भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 726, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 726
७१६* मत्स्यपुराण *
स वायुः सर्वभूतायुरुद्भूतः स्वेन तेजसा।<br>ववौ प्रव्यथयन् दैत्यान्प्रतिलोमं सतोयदः॥ ३१<br>मरुतो दिव्यगन्धर्वैर्विद्याधरगणैः सह।<br>चिक्रीडुरसिभिः शुभ्रैर्निर्मुक्तैरिव पन्नगैः॥ ३२सम्पूर्ण प्राणियोंका आयुस्वरूप वह वायु वहाँ अपने तेजसे प्रकट हुआ। वह बादलोंको साथ लेकर दैत्योंको प्रव्यथित करता हुआ उनकी प्रतिकूल दिशामें बहने लगा। मरुद्गण दिव्य गन्धर्वों और विद्याधरोंके साथ केंचुलसे छूटे हुए सर्पकी भाँति निर्मल तलवारोंसे क्रीडा करने लगे॥ २८—३२॥
सृजन्तः सर्पपतयस्तीव्रतोयमयं विषम्।<br>शरभूता दिवीन्द्राणां चेरुर्व्यात्तानना दिवि॥ ३३<br>पर्वतैश्च शिलाशृङ्गैः शतशश्चैव पादपैः।<br>उपतस्थुः सुरगणाः प्रहर्तुं दानवं बलम्॥ ३४<br>यः स देवो हृषीकेशः पद्मनाभस्त्रिविक्रमः।<br>युगान्ते कृष्णवर्णाभो विश्वस्य जगतः प्रभुः॥ ३५<br>सर्वयोनिः स मधुहा हव्यभुक् क्रतुसंस्थितः।<br>भूम्यापोव्योमभूतात्मा श्यामः शान्तिकरोऽरिहा॥ ३६<br>अरिघ्नममरादीनां चक्रं गृह्य गदाधरः।<br>अर्कं नगादिवोद्यन्तमुद्यम्योत्तमतेजसा॥ ३७<br>सव्येनालम्व्य महतीं सर्वासुरविनाशिनीम्।<br>करेण कालीं वपुषा शत्रुकाालप्रदां गदाम्॥ ३८<br>अन्यैर्भुजैः प्रदीप्ताभैर्भुजगारिध्वजः प्रभुः।<br>दधारायुधजातानि शार्ङ्गादीनि महाबलः॥ ३९इसी प्रकार नागाधीश्वरगण आकाशमें मुख फैलाये हुए तीव्र जलमय विषको उगलते हुए आकाशचारियोंके बाणरूप होकर विचरण करने लगे। अन्यान्य देवगण सैकड़ों पर्वतों, शिलाओं, शिखरों और वृक्षोंसे दानवसेनापर प्रहार करनेके लिये उपस्थित हुए। तत्पश्चात् जो इन्द्रियोंके अधीश्वर, पद्मनाभ, तीन पगसे त्रिलोकीको नाप लेनेवाले, प्रलयकालमें कृष्ण वर्णकी आभासे युक्त, सम्पूर्ण जगत्के स्वामी, सबके उत्पत्तिस्थान, मधु नामक दैत्यके वधकर्ता, यज्ञमें स्थित होकर हव्यके भोक्ता, पृथ्वीजलआकाशस्वरूप, श्याम वर्णवाले, शान्तिकर्ता और शत्रुओंका हनन करनेवाले हैं, उन भगवान् गदाधरने देवताओंके शत्रुओंका विनाश करनेवाले अपने सुदर्शन चक्रको, जो अपने उत्तम तेजसे उदयाचलसे उदय होते हुए सूर्यके समान चमक रहा था, हाथमें ऊपर उठा लिया। फिर उन्होंने बायें हाथसे अपनी विशाल गदाका आलम्बन लिया, जो समस्त असुरोंकी विनाशिनी, काले रंगवाली और शत्रुओंको कालके गालमें डालनेवाली थी। महाबली गरुडध्वज भगवान्ने अपनी अन्य देदीप्यमान भुजाओंसे शार्ङ्गधनुष आदि अन्यान्य आयुधोंको धारण किया॥ ३३—३९॥
स कश्यपस्यात्मभुवं द्विजं भुजभोजनम्।<br>पवनाधिकसम्पातं गगनक्षोभणं खगम्॥ ४०<br>भुजगेन्द्रेण वदने निविष्टेन विराजितम्।<br>अमृतारम्भनिर्मुक्तं मन्द्राद्रिमिवोच्छितम्॥ ४१<br>देवासुरविमर्देषु बहुशो दृढविक्रमम्।<br>महेन्द्रेणामृतस्यार्थे वज्रेण कृतलक्षणम्॥ ४२<br>शिखिनं बलिनं चैव तप्तकुण्डलभूषणम्।<br>विचित्रपत्रवसनं धातुमन्तमिवाचलम्॥ ४३<br>स्फीतक्रोडावलम्बेन शीतांशुसमतेजसा।<br>भोगिभोगावसिक्तेन मणिरत्नेन भास्वता॥ ४४तदनन्तर जो कश्यपके पुत्र, सर्पभक्षी, वायुसे भी अधिक वेगशाली, आकाशको क्षुब्ध कर देनेवाले, आकाशचारी, मुखमें दबाये हुए सर्पसे सुशोभित, अमृत-मन्थनसे मुक्त हुए मन्दराचलके समान ऊँचे, अनेकों बार घटित हुए देवासुर-संग्राममें सुदृढ़ पराक्रम दिखानेवाले, अमृतके लिये इन्द्रके द्वारा वज्रके प्रहारसे किये गये चिह्नसे युक्त, शिखाधारी, महाबली, तपाये हुए स्वर्णनिर्मित कुण्डलोंसे विभूषित, विचित्र पंखरूपी वस्त्रवाले और धातुयुक्त पर्वतके समान शोभायमान थे, उनका वक्षःस्थल लम्बा और चौड़ा था, जो चन्द्रमाके समान उद्भासित हो रहा था, उसपर नागोंके फणोंमें लगी हुई मणियाँ चमक रही थीं,