भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 725, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 725
  • अध्याय १७४ * | ७१५ --- | ---:

| राजराजेश्वरः श्रीमान् गदापाणिरदृश्यत।<br>विमानयोधी धनदो विमाने पुष्पके स्थितः॥ १७<br>स राजराजः शुशुभे युद्धार्थी नरवाहनः।<br>उक्षाणमास्थितः संख्ये साक्षादिव शिवः स्वयम्॥ १८<br>पूर्वपक्षः सहस्राक्षः पितृराजस्तु दक्षिणः।<br>वरुणः पश्चिमं पक्षमुत्तरं नरवाहनः॥ १९<br>चतुर्षु युक्ताश्चत्वारो लोकपाला महाबलाः।<br>स्वासु दिक्षु स्वरक्षन्त तस्य देवबलस्य ते॥ २० | हाथमें गदा धारण किये हुए पुष्पकविमानपर आरूढ हुए दिखायी पड़े। उस समय युद्धकी इच्छासे आये हुए राजराजेश्वर नरवाहन कुबेरकी ऐसी शोभा हो रही थी, मानो युद्धस्थलमें नन्दीश्वरपर बैठे हुए साक्षात् स्वयं शिवजी ही हों। सेनाके पूर्वभागमें इन्द्र, दक्षिणभागमें यमराज, पश्चिमभागमें वरुण और उत्तरभागमें कुबेर— इस प्रकार ये चारों महाबली लोकपाल चारों दिशाओंमें स्थित हुए। वे अपनी-अपनी दिशाओंमें बड़ी सतर्कताके साथ उस देवसेनाकी रक्षा कर रहे थे॥ १७–२०॥ | | सूर्यः सप्ताश्वयुक्तेन रथेनामितगामिना।<br>श्रिया जाज्वल्यमानेन दीप्यमानैश्च रश्मिभिः॥ २१<br>उदयास्तगचक्रेण मेरुपर्वतगामिना।<br>त्रिदिवद्वारचक्रेण तपता लोकमव्ययम्॥ २२<br>सहस्ररश्मियुक्तेन भ्राजमानेन तेजसा।<br>चचार मध्ये लोकानां द्वादशात्मा दिनेश्वरः॥ २३<br>सोमः श्वेतहये भाति स्यन्दने शीतरश्मिवान्।<br>हिमवत्तोयपूर्णाभिर्भाभिराह्लादयञ्जगत् ॥ २४<br>तमृक्षपूगानुगतं शिशिरांशुं द्विजेश्वरम्।<br>शशच्छायाङ्किततनुं नैशस्य तमसः क्षयम्॥ २५<br>ज्योतिषामीश्वरं व्योम्नि रसानां रसदं प्रभुम्।<br>ओषधीनां सहस्राणां निधानममृतस्य च॥ २६<br>जगतः प्रथमं भागं सौम्यं सत्यमयं रथम्।<br>ददृशुर्दानवाः सोमं हिमप्रहरणं स्थितम्॥ २७ | तदुपरान्त सहस्र किरणोंके सम्मिलित तेजसे उद्भासित द्वादशात्मा दिनेश्वर सूर्य अपने अमित वेगशाली रथपर, जिसमें सात घोड़े जुते हुए थे, जो शोभासे प्रकाशित, सूर्यकी किरणोंसे देदीप्यमान, उदयाचल, अस्ताचल और मेरुपर्वतपर भ्रमण करनेवाला तथा स्वर्गद्वाररूप एक चक्रसे सुशोभित था, सवार हो अविनाशी लोकोंको संतप्त करते हुए लोगोंके बीच विचरण करने लगे। शीतरश्मि चन्द्रमा श्वेत घोड़े जुते हुए रथपर सवार हो अपनी जलपूर्ण हिमकी-सी कान्तिसे जगत्‌को आह्लादित करते हुए सुशोभित हुए। उस समय शीतल किरणोंवाले द्विजेश्वर चन्द्रमाके पीछे नक्षत्रगण चल रहे थे। उनके शरीरमें खरगोशका चिह्न झलक रहा था, वे रात्रिके अन्धकारके विनाशक, सामर्थ्यशाली, आकाशमण्डलमें स्थित ज्योतिर्गणोंके अधीश्वर, रसीले पदार्थोंको रस प्रदान करनेवाले, सहस्रों प्रकारकी ओषधियों तथा अमृतके निधान, जगत्‌के प्रथम भागस्वरूप और सौम्य स्वभाववाले हैं, उनका रथ सत्यमय है। इस प्रकार हिमसे प्रहार करनेवाले चन्द्रमाको दानवोंने वहाँ उपस्थित देखा॥ २१–२७॥ | | यः प्राणः सर्वभूतानां पञ्चधा भिद्यते नृषु।<br>सप्तधातुगतो लोकांस्त्रीन् दधार चचार च॥ २८<br>यमाहुरग्निकर्तारं सर्वप्रभवमीश्वरम्।<br>सप्तस्वरगतो यश्च नित्यं गीर्भिरुदीर्यते॥ २९<br>यं वदन्त्युत्तमं भूतं यं वदन्त्यशरीरिणम्।<br>यमाहुराकाशगमं शीघ्रगं शब्दयोगिनम्॥ ३० | जो समस्त प्राणियोंका प्राणस्वरूप है, मनुष्योंके शरीरोंमें पाँच प्रकारसे विभक्त होता है, जिसकी सातों धातुओंमें गति है, जो तीनों लोकोंको धारण करता तथा उनमें विचरण करता है, जिसे अग्निका कर्ता, सबका उत्पत्तिस्थान और ईश्वर कहते हैं, जो नित्य सातों स्वरोंमें विचरण करता हुआ वाणीद्वारा उच्चरित होता है। जिसे पाँचों भूतोंमें उत्तम भूत, शरीररहित, आकाशचारी, शीघ्रगामी और शब्दयोगी अर्थात् शब्दको उत्पन्न करनेवाला कहा जाता है, |

मत्स्य महापुराण · पृष्ठ 725, कुल 1098 में से · BharatKosha