग्नि, पर्वत और मेघके समान भीषण दीख रही थी, युद्धकी तैयारीके समय युद्धकी इच्छासे उन्मत्त हुई-सी शोभा पा रही थी॥ २६—३२॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे तारकामयसंग्रामे त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकामय-संग्राममें एक सौ तिहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७३॥
एक सौ चौहत्तरवाँ अध्याय
देवताओंका युद्धार्थ अभियान
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मत्स्य उवाच<br><br>श्रुतस्ते दैत्यसैन्यस्य विस्तारो रविनन्दन।<br>सुराणामपि सैन्यस्य विस्तारं वैष्णवं शृणु॥ १<br><br>आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ च महाबलौ।<br>सबलाः सानुगाश्चैव सन्नह्यान्त यथाक्रमम्॥ २ | मत्स्यभगवान्ने कहा— रविनन्दन! तुम दैत्योंकी सेनाका विस्तार तो सुन ही चुके, अब देवताओंकी—विशेषकर विष्णुकी सेनाका विस्तार श्रवण करो। उस समय आदित्यगण, वसुगण, रुद्रगण और दोनों महाबली अश्विनीकुमार—इन सभीने क्रमशः अपनी-अपनी सेना और अनुयायियोंसहित कवच धारण कर लिया। |
७१४ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुरुहूतस्तु पुरतो लोकपालः सहस्रदृक्।<br>ग्रामणीः सर्वदेवानामारुरोह सुरद्विपम्॥ ३<br><br>मध्ये चास्य रथः सर्वपक्षिप्रवररंहसः।<br>सुचारुचक्रचरणो हेमवज्रपरिष्कृतः॥ ४<br><br>देवगन्धर्वयक्षौघैरनुयातः सहस्रशः।<br>दीप्तिमद्भिः सदस्यैश्च ब्रह्मर्षिभिरभिष्टुतः॥ ५<br><br>वज्रविस्फूर्जितोद्भूतैर्विद्युदिन्द्रायुधोदितैः।<br>युक्तो बलाहकगणैः पर्वतैरिव कामगैः॥ ६<br><br>यमारूढः स भगवान् पर्यति सकलं जगत्।<br>हविर्धानेषु गायन्ति विप्रा मखमुखे स्थिताः॥ ७<br><br>स्वर्गे शक़्रानुयातेषु देवतूर्यनिनादिषु।<br>सुन्दर्यः परिनृत्यन्ति शतशोऽप्सरसां गणाः॥ ८<br><br>केतुना नागराजेन राजमानो यथा रविः।<br>युक्तो हयसहस्रेण मनोमारुतरंहसा॥ ९<br><br>स स्यन्दनवरो भाति गुप्तो मातलिना तदा।<br>कृत्स्नः परिवृतो मेरुर्भास्करस्येव तेजसा॥ १० | सहस्र नेत्रधारी लोकपाल इन्द्र जो समस्त देवताओंके नायक हैं, सर्वप्रथम सुरगजेन्द्र ऐरावतपर आरूढ़ हुए। सेनाके मध्यभागमें इन्द्रका वह रथ भी खड़ा किया गया, जो समस्त पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुडके समान वेगशाली था। उसमें सुन्दर पहिये लगे हुए थे तथा वह स्वर्ण और वज्रसे विभूषित था। सहस्रोंकी संख्यामें देवताओं, गन्धर्वों और यक्षोंके समूह उसके पीछे-पीछे चल रहे थे। दीप्तिशाली सदस्य और महर्षि उसकी स्तुति कर रहे थे तथा वह वज्रकी गड़गड़ाहटके सदृश शब्द करनेवाले, बिजली और इन्द्रधनुषसे सुशोभित तथा स्वेच्छाचारी पर्वतकी तरह दीखनेवाले मेघसमूहोंसे घिरा हुआ था। उसपर सवार होकर ऐश्वर्यशाली इन्द्र समस्त जगत्में भ्रमण करते हैं, यज्ञोंमें स्थित ब्राह्मणलोग यज्ञके प्रारम्भमें उसकी प्रशंसा करते हैं, स्वर्गलोकमें उसपर बैठकर इन्द्रके प्रस्थित होनेपर उनके पीछे देवताओंकी तुरहियाँ बजने लगती हैं और सैकड़ों सुन्दरी अप्सराएँ संगठित होकर नृत्य करती हैं। वह रथ शेषनागसे अङ्कित ध्वजसे युक्त होकर सूर्यकी भाँति शोभा पाता है तथा उसमें मन और वायुके समान वेगशाली एक हजार घोड़े जोते जाते हैं। उस समय मातलिद्वारा सुरक्षित वह श्रेष्ठ रथ उसी प्रकार सुशोभित हो रहा था, जैसे सूर्यके तेजसे पूर्णतया घिरा हुआ सुमेरुपर्वत हो॥ १-१०॥ |
| यमस्तु दण्डमुद्यम्य कालयुक्तश्च मुद्गरम्।<br>तस्थौ सुरगणानीके दैत्यान् नादेन भीषयन्॥ ११ | इसी प्रकार कालसहित यमराज भी दण्ड और मुद्गरको हाथमें लेकर अपने सिंहनादसे दैत्योंको भयभीत करते हुए देवसेनामें खड़े हुए। |
| चतुर्भिः सागरैर्युक्तो लेलिहानैश्च पन्नगैः।<br>शङ्खमुक्ताङ्गदधरो बिभ्रत् तोयमयं वपुः॥ १२<br><br>कालपाशान् समाविध्यन् हयैः शशिकरोपमैः।<br>वाय्वीरितैर्जलाकारैः कुर्वँल्लीलाः सहस्रशः॥ १३<br><br>पाण्डुरोद्भूतवसनः प्रवालरुचिराङ्गदः।<br>मणिश्यामोत्तमवपुर्हरिभारार्पितो वरः॥ १४<br><br>वरुणः पाशधृङ्मध्ये देवानीकस्य तस्थिवान्।<br>युद्धवेलामभिलषन् भिन्नवेल इवार्णवः॥ १५ | पाशधारी वरुण जलमय शरीर धारणकर देवसेनाके मध्यभागमें स्थित हुए। उनके साथ चारों सागर तथा जीभ लपलपाते हुए नाग भी थे, वे शङ्ख और मुक्ताजटित केयूर धारण किये हुए थे, हाथमें कालपाश लिये हुए थे, वायुके समान वेगशाली, चन्द्र-किरणोंके-से उज्ज्वल तथा जलाकार घोड़ोंसे युक्त रथपर सवार थे। वे हजारों प्रकारकी लीलाएँ कर रहे थे, पीले वस्त्र और प्रवालजटित अङ्गदसे विभूषित थे, उनकी शरीरकान्ति नीलमणिकी-सी सुन्दर थी, उन श्रेष्ठ देवपर इन्द्रने अपना भार सौंप रखा था। वे तटको छिन्न-भिन्न कर देनेवाले सागरकी तरह युद्ध-वेलाकी बाट जोह रहे थे। |
| यक्षराक्षससैन्येन गुह्यकानां गणैरपि।<br>युक्तश्च शङ्खपद्माभ्यां निधीनामधिपः प्रभुः॥ १६ | तत्पश्चात् निधियोंके अधिपति एवं विमानद्वारा युद्ध करनेवाले सामर्थ्यशाली राजराजेश्वर श्रीमान् कुबेर यक्षों, राक्षसों और गुह्यकोंकी सेना तथा शङ्ख और पद्मके साथ |
१७६- चन्द्रमाकी सहायतासे वरुणद्वारा और्वाग्नि-मायाका प्रशमन, मयद्वारा शैली-मायाका प्राकट्य, भगवान् विष्णुके आदेशसे अग्नि और वायुद्वारा उस मायाका निवारण तथा कालनेमिका रणभूमिमें आगमन
- अध्याय १७४ * | ७१५ --- | ---:
| राजराजेश्वरः श्रीमान् गदापाणिरदृश्यत।<br>विमानयोधी धनदो विमाने पुष्पके स्थितः॥ १७<br>स राजराजः शुशुभे युद्धार्थी नरवाहनः।<br>उक्षाणमास्थितः संख्ये साक्षादिव शिवः स्वयम्॥ १८<br>पूर्वपक्षः सहस्राक्षः पितृराजस्तु दक्षिणः।<br>वरुणः पश्चिमं पक्षमुत्तरं नरवाहनः॥ १९<br>चतुर्षु युक्ताश्चत्वारो लोकपाला महाबलाः।<br>स्वासु दिक्षु स्वरक्षन्त तस्य देवबलस्य ते॥ २० | हाथमें गदा धारण किये हुए पुष्पकविमानपर आरूढ हुए दिखायी पड़े। उस समय युद्धकी इच्छासे आये हुए राजराजेश्वर नरवाहन कुबेरकी ऐसी शोभा हो रही थी, मानो युद्धस्थलमें नन्दीश्वरपर बैठे हुए साक्षात् स्वयं शिवजी ही हों। सेनाके पूर्वभागमें इन्द्र, दक्षिणभागमें यमराज, पश्चिमभागमें वरुण और उत्तरभागमें कुबेर— इस प्रकार ये चारों महाबली लोकपाल चारों दिशाओंमें स्थित हुए। वे अपनी-अपनी दिशाओंमें बड़ी सतर्कताके साथ उस देवसेनाकी रक्षा कर रहे थे॥ १७–२०॥ | | सूर्यः सप्ताश्वयुक्तेन रथेनामितगामिना।<br>श्रिया जाज्वल्यमानेन दीप्यमानैश्च रश्मिभिः॥ २१<br>उदयास्तगचक्रेण मेरुपर्वतगामिना।<br>त्रिदिवद्वारचक्रेण तपता लोकमव्ययम्॥ २२<br>सहस्ररश्मियुक्तेन भ्राजमानेन तेजसा।<br>चचार मध्ये लोकानां द्वादशात्मा दिनेश्वरः॥ २३<br>सोमः श्वेतहये भाति स्यन्दने शीतरश्मिवान्।<br>हिमवत्तोयपूर्णाभिर्भाभिराह्लादयञ्जगत् ॥ २४<br>तमृक्षपूगानुगतं शिशिरांशुं द्विजेश्वरम्।<br>शशच्छायाङ्किततनुं नैशस्य तमसः क्षयम्॥ २५<br>ज्योतिषामीश्वरं व्योम्नि रसानां रसदं प्रभुम्।<br>ओषधीनां सहस्राणां निधानममृतस्य च॥ २६<br>जगतः प्रथमं भागं सौम्यं सत्यमयं रथम्।<br>ददृशुर्दानवाः सोमं हिमप्रहरणं स्थितम्॥ २७ | तदुपरान्त सहस्र किरणोंके सम्मिलित तेजसे उद्भासित द्वादशात्मा दिनेश्वर सूर्य अपने अमित वेगशाली रथपर, जिसमें सात घोड़े जुते हुए थे, जो शोभासे प्रकाशित, सूर्यकी किरणोंसे देदीप्यमान, उदयाचल, अस्ताचल और मेरुपर्वतपर भ्रमण करनेवाला तथा स्वर्गद्वाररूप एक चक्रसे सुशोभित था, सवार हो अविनाशी लोकोंको संतप्त करते हुए लोगोंके बीच विचरण करने लगे। शीतरश्मि चन्द्रमा श्वेत घोड़े जुते हुए रथपर सवार हो अपनी जलपूर्ण हिमकी-सी कान्तिसे जगत्को आह्लादित करते हुए सुशोभित हुए। उस समय शीतल किरणोंवाले द्विजेश्वर चन्द्रमाके पीछे नक्षत्रगण चल रहे थे। उनके शरीरमें खरगोशका चिह्न झलक रहा था, वे रात्रिके अन्धकारके विनाशक, सामर्थ्यशाली, आकाशमण्डलमें स्थित ज्योतिर्गणोंके अधीश्वर, रसीले पदार्थोंको रस प्रदान करनेवाले, सहस्रों प्रकारकी ओषधियों तथा अमृतके निधान, जगत्के प्रथम भागस्वरूप और सौम्य स्वभाववाले हैं, उनका रथ सत्यमय है। इस प्रकार हिमसे प्रहार करनेवाले चन्द्रमाको दानवोंने वहाँ उपस्थित देखा॥ २१–२७॥ | | यः प्राणः सर्वभूतानां पञ्चधा भिद्यते नृषु।<br>सप्तधातुगतो लोकांस्त्रीन् दधार चचार च॥ २८<br>यमाहुरग्निकर्तारं सर्वप्रभवमीश्वरम्।<br>सप्तस्वरगतो यश्च नित्यं गीर्भिरुदीर्यते॥ २९<br>यं वदन्त्युत्तमं भूतं यं वदन्त्यशरीरिणम्।<br>यमाहुराकाशगमं शीघ्रगं शब्दयोगिनम्॥ ३० | जो समस्त प्राणियोंका प्राणस्वरूप है, मनुष्योंके शरीरोंमें पाँच प्रकारसे विभक्त होता है, जिसकी सातों धातुओंमें गति है, जो तीनों लोकोंको धारण करता तथा उनमें विचरण करता है, जिसे अग्निका कर्ता, सबका उत्पत्तिस्थान और ईश्वर कहते हैं, जो नित्य सातों स्वरोंमें विचरण करता हुआ वाणीद्वारा उच्चरित होता है। जिसे पाँचों भूतोंमें उत्तम भूत, शरीररहित, आकाशचारी, शीघ्रगामी और शब्दयोगी अर्थात् शब्दको उत्पन्न करनेवाला कहा जाता है, |
| ७१६ | * मत्स्यपुराण * |
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| स वायुः सर्वभूतायुरुद्भूतः स्वेन तेजसा।<br>ववौ प्रव्यथयन् दैत्यान्प्रतिलोमं सतोयदः॥ ३१<br>मरुतो दिव्यगन्धर्वैर्विद्याधरगणैः सह।<br>चिक्रीडुरसिभिः शुभ्रैर्निर्मुक्तैरिव पन्नगैः॥ ३२ | सम्पूर्ण प्राणियोंका आयुस्वरूप वह वायु वहाँ अपने तेजसे प्रकट हुआ। वह बादलोंको साथ लेकर दैत्योंको प्रव्यथित करता हुआ उनकी प्रतिकूल दिशामें बहने लगा। मरुद्गण दिव्य गन्धर्वों और विद्याधरोंके साथ केंचुलसे छूटे हुए सर्पकी भाँति निर्मल तलवारोंसे क्रीडा करने लगे॥ २८—३२॥ |
| सृजन्तः सर्पपतयस्तीव्रतोयमयं विषम्।<br>शरभूता दिवीन्द्राणां चेरुर्व्यात्तानना दिवि॥ ३३<br>पर्वतैश्च शिलाशृङ्गैः शतशश्चैव पादपैः।<br>उपतस्थुः सुरगणाः प्रहर्तुं दानवं बलम्॥ ३४<br>यः स देवो हृषीकेशः पद्मनाभस्त्रिविक्रमः।<br>युगान्ते कृष्णवर्णाभो विश्वस्य जगतः प्रभुः॥ ३५<br>सर्वयोनिः स मधुहा हव्यभुक् क्रतुसंस्थितः।<br>भूम्यापोव्योमभूतात्मा श्यामः शान्तिकरोऽरिहा॥ ३६<br>अरिघ्नममरादीनां चक्रं गृह्य गदाधरः।<br>अर्कं नगादिवोद्यन्तमुद्यम्योत्तमतेजसा॥ ३७<br>सव्येनालम्व्य महतीं सर्वासुरविनाशिनीम्।<br>करेण कालीं वपुषा शत्रुकाालप्रदां गदाम्॥ ३८<br>अन्यैर्भुजैः प्रदीप्ताभैर्भुजगारिध्वजः प्रभुः।<br>दधारायुधजातानि शार्ङ्गादीनि महाबलः॥ ३९ | इसी प्रकार नागाधीश्वरगण आकाशमें मुख फैलाये हुए तीव्र जलमय विषको उगलते हुए आकाशचारियोंके बाणरूप होकर विचरण करने लगे। अन्यान्य देवगण सैकड़ों पर्वतों, शिलाओं, शिखरों और वृक्षोंसे दानवसेनापर प्रहार करनेके लिये उपस्थित हुए। तत्पश्चात् जो इन्द्रियोंके अधीश्वर, पद्मनाभ, तीन पगसे त्रिलोकीको नाप लेनेवाले, प्रलयकालमें कृष्ण वर्णकी आभासे युक्त, सम्पूर्ण जगत्के स्वामी, सबके उत्पत्तिस्थान, मधु नामक दैत्यके वधकर्ता, यज्ञमें स्थित होकर हव्यके भोक्ता, पृथ्वीजलआकाशस्वरूप, श्याम वर्णवाले, शान्तिकर्ता और शत्रुओंका हनन करनेवाले हैं, उन भगवान् गदाधरने देवताओंके शत्रुओंका विनाश करनेवाले अपने सुदर्शन चक्रको, जो अपने उत्तम तेजसे उदयाचलसे उदय होते हुए सूर्यके समान चमक रहा था, हाथमें ऊपर उठा लिया। फिर उन्होंने बायें हाथसे अपनी विशाल गदाका आलम्बन लिया, जो समस्त असुरोंकी विनाशिनी, काले रंगवाली और शत्रुओंको कालके गालमें डालनेवाली थी। महाबली गरुडध्वज भगवान्ने अपनी अन्य देदीप्यमान भुजाओंसे शार्ङ्गधनुष आदि अन्यान्य आयुधोंको धारण किया॥ ३३—३९॥ |
| स कश्यपस्यात्मभुवं द्विजं भुजभोजनम्।<br>पवनाधिकसम्पातं गगनक्षोभणं खगम्॥ ४०<br>भुजगेन्द्रेण वदने निविष्टेन विराजितम्।<br>अमृतारम्भनिर्मुक्तं मन्द्राद्रिमिवोच्छितम्॥ ४१<br>देवासुरविमर्देषु बहुशो दृढविक्रमम्।<br>महेन्द्रेणामृतस्यार्थे वज्रेण कृतलक्षणम्॥ ४२<br>शिखिनं बलिनं चैव तप्तकुण्डलभूषणम्।<br>विचित्रपत्रवसनं धातुमन्तमिवाचलम्॥ ४३<br>स्फीतक्रोडावलम्बेन शीतांशुसमतेजसा।<br>भोगिभोगावसिक्तेन मणिरत्नेन भास्वता॥ ४४ | तदनन्तर जो कश्यपके पुत्र, सर्पभक्षी, वायुसे भी अधिक वेगशाली, आकाशको क्षुब्ध कर देनेवाले, आकाशचारी, मुखमें दबाये हुए सर्पसे सुशोभित, अमृत-मन्थनसे मुक्त हुए मन्दराचलके समान ऊँचे, अनेकों बार घटित हुए देवासुर-संग्राममें सुदृढ़ पराक्रम दिखानेवाले, अमृतके लिये इन्द्रके द्वारा वज्रके प्रहारसे किये गये चिह्नसे युक्त, शिखाधारी, महाबली, तपाये हुए स्वर्णनिर्मित कुण्डलोंसे विभूषित, विचित्र पंखरूपी वस्त्रवाले और धातुयुक्त पर्वतके समान शोभायमान थे, उनका वक्षःस्थल लम्बा और चौड़ा था, जो चन्द्रमाके समान उद्भासित हो रहा था, उसपर नागोंके फणोंमें लगी हुई मणियाँ चमक रही थीं, |
| * अध्याय १७५ * | ७१७ |
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| पक्षाभ्यां चारुपत्राभ्यामावृत्य दिवि लीलया ।<br>युगान्ते सेन्द्रचापाभ्यां तोयदाभ्यामिवाम्बरम् ॥ ४५<br>नीललोहितपीताभिः पताकाभिरलङ्कृतम् ।<br>केतुवेषप्रतिच्छन्नं महाकायनिकेतनम् ॥ ४६<br>अरुणावरजं श्रीमानारुह्य समरे विभुः ।<br>सुवर्णस्वर्णवपुषा सुपर्णं खेचरोत्तमम् ॥ ४७<br>तमन्वयुर्देवगणा मुनयश्च समाहिताः ।<br>गीर्भिः परममन्त्राभिस्तुष्टुवुश्च जनार्दनम् ॥ ४८<br>तद्वैश्रवणसंश्लिष्टं वैवस्वतपुरःसरम् ।<br>द्विजराजपरिक्षिप्तं देवराजविराजितम् ॥ ४९<br>चन्द्रप्रभाभिर्विपुलं युद्धाय समवर्तत ।<br>स्वस्त्यस्तु देवेभ्य इति बृहस्पतिरभाषत ।<br>स्वस्त्यस्तु दानवानीके उशना वाक्यमाददे ॥ ५० ॥ | वे अपने दोनों सुन्दर पंखोंसे आकाशको उसी प्रकार लीलापूर्वक आच्छादित किये हुए थे, जैसे युगान्तके समय दो इन्द्रधनुषोंसे युक्त बादल आकाशको ढक लेते हैं। वे नीली, लाल और पीली पताकाओंसे सुशोभित थे, जो केतु (पताका)-के वेषमें छिपे हुए, विशालकाय और अरुणके छोटे भाई थे, उन सुन्दर वर्णवाले, सुनहले शरीरसे सुशोभित पक्षिश्रेष्ठ गरुडपर आरूढ़ होकर श्रीमान् भगवान् विष्णु समरभूमिमें उपस्थित हुए। फिर तो देवगणों तथा मुनियोंने सावधान-चित्तसे उनका अनुगमन किया और परमोत्कृष्ट मन्त्रोंसे युक्त वाणियोंद्वारा उन जनार्दनका स्तवन किया। इस प्रकार देवताओंकी वह विशाल सेना जब कुबेरसे युक्त, यमराजसे समन्वित, चन्द्रमासे सुरक्षित, इन्द्रसे सुशोभित और चन्द्रमाकी प्रभासे समलंकृत हो युद्धके लिये आगे बढ़ी, तब बृहस्पतिने कहा—'देवताओंका मङ्गल हो।' इसी प्रकार दानव-सेनामें भी शुक्राचार्यने 'दानवोंका कल्याण हो' ऐसा वचन उच्चारण किया॥ ४०—५०॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे तारकामयसंग्रामे चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७४ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकामयसंग्राममें एक सौ चौहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १७४ ॥
एक सौ पचहत्तरवाँ अध्याय
देवताओं और दानवोंका घमासान युद्ध, मयकी तामसी माया, और्वाग्निकी उत्पत्ति और महर्षि ऊर्वद्वारा हिरण्यकशिपुको उसकी प्राप्ति
| मत्स्य उवाच<br>ताभ्यां बलाभ्यां संजज्ञे तुमुलो विग्रहस्तदा ।<br>सुराणामसुराणां च परस्परजयैषिणाम् ॥ १<br>दानवा देवतैः सार्धं नानाप्रहरणोद्यताः ।<br>समीयुर्युध्यमाना वै पर्वता इव पर्वतैः ॥ २<br>तत्सुरासुरसंयुक्तं युद्धमत्यद्भुतं बभौ ।<br>धर्माधर्मसमायुक्तं दर्पेण विनयेन च ॥ ३<br>ततो रथैर्विप्रयुक्तैर्वारणैश्च प्रचोदितैः ।<br>उत्पतद्भिश्च गगनमसिहस्तैः समंततः ॥ ४<br>क्षिप्यमाणैश्च मुसलैः सम्पतद्भिश्च सायकैः ।<br>चापैर्विस्फार्यमाणैश्च पात्यमानैश्च मुद्गरैः ॥ ५ | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**रविनन्दन! तदनन्तर परस्पर विजयकी अभिलाषावाले देवताओं और दानवोंकी उन दोनों सेनाओंमें घमासान युद्ध होने लगा। नाना प्रकारके शस्त्रास्त्रोंसे लैस हुए दानवगण देवताओंके साथ युद्ध करते हुए एक-दूसरेसे भिड़ गये। उस समय वे ऐसा प्रतीत हो रहे थे मानो पर्वत पर्वतोंके साथ भिड़ गये हों। देवताओं और असुरोंके बीच छिड़ा हुआ वह युद्ध धर्म, अधर्म, दर्प और विनयसे युक्त होनेके कारण अत्यन्त अद्भुत लग रहा था। उस समय रथोंको पृथक्-पृथक् आगे बढ़ाया जा रहा था, हाथियोंको उत्तेजित किया जा रहा था, चारों ओर सैनिक हाथमें तलवार लिये हुए आकाशमें उछल रहे थे, मुसल फेंके जा रहे थे, बाणोंकी वर्षा हो रही थी, धनुषोंका टंकार हो रहा था, मुद्गर |
७१८ * मत्स्यपुराण *
| तद् युद्धमभवद् घोरं देवदानवसंकुलम्।<br>जगत्संत्रासजननं युगसंवर्तकोपमम्॥ ६<br><br>हस्तमुक्तैश्च परिघैर्विप्रयुक्तैश्च पर्वतैः।<br>दानवाः समरे जघ्नुर्देवानिन्द्रपुरोगमान्॥ ७<br><br>ते वध्यमाना बलिभिर्दानवैर्जयकाङ्क्षिभिः।<br>विषण्णवदना देवा जग्मुरार्तिं परां मृधे॥ ८<br><br>तैस्त्रिशूलप्रमथिताः परिघैर्भिन्नमस्तकाः।<br>भिन्नोरस्का दितिसुतैर्वमू रक्तं व्रणैर्बहु॥ ९<br><br>वेष्टिताः शरजालैश्च निर्यत्नाश्चासुरैः कृताः।<br>प्रविष्टा दानवीं मायां न शेकुस्ते विचेष्टितुम्॥ १०<br><br>अस्तंगतमिवाभाति निष्प्राणसदृशाकृतिः।<br>बलं सुराणामसुरैर्निष्प्रयत्नायुधं कृतम्॥ ११<br><br>दैत्यचापच्युतान् घोरंश्छित्त्वा वज्रेण ताञ्शरान्।<br>शक्रो दैत्यबलं घोरं विवेश बहुलोचनः॥ १२<br><br>स दैत्यप्रमुखान् हत्वा तद्दानवबलं महत्।<br>तामसेनास्त्रजालेन तमोभूतमथाकरोत्॥ १३<br><br>तेऽन्योऽन्यं नावबुध्यन्त देवानां वाहनानि च।<br>घोरेण तमसाविष्टाः पुरुहूतस्य तेजसा॥ १४<br><br>मायापाशैर्विमुक्तास्तु यत्नवन्तः सुरोत्तमाः।<br>वपूंषि दैत्यसिंहानां तमोभूतान्यपातयन्॥ १५<br><br>अपध्वस्ता विसंज्ञाश्च तमसा नीलवर्चसा।<br>पेतुस्ते दानवगणाश्छिन्नपक्षा इवाद्रयः॥ १६<br><br>तद् घनीभूतदैत्येन्द्रमन्धकार इवार्णवे।<br>दानवं देवकदनं तमोभूतमिवाभवत्॥ १७<br><br>तदा सृजन् महामायां मयस्तां तामसीं दहन्।<br>युगान्तोद्योतजननीं सृष्टामौर्वेण वह्निना॥ १८<br><br>सा ददाह ततः सर्वान् मायाः मयविकल्पिताः।<br>दैत्याश्चादित्यवपुषः सद्य उत्तस्थुराहवे॥ १९ | गिराये जा रहे थे, इस प्रकार देवों और दानवोंसे व्याप्त हुए उस युद्धने भयंकर रूप धारण कर लिया है। वह युगान्तकालिक संवर्तक अग्निकी तरह जगत्को भयभीत करने लगा। दानवगण समरभूमिमें पृथक्-पृथक् हाथोंसे फेंके गये परिघों और पर्वतोंसे इन्द्र आदि देवताओंपर प्रहार करने लगे। इस प्रकार रणभूमिमें विजयाभिलाषी बलवान् दानवोंद्वारा मारे जाते हुए उन देवताओंका मुख सूख गया और वे बड़ी कष्टपूर्ण स्थितिमें पड़ गये। दानवोंने उन्हें शूलोंसे बींध डाला, परिघोंकी चोटसे उनके मस्तक विदीर्ण तथा वक्षःस्थल चूर-चूर हो गये और उनके घावोंसे अविरल रक्त प्रवाहित होने लगा। असुरोंने देवताओंको बाणसमूहोंसे परिवेष्टित करके प्रयत्नहीन कर दिया। वे दानवी मायामें प्रविष्ट होकर किसी प्रकारकी भी चेष्टा करनेमें असमर्थ हो गये। देवताओंकी वह सेना प्राणरहितकी तरह विनष्ट हुई-सी दीख रही थी। असुरोंने उसे आयुध और प्रयत्नसे रहित कर दिया था॥ १-११॥<br><br>तदनन्तर सहस्रनेत्रधारी इन्द्र वज्रद्वारा दैत्योंके धनुषोंसे छूटे हुए भयंकर बाणोंको छिन्न-भिन्न करके दैत्योंकी भीषण सेनामें प्रविष्ट हुए। उन्होंने प्रधान-प्रधान दैत्योंका वध करके दानवोंकी उस विशाल सेनाको तामस अस्त्रसमूहके प्रयोगसे अन्धकारमय बना दिया। इस प्रकार इन्द्रके पराक्रमसे घोर अन्धकारसे घिरे हुए वे दानव परस्पर एक-दूसरेको तथा देवताओंके वाहनोंको भी नहीं पहचान पाते थे। इधर दानवी मायाके पाशसे मुक्त हुए श्रेष्ठ देवगण प्रयत्न करके दैत्येन्द्रोंके अन्धकारमय शरीरोंको काटकर गिराने लगे। उस नील कान्तिवाले अन्धकारसे घिरे हुए वे दानवगण मूच्छित होकर धराशायी होते हुए ऐसे लग रहे थे मानो कटे हुए पंखवाले पर्वत हों। दैत्येन्द्रोंकी वह सेना समुद्रमें अन्धकारकी तरह एकत्र हो गयी और देवताओंद्वारा मारे जाते हुए दानव अन्धकारमय-से हो गये। यह देखकर मयदानवने इन्द्रकी उस तामसी मायाको नष्ट करते हुए अपनी महान् राक्षसी मायाका सृजन किया। वह और्व नामक अग्निसे उत्पन्न हुई और प्रलयकालीन (भयंकर) प्रकाशको प्रकट कर रही थी। मयद्वारा रची गयी उस मायाने सम्पूर्ण देवताओंको जलाना आरम्भ किया। इधर सूर्यके समान तेजस्वी शरीरवाले दैत्यगण युद्धस्थलमें तुरंत उठ खड़े |
१७७- देवताओं और दैत्योंकी सेनाओंकी अद्भुत मुठभेड़, कालनेमिका भीषण पराक्रम और उसकी देवसेनापर विजय
| * अध्याय १७५ * | ७१९ |
|---|---|
| मायामौर्वीं समासाद्य दह्यमाना दिवौकसः।<br>भेजिरे चेन्द्रविषयं शीतांशुसलिलप्रदम्॥ २०<br>ते दह्यमाना ह्यौर्वेण वह्निना नष्टचेतसः।<br>शशंसुर्वज्रिणं देवाः संतप्ताः शरणैषिणः॥ २१ | हुए। इस प्रकार और्वी मायाके सम्पर्कसे जलते हुए देवगण शीतल किरणोंवाले एवं जलप्रदाता इन्द्रकी शरणमें गये। और्व अग्निसे जलनेके कारण देवताओंकी चेतना नष्ट हो रही थी। तब संतप्त हुए देवगणोंने शरणकी इच्छासे वज्रधारी इन्द्रके पास जाकर उन्हें सूचित किया॥ १२—२१॥ |
| संतप्ते मायया सैन्ये हन्यमाने च दानवैः।<br>चोदितो देवराजेन वरुणो वाक्यमब्रवीत्॥ २२<br>ऊर्वो ब्रह्मर्षिजः शक्र तपस्तेपे सुदारुणम्।<br>ऊर्वः स पूर्वतेजस्वी सदृशो ब्रह्मणो गुणैः॥ २३<br>तं तपन्तमिवादित्यं तपसा जगदव्ययम्।<br>उपतस्थुर्मुनिगणा दिव्या देवर्षिभिः सह॥ २४<br>हिरण्यकशिपुश्चैव दानवो दानवेश्वरः।<br>ऋषिं विज्ञापयामासुः पुरा परमतेजसम्॥ २५<br>ऊचुर्ब्रह्मर्षयस्तं तु वचनं धर्मसंहितम्।<br>ऋषिवंशेषु भगवंश्छिन्नमूलमिदं पदम्॥ २६<br>एकस्त्वमनपत्यश्च गोत्रायान्यो न वर्तते।<br>कौमारं व्रतमास्थाय क्लेशमेवानुवर्तसे॥ २७<br>बहूनि विप्रगोत्राणि मुनीनां भावितात्मनाम्।<br>एकदेहानि तिष्ठन्ति विविक्तानि विना प्रजाः॥ २८<br>एवमुच्छिन्नमूलैश्च पुत्रैर्नो नास्ति कारणम्।<br>भवांस्तु तपसा श्रेष्ठो प्रजापतिसमद्युतिः॥ २९<br>तत्र वर्तस्व वंशाय वर्धयात्मानमात्मना।<br>त्वया धर्मोर्जितस्तेन द्वितीयां कुरु वै तनुम्॥ ३० | इस प्रकार अपनी सेनाको मायाद्वारा संतप्त होती तथा दानवोंद्वारा मारी जाती देखकर देवराज इन्द्रके पूछनेपर वरुणने इस प्रकार कहा—'इन्द्र! ऊर्व एक ब्रह्मर्षिके पुत्र हैं। वे पहलेसे ही तेजस्वी और गुणोंमें ब्रह्माके समान थे। उन्होंने अत्यन्त कठोर तप किया था। जब उनकी तपस्यासे सारा जगत् सूर्यकी भाँति संतप्त हो उठा, तब उनके निकट देवर्षियोंसहित दिव्य महर्षिगण उपस्थित हुए। उसी समय वहाँ दानवेश्वर हिरण्यकशिपु दानव भी पहुँचा। तब ब्रह्मर्षियोंने सर्वप्रथम उन परम तेजस्वी ऊर्व ऋषिको सूचना दी और फिर इस प्रकार धर्मयुक्त कहा—'ऐश्वर्यशाली ऊर्व! ऋषियोंके वंशोंमें इस संतान-परम्पराकी जड़ कट चुकी है। एकमात्र आप शेष हैं, सो भी संतानहीन हैं। दूसरा कोई गोत्रकी वृद्धि करनेवाला विद्यमान है नहीं और आप ब्रह्मचर्य-व्रतको धारणकर क्लेश सहन करते हुए तपमें ही लगे हुए हैं। भावितात्मा मुनियों तथा ब्राह्मणोंके बहुत-से गोत्र संततिके बिना केवल एक व्यक्तितक ही सीमित रह गये हैं। इस प्रकार मूलके नष्ट हो जानेपर हमलोगोंको पुनः पुत्रोत्पत्तिका कोई कारण नहीं दीख रहा है। आप तो तपस्याके प्रभावसे श्रेष्ठ और प्रजापतिके समान तेजस्वी हो गये हैं, अतः वंश-प्राप्तिके लिये प्रयत्न कीजिये और अपने द्वारा अपनी वृद्धि कीजिये। आपने धर्मोपार्जन तो कर ही लिया है, इसलिये अब दूसरे शरीरकी रचना कीजिये अर्थात् संतानोत्पत्तिके लिये प्रयत्नशील होइये'॥ २२—३०॥ |
| स एवमुक्तो मुनिभिर्हूर्वो मर्मसु ताडितः।<br>जगर्हे तानृषिगणान् वचनं चेदमब्रवीत्॥ ३१<br>यथायं विहितो धर्मो मुनीनां शाश्वतस्तु सः।<br>आर्षं वै सेवतः कर्म वन्यमूलफलाशिनः॥ ३२<br>ब्रह्मयोनौ प्रसूतस्य ब्राह्मणस्यात्मदर्शिनः।<br>ब्रह्मचर्यं सुचरितं ब्रह्माणमपि चालयेत्॥ ३३<br>जनानां वृत्तयस्तिस्रो ये गृहाश्रमवासिनः।<br>अस्माकं तु वरं वृत्तिर्वनाश्रमनिवासिनाम्॥ ३४ | मुनियोंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर ऊर्व ऋषिके मर्मस्थानोंपर विशेष आघात पहुँचा, तब उन्होंने उन ऋषियोंकी निन्दा करते हुए इस प्रकार कहा—'ब्राह्मणकुलोत्पन्न जंगली फल-मूलका आहार करते हुए आर्ष कर्मके सेवनमें निरत आत्मदर्शी ब्राह्मणका भलीभाँति आचरण किया गया ब्रह्मचर्य ब्रह्माको भी विचलित कर सकता है। जो गृहस्थाश्रममें निवास करनेवाले हैं, उन लोगोंके लिये अन्य तीन वृत्तियाँ बतलायी गयी हैं, परंतु वनमें आश्रम बनाकर निवास करनेवाले हमलोगोंके लिये यही वृत्ति उत्तम है। |
| ७२० | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| अब्भक्षा वायुभक्षाश्च दन्तोलूखलिनस्तथा।<br>अश्मकुट्टा दशतपाः पञ्चातपसहाश्च ये॥ ३५<br>एते तपसि तिष्ठन्ति व्रतैरपि सुदुष्करैः।<br>ब्रह्मचर्यं पुरस्कृत्य प्रार्थयन्ति परां गतिम्॥ ३६<br>ब्रह्मचर्याद् ब्राह्मणस्य ब्राह्मणत्वं विधीयते।<br>एवमाहुः परे लोके ब्रह्मचर्यविदो जनाः॥ ३७<br>ब्रह्मचर्ये स्थितं धैर्यं ब्रह्मचर्ये स्थितं तपः।<br>ये स्थिता ब्रह्मचर्ये तु ब्राह्मणास्ते दिवि स्थिताः॥ ३८<br>नास्ति योगं विना सिद्धिर्न वा सिद्धिं विना यशः।<br>नास्ति लोके यशोमूलं ब्रह्मचर्यात् परं तपः॥ ३९<br>यो निगृह्येन्द्रियग्रामं भूतग्रामं च पञ्चकम्।<br>ब्रह्मचर्येण वर्तेत किमतः परमं तपः॥ ४० | जो लोग केवल जल पीकर, वायुका आहार कर, दाँतोंसे ही ओखलीका काम लेकर, पत्थरपर कुटे हुए पदार्थोंको खाकर, दस या पाँच स्थानोंपर अग्नि जलाकर उनके मध्यमें बैठकर तपस्या करनेवाले हैं तथा सुदुष्कर व्रतोंका पालन करते हुए तपस्यामें निरत हैं, वे लोग भी ब्रह्मचर्यको प्रधान मानकर परम गतिको प्राप्त होते हैं। परलोकमें ब्रह्मचर्यके महत्त्वको जाननेवाले लोग ऐसा कहते हैं कि ब्रह्मचर्यके पालनसे ब्राह्मणको ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति होती है। ब्रह्मचर्यमें धैर्य स्थित है, ब्रह्मचर्यमें तप स्थित है तथा जो ब्राह्मण ब्रह्मचर्यमें स्थित रहते हैं, वे मानो स्वर्गमें स्थित हैं। लोकमें योगके बिना सिद्धि और सिद्धिके बिना यशकी प्राप्ति नहीं हो सकती तथा यशःप्राप्तिका मूल कारण परम तप ब्रह्मचर्यके बिना नहीं हो सकता। जो इन्द्रियसम्मूह और पञ्चमहाभूतोंको वशमें करके ब्रह्मचर्यका पालन करता है, उसके लिये इससे बढ़कर और कौन-सा तप हो सकता है? अर्थात् कोई नहीं॥ ३१—४०॥ |
| अयोगे केशधारणमसंकल्पे व्रतक्रिया।<br>अब्रह्मचर्या चर्या च त्रयं स्याद् दम्भसंज्ञकम्॥ ४१<br>क्व दाराः क्व च संयोगः क्व च भावविपर्ययः।<br>नन्वियं ब्रह्मणा सृष्टा मनसा मानसी प्रजा॥ ४२<br>यद्यस्ति तपसो वीर्यं युष्माकं विदितात्मनाम्।<br>सृजध्वं मानसान् पुत्रान् प्राजापत्येन कर्मणा॥ ४३<br>मनसा निर्मिता योनिराधातव्या तपस्विभिः।<br>न दारयोगो बीजं वा व्रतमुक्तं तपस्विनाम्॥ ४४<br>यदिदं लुप्तधर्मार्थं युष्माभिरिह निर्भयैः।<br>व्याहृतं सद्भिरत्यर्थमसद्भिरिव मे मतम्॥ ४५<br>वपुर्दीप्तान्तरात्मानमेतत् कृत्वा मनोमयम्।<br>दारयोगं विना स्रक्ष्ये पुत्रमात्मतनूरुहम्॥ ४६<br>एवमात्मानमात्मा मे द्वितीयं जनयिष्यति।<br>वन्येनानेन विधिना दिधिक्षन्तमिव प्रजाः॥ ४७<br>ऊर्वस्तु तपसाविष्टो निवेश्योरुं हुताशने।<br>ममन्थैकेन दर्भेण सुतस्य प्रभवारणिम्॥ ४८<br>तस्योरुं सहसा भित्त्वा ज्वालामाली ह्यनिन्धनः।<br>जगतो दहनाकाङ्क्षी पुत्रोऽग्निः समपद्यत॥ ४९ | 'योगाभ्यासके बिना जटा धारण करना, संकल्पके बिना व्रताचरण और ब्रह्मचर्य-हीन दशामें नियमोंका पालन—ये तीनों दम्भ कहे जाते हैं। कहाँ स्त्री, कहाँ स्त्री-संयोग और कहाँ स्त्री-पुरुषका भाव-परिवर्तन? परंतु इन सबके अभावमें ही ब्रह्माने इस सृष्टिको मनसे उत्पन्न की है और सारी प्रजाएँ भी मनसे ही प्रादुर्भूत हुई हैं। इसलिये आत्मज्ञानी आपलोगोंमें यदि तपस्याका बल है तो प्रजापतिके कर्मानुसार आपलोग भी मानसिक पुत्रोंकी सृष्टि कीजिये। तपस्वियोंको मानसिक संकल्पद्वारा योनिका निर्माण कर उसमें आधान करना चाहिये। उनके लिये स्त्री-संयोग, बीज और व्रत आदिका विधान नहीं है। आपलोगोंने मेरे सामने निर्भय होकर जो यह धर्म और अर्थसे हीन वचन कहा है, यह सत्पुरुषोंद्वारा अत्यन्त गर्हित है। मेरे विचारसे तो यह अज्ञानियोंकी उक्ति-जैसा है। मैं अपने इस उद्दीप्त अन्तरात्मावाले शरीरको मनोमय करके स्त्री-संयोगके बिना ही अपने शरीरसे पुत्रकी सृष्टि करूँगा। इस प्रकार मेरा आत्मा इस वन्य (वानप्रस्थ) विधिके अनुसार प्रजाओंको जला देनेवाले दूसरे आत्मा (पुत्र)-को उत्पन्न करेगा।' तत्पश्चात् ऊर्वने तपस्यामें संलग्न होकर अपनी जाँघको अग्निमें डालकर पुत्रकी उत्पत्तिके लिये एक कुशसे अरणि-मन्थन किया। तब सहसा उनकी जाँघका भेदन कर इन्धनरहित होनेपर भी ज्वालाओंसे युक्त अग्नि जगत्को जला देनेकी इच्छासे पुत्ररूपमें प्रकट हुआ। |
| * अध्याय १७५ * | ७२१ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| ऊर्वस्योरुं विनिर्भिद्य और्वो नामान्तकोऽनलः।<br>दिधक्षन्निव लोकांस्त्रीञ्जज्ञे परमकोपनः॥ ५०<br>उत्पन्नमात्रश्चोवाच पितरं क्षीणया गिरा।<br>क्षुधा मे बाधते तात जगद् भक्ष्ये त्यजस्व माम्॥ ५१<br>त्रिदिवारोहिभिर्ज्वालैर्जृम्भमाणो दिशो दश।<br>निर्दहन् सर्वभूतानि ववृधे सोऽन्तकोऽनलः॥ ५२<br>एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा मुनिमूर्वं समाजयन्।<br>उवाच वार्यतां पुत्रो जगतश्च दयां कुरु॥ ५३<br>अस्यापत्यस्य ते विप्र करिष्ये स्थानमुत्तमम्।<br>तथ्यमेतद्वचः पुत्र शृणु त्वं वदतां वर॥ ५४ | इस प्रकार ऊर्वकी जाँघका भेदन कर वह और्व नामक विनाशकारी अग्नि उत्पन्न हुआ, जो परम क्रोधी और तीनों लोकोंको जला डालना चाहता था। उत्पन्न होते ही उसने मन्द स्वरमें पितासे कहा—'तात! मुझे भूख कष्ट दे रही है, अतः मुझे छोड़िये। मैं जगत्को खा जाऊँगा।' ऐसा कहकर वह विनाशकारी और्व अग्नि स्वर्गतक पहुँचनेवाली ज्वालाओंसे युक्त हो दसों दिशाओंमें फैलकर समस्त प्राणियोंको भस्म करते हुए बढ़ने लगा। इसी बीच ब्रह्मा ऊर्व मुनिके निकट आये और उन्हें आदर देते हुए बोले—'विप्रवर! तुम मेरी बात तो सुनो। अपने पुत्रको मना कर दो, जगत्पर दया तो करो। मैं तुम्हारे इस पुत्रको उत्तम स्थान प्रदान करूँगा। वक्ताओंमें श्रेष्ठ पुत्र! मेरी यह बात एकदम सच है'॥ ४१—५४॥ |
| ऊर्व उवाच<br>धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यन्मेऽद्य भगवाञ्शिशोः।<br>मतिमेतां ददातीह परमानुग्रहाय वै॥ ५५<br>प्रभातकाले सम्प्राप्ते काङ्क्षितव्ये समागमे।<br>भगवंस्तर्पितः पुत्रः कैर्हव्यैः प्राप्स्यते सुखम्॥ ५६<br>कुत्र चास्य निवासः स्याद् भोजनं वा किमात्मकम्।<br>विधास्यतीह भगवान् वीर्यतुल्यं महौजसः॥ ५७ | ऊर्व बोले— भगवन्! आज मैं धन्य हो गया। आपने मुझपर महान् अनुग्रह किया, जो मेरे पुत्रके लिये इस प्रकारकी बुद्धि दे रहे हैं। यह आपका मुझपर परम अनुग्रह है। किंतु प्रातःकाल होनेपर जब वह पुत्र मेरे पास आयेगा तब मैं उसे किन पदार्थोंसे तृप्त करूँगा, जिससे उसे सुख प्राप्त हो सकेगा? इसका निवासस्थान कहाँ होगा? और इसका भोजन किस प्रकारका होगा? (मुझे आशा है कि) आप इस महान् तेजस्वीके पराक्रमके अनुरूप ही सब विधान करेंगे॥ ५५—५७॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>वडवामुखेऽस्य वसतिः समुद्रे वै भविष्यति।<br>मम योनिर्जलं विप्र तस्य पीतवतः सुखम्॥ ५८<br>यत्राहमास नियतं पिबन् वारिमयं हविः।<br>तद्धविस्तव पुत्रस्य विसृजाम्यालयं च तत्॥ ५९<br>ततो युगान्ते भूतानामेष चाहं च पुत्रक।<br>सहितौ विचरिष्यावो निष्पुत्राणामृणापहः॥ ६०<br>एषोऽग्निरन्तकाले तु सलिलाशी मया कृतः।<br>दहनः सर्वभूतानां सदेवासुररक्षसाम्॥ ६१<br>एवमस्त्विति तं सोऽग्निः संवृतज्वालमण्डलः।<br>प्रविवेशार्णवमुखं प्रक्षिप्य पितरि प्रभाम्॥ ६२<br>प्रतियातस्ततो ब्रह्मा ये च सर्वे महर्षयः।<br>और्वस्याग्नेः प्रभां ज्ञात्वा स्वां स्वां गतिमुपाश्रिताः॥ ६३ | ब्रह्माने कहा— विप्रवर! समुद्रमें स्थित बड़वाके मुखमें इसका निवास होगा और मेरे उत्पत्तिस्थानभूत जलको यह सुखपूर्वक पान करेगा। जहाँ मैं जलमय हविका पान करता हुआ नियत रूपसे निवास करता हूँ, वही हवि और वही स्थान मैं तुम्हारे पुत्रके लिये भी दे रहा हूँ। पुत्र! तत्पश्चात् युगान्तके समय यह और मैं—दोनों एक साथ होकर पुत्रहीन प्राणियोंको पितृ-ऋणसे मुक्त करते हुए विचरण करेंगे। इस प्रकार मैंने इस अग्निको जलभक्षी तथा अन्तकालमें देवता, असुर और राक्षसोंसहित समस्त प्राणियोंको दग्ध कर देनेवाला बना दिया। यह सुनकर ऊर्वने 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' कहकर ब्रह्म-वाणीका अनुमोदन किया। तदुपरान्त ज्वालामण्डलसे घिरा हुआ वह अग्नि अपनी कान्तिको पिता ऊर्वमें निहित कर समुद्रके मुखमें प्रविष्ट हो गया। इसके बाद ब्रह्मा ब्रह्मलोकको चले गये और वहाँ उपस्थित सभी महर्षि और्व अग्निकी प्रभाका महत्त्व जानकर अपने-अपने स्थानको चले गये॥ ५८—६३॥ |
७२२ | * मत्स्यपुराण *
| हिरण्यकशिपुर्दृष्ट्वा तदा तन्महदद्भुतम्।<br>उच्चैः प्रणतसर्वाङ्गो वाक्यमेतदुवाच ह॥ ६४<br><br>भगवन्नद्भुतमिदं संवृत्तं लोकसाक्षिकम्।<br>तपसा ते मुनिश्रेष्ठ परितुष्टः पितामहः॥ ६५<br><br>अहं तु तव पुत्रस्य तव चैव महाव्रत।<br>भृत्य इत्यवगन्तव्यः साध्यो यदिह कर्मणा॥ ६६<br><br>तन्मां पश्य समापन्नं तवैवाराधने रतम्।<br>यदि सीदेन्मुनिश्रेष्ठ तवैव स्यात्पराजयः॥ ६७<br><br>ऊर्व उवाच<br><br>धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य तेऽहं गुरुः स्थितः।<br>नास्ति मे तपसानेन भयमद्येह सुव्रत॥ ६८<br><br>तामेव मायां गृह्णीष्व मम पुत्रेण निर्मिताम्।<br>निरिन्धनामग्निमयीं दुर्धर्षां पावकैरपि॥ ६९<br><br>एषा ते स्वस्य वंशस्य वशगारिविनिग्रहे।<br>संरक्ष्यत्यात्मपक्षं च विपक्षं च प्रधर्षति॥ ७०<br><br>एवमस्त्विति तां गृह्य प्रणम्य मुनिपुङ्गवम् ।<br>जगाम त्रिदिवं हृष्टः कृतार्थो दानवेश्वरः॥ ७१<br><br>एषा दुर्विषहा माया देवैरपि दुरासदा।<br>और्वेण निर्मिता पूर्वे पावकेनोर्वसूनुना॥ ७२<br><br>तस्मिंस्तु व्युत्थिते दैत्ये निर्वीर्येषा न संशयः।<br>शापो ह्यस्याः पुरा दत्तः सृष्टा येनैव तेजसा॥ ७३<br><br>यद्येषा प्रतिहन्तव्या कर्तव्यो भगवान् सुखी।<br>दीयंतां मे सखा शक्र तोययोनिर्निशाकरः॥ ७४<br><br>तेनाहं सह संगम्य यादोभिश्च समावृतः।<br>मायामेतां हनिष्यामि त्वत्प्रसादान्न संशयः॥ ७५ | तदनन्तर उस महान् अद्भुत प्रसङ्गको देखकर हिरण्यकशिपु ऊर्व मुनिको साष्टाङ्ग प्रणामकर उच्चस्वरसे इस प्रकार बोला—'भगवन्! यह तो अत्यन्त अद्भुत घटना घटित हुई। सारा जगत् इसका साक्षी है। मुनिश्रेष्ठ! आपकी तपस्यासे पितामह ब्रह्मा संतुष्ट हो गये हैं। महाव्रत! आप ऐसा समझिये कि मैं आपका तथा आपके पुत्रका भृत्य हूँ, अतः यहाँ जो कुछ कार्य हो, उसके लिये मुझे आज्ञा दीजिये। मुझे अपना शरणागत समझिये। मैं आपकी ही आराधनामें निरत हूँ। मुनिश्रेष्ठ! इसपर भी यदि मैं कष्ट पाता हूँ तो यह आपकी ही पराजय होगी॥ ६४—६७॥<br><br>ऊर्वने कहा—सुव्रत! यदि मैं तुम्हारे गुरुके रूपमें स्थित हूँ तो मैं धन्य हो गया। तुमने मुझपर महान् अनुग्रह किया। अब तुम्हें मेरी इस तपस्याके बलसे जगत्में किसी प्रकारका भय नहीं है। इसके लिये तुम मेरे पुत्रद्वारा निर्मित उसी मायाको ग्रहण करो, जो इन्धनरहित होनेपर भी अग्निमयी और अग्नियोंद्वारा भी दुर्धर्ष है। शत्रुओंका निग्रह करते समय यह माया तुम्हारे निजी वंशके वशमें रहेगी। यह आत्मपक्षका संरक्षण और विपक्षका विनाश करेगी। यह सुनकर दानवेश्वर हिरण्यकशिपुने 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' यों कहकर उस मायाको ग्रहणकर मुनिश्रेष्ठ ऊर्वको प्रणाम किया और वह कृतार्थ होकर प्रसन्नतापूर्वक स्वर्गको चला गया। (वरुण कहते हैं—) यह वही माया है, जो असह्य और देवताओंके लिये भी दुर्गम्य है। इसे पूर्वकालमें ऊर्वके पुत्र और्व अग्निने निर्मित किया था। उस हिरण्यकशिपु दैत्यके मर जानेपर निःसंदेह यह माया शक्तिहीन हो जायगी; क्योंकि यह जिसके तेजसे उत्पन्न हुई थी, उन ऊर्व ऋषिने इसे पहले ही ऐसा शाप दे रखा है। अतः शक्र! यदि आप इसका विनाश करके सबको सुखी करना चाहते हैं तो जलके उत्पत्तिस्थान चन्द्रमाको मुझे सखारूपमें प्रदान कीजिये। जल-जन्तुओंसे घिरा हुआ मैं उनके साथ रहकर आपकी कृपासे इस मायाको नष्ट कर डालूँगा—इसमें संशय नहीं है॥ ६८—७५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे तारकामयसंग्रामे पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकामयसंग्राममें एक सौ पचहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७५॥
| * अध्याय १७६ * | ७२३ |
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एक सौ छिहत्तरवाँ अध्याय
चन्द्रमाकी सहायतासे वरुणद्वारा और्वाग्नि-मायाका प्रशमन, मयद्वारा शैली-मायाका प्राकट्य, भगवान् विष्णुके आदेशसे अग्नि और वायुद्वारा उस मायाका निवारण तथा कालनेमिका रणभूमिमें आगमन
| मत्स्य उवाच | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**देवताओंकी वृद्धि करनेवाले इन्द्र परम प्रसन्न हुए और 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' यों कहकर सर्वप्रथम शीतायुध चन्द्रमाको युद्धके लिये आदेश देते हुए बोले—'सोम ! आप जाइये और असुरोंके विनाश तथा देवताओंकी विजयके निमित्त पाशधारी वरुणकी सहायता कीजिये। आप मुझसे भी बढ़कर पराक्रमी और ज्योतिर्गणोंके अधीश्वर हैं। रसज्ञ लोग सम्पूर्ण लोकोंमें जितने रस हैं, उन्हें आपसे ही युक्त मानते हैं। आपके मण्डलमें सागरकी तरह क्षय और वृद्धि स्पष्टरूपसे होती रहती है। आप जगत्में कालका योग करते हुए दिन-रातका परिवर्तन करते रहते हैं। आपका चिह्न लोककी छायासे युक्त है। आप मृगलाञ्छन हैं। सोम ! जो नक्षत्रोंके उत्पत्तिकर्ता हैं, वे देवता भी आपकी महिमाको नहीं जानते। आप सूर्यके मार्गसे ऊपर सभी ज्योतिर्गणोंके ऊपरी भागमें स्थित हैं और अपने तेजसे अन्धकारको दूर कर सम्पूर्ण जगत्को उद्भासित करते हैं। आप श्वेतभानु, हिमतनु, ज्योतियोंके अधीश्वर, शशलाञ्छन, कालयोंग-स्वरूप, अग्निहोत्र-वेदाध्ययन आदि कर्मरूप, यज्ञके परिणामभूत, अविनाशी, ओषधियोंके स्वामी, कर्मके उत्पादक, शिवजीके मस्तकपर स्थित, शीतल किरणोंवाले, अमृतके आश्रयस्थान, चञ्चल और श्वेतवाहन हैं। आप ही सौन्दर्यशाली व्यक्तियोंके सौन्दर्य हैं और आप ही सोमपान करनेवालोंके लिये सोम हैं। आपका स्वभाव समस्त प्राणियोंके लिये सौम्य है। आप अन्धकारके विनाशक और नक्षत्रोंके स्वामी हैं। इसलिये महासेन ! आप कवचधारी वरुणके साथ जाइये और उस आसुरी मायाको शान्त कीजिये, जिससे हमलोग युद्धस्थलमें जल रहे हैं'॥ १—१०॥ |
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| एवमस्त्विति संहृष्टः शक्रस्त्रिदशवर्धनः।<br>संदिदेशाग्रतः सोमं युद्धाय शिशिरायुधम्॥ १<br>गच्छ सोम सहायत्वं कुरु पाशधरस्य वै।<br>असुराणां विनाशाय जयार्थं च दिवौकसाम्॥ २<br>त्वं मत्तः प्रतिवीर्यश्च ज्योतिषां चेश्वरेश्वरः।<br>त्वन्मयं सर्वलोकेषु रसं रसविदो विदुः॥ ३<br>क्षयवृद्धी तव व्यक्ते सागरस्येव मण्डले।<br>परिवर्तस्यहोरात्रं कालं जगति योजयन्॥ ४<br>लोकच्छायामयं लक्ष्म तवाङ्कः शशसंनिभः।<br>न विदुः सोम देवापि ये च नक्षत्रयोनयः॥ ५<br>त्वमादित्यपथादूर्ध्वं ज्योतिषां चोपरि स्थितः।<br>तमः प्रोत्सार्य महसा भासयस्यखिलं जगत्॥ ६<br>श्वेतभानुर्हिमतनुर्ज्योतिषामधिपः शशी।<br>अधिकृत्कालयोगात्मा इष्टो यज्ञरसोऽव्ययः॥ ७<br>ओषधीशः क्रियायोनिर्हरशेखरभाक् तथा।<br>शीतांशुरामृताधारश्चपलः श्वेतवाहनः॥ ८<br>त्वं कान्तिः कान्तिवपुषां त्वं सोमः सोमपायिनाम्।<br>सौम्यस्त्वं सर्वभूतानां तिमिरघ्नस्त्वमृक्षराट्॥ ९<br>तद् गच्छ त्वं महासेन वरुणेन वरूथिना।<br>शमय त्वासुरीं मायां यया दह्याम संयुगे॥ १० | |
| सोम उवाच | **सोमने कहा—**वरदायक देवराज! यदि आप मुझे युद्धके लिये आदेश देते हैं तो मैं अभी दैत्योंकी मायाका विनाश करनेवाले शिशिरकी वर्षा करता हूँ। |
| यन्मां वदसि युद्धार्थे देवराज वरप्रद।<br>एष वर्षामि शिशिरं दैत्यमायापकर्षणम्॥ ११ |
१७८- कालनेमि और भगवान् विष्णुका रोषपूर्वक वार्तालाप और भीषण युद्ध, विष्णुके चक्रके द्वारा कालनेमिका वध और देवताओंको पुनः निज पदकी प्राप्ति
७२४ * मत्स्यपुराण *
| एतान् मच्छीतनिर्दग्धान् पश्य त्वं हिमवेष्टितान्।<br>विमायान् विमदांश्चैव दैत्यसिंहान् महाहवे॥ १२<br><br>तेषां हिमकरोत्सृष्टाः सपाशा हिमवृष्टयः।<br>वेष्टयन्ति स्म तान् घोरान् दैत्यान् मेघगणा इव॥ १३<br><br>तौ पाशशीतांशुधरौ वरुणेन्दू महाबलौ।<br>जघ्नतुर्हिमपातैश्च पाशपातैश्च दानवान्॥ १४<br><br>द्वावम्बुनाथौ समरे तौ पाशहिमयोधिनौ।<br>मृधे चेरतुरम्भोभिः क्षुब्धाविव महार्णवौ॥ १५<br><br>ताभ्यामाप्लावितं सैन्यं तद्दानवमदृश्यत।<br>जगत्संवर्तकाम्भोदैः प्रविष्टैरिव संवृतम्॥ १६<br><br>तावुद्यताम्बुनाथौ तु शशाङ्कवरुणावुभौ।<br>शमयामासतुर्मायां देवौ दैत्येन्द्रनिर्मिताम्॥ १७<br><br>शीतांशुजालनिर्दग्धाः पाशैश्च स्पन्दिता रणे।<br>न शेकुश्चलितुं दैत्या विशिरस्का इवाद्रयः॥ १८<br><br>शीतांशुनिहतास्ते तु दैत्यास्तोयहिमार्दिताः।<br>हिमाप्लावितसर्वाङ्गा निरुष्माण इवाग्नयः॥ १९<br><br>तेषां तु दिवि दैत्यानां विपरीतप्रभाणि वै।<br>विमानानि विचित्राणि प्रपतन्त्युत्पतन्ति च॥ २०<br><br>तान् पाशहस्तग्रथितांश्छादिताञ्शीतरश्मिभिः।<br>मयो ददर्श मायावी दानवान् दिवि दानवः॥ २१<br><br>स शिलाजालविततां खड्गचर्माट्टहासिनीम्।<br>पादपोत्कटकूटाग्रां कन्दराकीर्णकाननाम्॥ २२<br><br>सिंहव्याघ्रगणाकीर्णां नदद्भिर्गजयूथपैः।<br>ईहामृगगणाकीर्णां पवनाघूर्णितद्रुमाम्॥ २३<br><br>निर्मितां स्वेन यत्नेन कूजितां दिवि कामगाम्।<br>प्रथितां पार्वतीं मायामसृजत् स समन्ततः॥ २४<br><br>सासिशब्दैः शिलावर्षैः सम्पतद्द्भिश्च पादपैः।<br>जघान देवसङ्घांश्च दानवांश्चाप्यजीवयत्॥ २५ | आप इस भीषण युद्धमें मेरे द्वारा प्रयुक्त किये गये शीतसे जले हुए, हिमपरिवेष्टित, माया और गर्वसे रहित इन दैत्यसिंहोंको देखिये। फिर तो वरुणके पाशसहित चन्द्रमाद्वारा छोड़ी गयी हिमवृष्टिने उन भयंकर दैत्योंको मेघसमूहकी तरह घेर लिया। वे दोनों महाबली पाशधारी वरुण और शीतांशु चन्द्रमा पाश और हिमके प्रहारसे दानवोंका संहार करने लगे। वे दोनों जलके स्वामी और समरमें पाश एवं हिमके द्वारा युद्ध करनेवाले थे, अतः वे रणभूमिमें जलसे क्षुब्ध हुए दो महासागरकी भाँति विचरण करने लगे। उन दोनोंके द्वारा जलमग्न की गयी हुई दानवोंकी वह सेना उमड़े हुए संवर्तक नामक बादलोंसे आच्छादित जगत्की तरह दीख रही थी। इस प्रकार जलके स्वामी उन दोनों देवता चन्द्रमा और वरुणने दैत्येन्द्रद्वारा निर्मित मायाको शान्त कर दिया। रणभूमिमें शीतल किरणसमूहोंसे जले हुए तथा पाशोंसे जकड़े हुए दैत्यगण शिखररहित पर्वतोंकी तरह चलनेमें भी असमर्थ हो गये। शीतांशुके आघातसे उन दैत्योंके सर्वाङ्ग हिमसे आप्लावित हो गये और वे जलकी ठण्डकसे ठिठुर गये। इस प्रकार वे गरमीरहित अग्निकी तरह दीख रहे थे। आकाशमण्डलमें विचरनेवाले उन दैत्योंके विचित्र विमानोंकी कान्ति विपरीत हो गयी और वे लड़खड़ाकर गिरने-पड़ने लगे॥ ११–२०॥<br><br>इस प्रकार जब मायावी मयदानवने आकाशमें उन दानवोंको वरुणके पाशद्वारा बँधे हुए तथा शीतल किरणोंद्वारा आच्छादित देखा, तब उसने चारों ओर सुप्रसिद्ध पार्वती मायाकी सृष्टि की, जो शिलासमूहसे व्याप्त तथा ढाल-तलवारसे युक्त हो अट्टहास करनेवाली थी, जिसका अग्रभाग घने वृक्षोंसे आच्छादित होनेके कारण भयंकर था, जो कन्दराओंसे व्याप्त काननोंसे युक्त, सिंहों, व्याघ्रों, चिग्घाड़ते हुए गजयूथों और भेड़ियोंसे परिपूर्ण थी, जिसके वृक्ष वायुके झकोरेसे चक्कर काट रहे थे, जो अपने ही प्रयत्नसे निर्मित, घोर शब्द करनेवाली और आकाशमें स्वेच्छानुसार गमन करनेवाली थी। वह पार्वती-माया तलवारोंकी खनखनाहट, शिलाओंकी वृष्टि और गिरते हुए वृक्षोंसे देवसमूहोंका संहार करने लगी। उधर उसने दानवोंको जीवित भी कर दिया। |
* अध्याय १७६ * ७२५
| नैशाकरी वारुणी च मायेऽन्तर्दधतुस्ततः।<br>असिभिश्चायसगणैः किरन् देवगणान् रणे॥ २६<br><br>साश्मयन्त्रायुधघना द्रुमपर्वतसङ्कटा।<br>अभवद् घोरसंचारा पृथिवी पर्वतैरिव॥ २७<br><br>अश्मना प्रहताः केचिच्छिलाभिः शकलीकृताः।<br>नानिरुद्धो द्रुमगणैर्देवोऽदृश्यत कश्चन॥ २८<br><br>तदपध्वस्तधनुषं भग्नप्रहरणाविलम्।<br>निष्प्रयत्नं सुरानीकं वर्जयित्वा गदाधरम्॥ २९<br><br>स हि युद्धगतः श्रीमानीशो न स्म व्यकम्पत।<br>सहिष्णुत्वाज्जगत्स्वामी न चुक्रोध गदाधरः॥ ३०<br><br>कालज्ञः कालमेघाभः समीक्ष्य कालमाहवे।<br>देवासुरविमर्दं तु द्रष्टुकामस्तदा हरिः॥ ३१ | उसके प्रभावसे चन्द्रमा और वरुणकी दोनों मायाएँ अन्तर्हित हो गयीं। वह दैत्य रणभूमिमें देवगणोंके ऊपर तलवारों और लोहनिर्मित अन्यान्य अस्त्रोंका प्रयोग कर रहा था। उसने रणभूमिको शिलाओं, यन्त्रों, अस्त्रों, वृक्षों और पर्वतोंसे ऐसा सघनरूपसे पाट दिया कि वहाँकी पृथ्वी पर्वतोंकी तरह चलने-फिरनेके लिये दुर्गम हो गयी। उस समय कुछ देवता पत्थरोंसे आहत कर दिये गये, कुछ शिलाओंकी मारसे खण्ड-खण्ड कर दिये गये तथा कोई भी देवता ऐसा नहीं दीख रहा था, जो वृक्षसमूहोंसे ढक न गया हो। इस प्रकार एकमात्र भगवान् गदाधरको छोड़कर देवताओंकी उस सेनाके धनुष छिन्न-भिन्न हो गये, अस्त्रसमूह नष्ट हो गये और वह प्रयत्नहीन हो गयी। शोभाशाली परमेश्वर गदाधर युद्धस्थलमें उपस्थित होनेपर भी विचलित नहीं हुए तथा सहनशील होनेके कारण उन जगदीश्वरको क्रोध भी नहीं आया। काले मेघकी-सी कान्तिवाले कालके ज्ञाता श्रीहरि रणभूमिमें देवताओं और असुरोंके युद्धको देखनेकी इच्छासे कालकी प्रतीक्षा करते हुए स्थित थे॥ २१—३१॥ | | ततो भगवता दृष्टो रणे पावकमारुतौ।<br>चोदितौ विष्णुवाक्येन तौ मायामपकर्षताम्॥ ३२<br><br>ताभ्यामुद्भ्रान्तवेगाभ्यां प्रवृद्धाभ्यां महाहवे।<br>दग्धा सा पार्वती माया भस्मीभूता ननाश ह॥ ३३<br><br>सोऽनिलोऽनलसंयुक्तः सोऽनलश्चानिलाकुलः।<br>दैत्यसेनां ददहतुर्युगान्तेष्विव मूर्च्छितौ॥ ३४<br><br>वायुः प्रधावितस्तत्र पश्चादग्निस्तु मारुतम्।<br>चेरतुर्दानवानीके क्रीडन्तावनिलानलौ॥ ३५<br><br>भस्मावयवभूतेषु प्रपतत्सूत्पतत्सु च।<br>दानवानां विमानेषु निपतत्सु समन्ततः॥ ३६<br><br>वातस्कन्धापविद्धेषु कृतकर्मणि पावके।<br>मायाबन्धे निवृत्ते तु स्तूयमाने गदाधरे॥ ३७<br><br>निष्प्रयत्नेषु दैत्येषु त्रैलोक्ये मुक्तबन्धने।<br>सम्पहृष्टेषु देवेषु साधु साध्विति सर्वशः॥ ३८<br><br>जये दशशताक्षस्य दैत्यानां च पराजये।<br>दिक्षु सर्वासु शुद्धासु प्रवृत्ते धर्मविस्तरे॥ ३९<br><br>अपावृते चन्द्रमसि स्वस्थानस्थे दिवाकरे।<br>प्रकृतिस्थेषु लोकेषु त्रिषु चारित्रबन्धुषु॥ ४० | तदनन्तर रणभूमिमें भगवान्को अग्नि और वायु दीख पड़े। तब भगवान् विष्णुने उन्हें प्रेरित किया कि तुम दोनों इस मायाको नष्ट कर डालो। तब वृद्धिकी अन्तिम सीमापर पहुँचे हुए उन प्रचण्ड वेगशाली वायु और अग्निके प्रभावसे उस महासमरमें वह पार्वती माया जलकर भस्म हो गयी और सर्वथा नष्ट हो गयी। इसके बाद अग्निसे संयुक्त वायु और वायुसे संयुक्त अग्नि—दोनों पूरी शक्ति लगाकर युगान्तकी तरह दैत्यसेनाको भस्म करने लगे। आगे-आगे वायुदेव चलते थे, फिर वायुदेवके पीछे अग्निदेव चलते थे। इस प्रकार अग्नि और वायु उस दानव-सेनामें क्रीडा करते हुए विचरण कर रहे थे। दानवोंकी सेना जलती हुई इधर-उधर भागने लगी और विमान चारों ओर जलकर गिरने लगे। दानवोंके कंधे वायुसे अकड़ गये। इस प्रकार अग्निद्वारा अपना कर्म कर चुकनेपर मायाका बन्धन निवृत्त हो गया, भगवान् गदाधरकी स्तुति की जाने लगी, दैत्यगण प्रयत्नहीन हो गये, त्रिलोकी बन्धनसे मुक्त हो गयी, परम प्रसन्न हुए देवगण सब ओर 'ठीक है, ठीक हैं' ऐसा शब्द बोलने लगे। इन्द्रकी विजय और दैत्योंकी पराजय हो गयी, सभी दिशाएँ शुद्ध हो गयीं, धर्मका विस्तार होने लगा।' चन्द्रमाका आवरण हट गया, सूर्य अपने स्थानपर स्थित हो गये, तीनों लोक निश्चिन्त हो गये, लोगोंमें |
| ७२६ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यजमानेषु भूतेषु प्रशान्तेषु च पाप्मसु।<br>अभिन्नबन्धने मृत्यौ हूयमाने हुताशने॥ ४१<br>यज्ञशोभिषु देवेषु स्वर्गार्थं दर्शयत्सु च।<br>लोकपालेषु सर्वेषु दिक्षु संयानवर्तिषु॥ ४२<br>भावे तपसि सिद्धानामभावे पापकर्मणाम्।<br>देवपक्षे प्रमुदिते दैत्यपक्षे विषीदति॥ ४३<br>त्रिपादविग्रहे धर्मे अधर्मे पादविग्रहे।<br>अपावृत्ते महाद्वारे वर्तमाने च सत्यथे॥ ४४<br>लोके प्रवृत्ते धर्मेषु सुधर्मेष्वाश्रमेषु च।<br>प्रजारक्षणयुक्तेषु भ्राजमानेषु राजसु॥ ४५<br>प्रशान्तकल्मषे लोके शान्ते तमसि दानवे।<br>अग्निमारुतयोस्तत्र वृत्ते संग्रामकर्मणि॥ ४६<br>तन्मया विपुला लोकास्ताभ्यां कृतजयक्रिया। | चरित्रबल और बन्धुत्वकी भावना जाग्रत् हो गयी, सभी प्राणी यज्ञकी भावनासे पूर्ण हो गये, पापोंका प्रशमन हो गया, मृत्युका बन्धन सुदृढ़ हो गया, अग्निमें आहुतियाँ पड़ने लगीं, यज्ञोंमें शोभा पानेवाले देवगण स्वर्गकी प्राप्तिके हेतु मार्गदर्शन करने लगे, लोकपालगण सभी दिशाओंके लिये प्रस्थित हो गये, सिद्धोंकी भावना तपस्यामें संलग्न हो गयी, पापकर्मोंका अभाव हो गया, देवपक्षमें आनन्द मनाया जाने लगा। दैत्यपक्षमें उदासी छा गयी, धर्म तीन चरणोंसे स्थित हुआ और अधर्मका एक चरण रह गया, महाद्वार (यममार्ग) बंद हो गया और सन्मार्गका प्रचार होने लगा। सभी लोग अपने-अपने वर्णधर्म एवं आश्रमधर्ममें प्रवृत्त हो गये, राजाओंका दल प्रजाकी रक्षामें तत्पर होकर सुशोभित होने लगा, दानवरूपी तमोगुणके शान्त हो जानेपर जगत्में पापका विनाश हो गया। इस प्रकार अग्नि और वायुद्वारा युद्धकर्म किये जानेपर सभी विशाल लोक उन्हींसे युक्त हो गये और उन्हींके द्वारा यह विजयकी क्रिया सम्पन्न हुई॥ ३२-४६ १/२॥ |
| पूर्वं दैत्यभयं श्रुत्वा मारुताग्निकृतं महत्॥ ४७<br>कालनेमीति विख्यातो दानवः प्रत्यदृश्यत।<br>भास्कराकारमुकुटः शिञ्जिताभरणाङ्गदः॥ ४८<br>मन्दराद्रिप्रतीकाशो महारजतपर्वतः।<br>शतप्रहरणोदग्रः शतबाहुः शताननः॥ ४९<br>शतशीर्षः स्थितः श्रीमाञ्छतशृङ्ग इवाचलः।<br>पक्षे महति संवृद्धो निदाघ इव पावकः॥ ५०<br>धूम्रकेशो हरिच्छ्मश्रुः संदष्टौष्ठपुटाननः।<br>त्रैलोक्यान्तरविस्तारि धारयन् विपुलं वपुः॥ ५१<br>बाहुभिस्तुलयन् व्योम क्षिपन् पद्भ्यां महीधरान्।<br>ईरयन् मुखनिःश्वासैर्वृष्टियुक्तान् बलाहकान्॥ ५२<br>तिर्यगायतरक्ताक्षं मन्दरोद्रग्रवर्चसम्।<br>दिधक्षन्तमिवायातं सर्वान् देवगणान् मृधे॥ ५३<br>तर्जयन्तं सुरगणांश्छादयन्तं दिशो दश।<br>संवर्तकाले तृषितं दृष्टं मृत्युमिवोत्थितम्॥ ५४ | तदनन्तर दैत्योंके लिये वायु और अग्निद्वारा उत्पन्न किये गये महान् भयको सुनकर सर्वप्रथम कालनेमि नामसे विख्यात दानव (युद्धभूमिमें) दिखायी पड़ा। वह सुवर्णसे युक्त मन्दराचलके समान विशालकाय था, उसके मस्तकपर सूर्य-सरीखा मुकुट चमक रहा था, वह मधुर शब्द करते हुए बाजूबंदसे विभूषित था, उसके सौ बाहु, सौ मुख और सौ मस्तक थे, वह परम भयानक सौ अस्त्रोंको एक साथ धारण किये हुए था, इस प्रकार वह सौ शिखरोंवाले पर्वतकी भाँति शोभा पा रहा था, दैत्योंके विशाल पक्षमें आगे बढ़ा हुआ वह दानव ग्रीष्मकालीन अग्निकी तरह दीख रहा था, उसके बाल धूमिल थे, उसकी दाढ़ी हरे रंगकी थी, वह दाँतोंसे होंठोंको दबाये हुए मुखसे युक्त था, इस प्रकार वह समूची त्रिलोकीमें विस्तृत विशाल शरीर धारण किये हुए था। वह भुजाओंसे आकाशको नापता हुआ, पैरोंसे पर्वतोंको फेंकता हुआ और मुखके निःश्वाससे जलयुक्त बादलोंको तितर-बितर करता हुआ चल रहा था। उसकी बड़ी-बड़ी लाल आँखें तिरछी मढ़ी हुई थीं। वह मन्दराचलके समान परम तेजस्वी था। वह युद्धस्थलमें समस्त देवगणोंको जलाते हुएकी तरह आ रहा था। वह देवगणोंको भयभीत कर रहा था, दसों दिशाओंको आच्छादित किये हुए था और प्रलयकालमें प्रकट हुए प्यासे मृत्युकी |
| * अध्याय १७७ * | ७२७ |
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| सुतलेनोच्छ्रयवता विपुलाङ्गुलिपर्वणा।<br>लम्बाभरणपूर्णेन किंचिच्चलितवर्मणा॥ ५५<br><br>उच्छ्रितेनाग्रहस्तेन दक्षिणेन वपुष्मता।<br>दानवान् देवनिहतानुत्तिष्ठध्वमिति ब्रुवन्॥ ५६<br><br>तं कालनेमिं समरे द्विषतां कालचेष्टितम्।<br>वीक्षन्ते स्म सुराः सर्वे भयवित्रस्तलोचनाः॥ ५७<br><br>तं वीक्षन्ति स्म भूतानि क्रमन्तं कालनेमिनम्।<br>त्रिविक्रमं विक्रमन्तं नारायणमिवापरम्॥ ५८<br><br>सोऽत्युच्छ्रयपुरःपादमरुताघूर्णिताम्बरः ।<br>प्रक्रामन्नसुरो युद्धे त्रासयामास देवताः॥ ५९<br><br>स मयेनासुरेन्द्रेण परिष्वक्तस्ततो रणे।<br>कालनेमिर्बभौ दैत्यः सविष्णुरिव मन्दरः॥ ६०<br><br>अथ विव्यथिरे देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः।<br>कालनेमिं समायान्तं दृष्ट्वा कालमिवापरम्॥ ६१ | तरह दीख रहा था। जो सुतलसे निकला था, जिसकी अंगुलियोंके पर्व (पोरु) विशाल थे, जो आभरणोंसे युक्त था, जिसका कवच कुछ हिल रहा था और जिसके दाहिने हाथका अग्रभाग उठा हुआ था, ऐसे शरीरसे युक्त कालनेमिने देवताओंद्धारा मारे गये दानवोंसे कहा— 'अब तुमलोग उठकर खड़े हो जाओ'॥ ४७—५६॥<br><br>इस प्रकार समरभूमिमें शत्रुओंके प्रति कालकी-सी भीषण चेष्टा करनेवाले उस कालनेमिकी ओर सभी देवता एकटक निहारने लगे। उस समय उनके नेत्र भयसे कातर हो रहे थे। इस प्रकार चलते हुए उस कालनेमिको समस्त प्राणी ऐसे देख रहे थे मानो तीन पगसे त्रिलोकीको नापनेके लिये चलते हुए दूसरे नारायण हों। अत्यन्त विशाल शरीरवाले कालनेमिके चलते हुए पैरोंकी वायुसे आकाश चक्कर-सा काटने लगता था, इस प्रकार वह असुर युद्धभूमिमें विचरण करता हुआ देवताओंको भयभीत करने लगा। तदुपरान्त रणक्षेत्रमें असुरराज मयने कालनेमिका आलिङ्गन किया। उस समय वह दैत्य विष्णुसहित मन्दराचलके समान सुशोभित हो रहा था। तदनन्तर इन्द्र आदि सभी देवता दूसरे कालकी तरह कालनेमिको आया हुआ देखकर अत्यन्त व्यथित हो गये॥ ५७—६१॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तारकामययुद्धे षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकामययुद्धमें एक सौ छिहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७६॥
एक सौ सतहत्तरवाँ अध्याय
देवताओं और दैत्योंकी सेनाओंकी अद्भुत मुठभेड़, कालनेमिका भीषण पराक्रम और उसकी देवसेनापर विजय
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— रविनन्दन! महान् तेजस्वी |
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| दानवानामनीकेषु कालनेमिर्महासुरः।<br>व्यवधर्त महातेजास्तपान्ते जलदो यथा॥ १<br><br>तं त्रैलोक्यान्तरगतं दृष्ट्वा ते दानवेश्वराः।<br>उत्तस्थुरपरिश्रान्ताः पीत्वामृतमनुत्तमम्॥ २<br><br>ते वीतभयसंत्रासा मयतारपुरोगमाः।<br>तारकामयसंग्रामे सततं जितकाशिनः॥ ३ | महासुर कालनेमि दानवोंकी सेनामें उसी प्रकार वृद्धिंगत होने लगा, जैसे ग्रीष्म-ऋतुके अन्तमें बादल उमड़ पड़ते हैं। तब वे सभी दानव-यूथपति कालनेमिको त्रिलोकीमें व्याप्त देखकर श्रमरहित हो गये और सर्वोत्तम अमृतका पान कर उठ खड़े हुए। उनके भय और त्रास समाप्त हो चुके थे। वे तारकामय-संग्राममें मय और तारकको आगे रखकर सदा विजयी होते रहे हैं। |