मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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७१४ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुरुहूतस्तु पुरतो लोकपालः सहस्रदृक्।<br>ग्रामणीः सर्वदेवानामारुरोह सुरद्विपम्॥ ३<br><br>मध्ये चास्य रथः सर्वपक्षिप्रवररंहसः।<br>सुचारुचक्रचरणो हेमवज्रपरिष्कृतः॥ ४<br><br>देवगन्धर्वयक्षौघैरनुयातः सहस्रशः।<br>दीप्तिमद्भिः सदस्यैश्च ब्रह्मर्षिभिरभिष्टुतः॥ ५<br><br>वज्रविस्फूर्जितोद्भूतैर्विद्युदिन्द्रायुधोदितैः।<br>युक्तो बलाहकगणैः पर्वतैरिव कामगैः॥ ६<br><br>यमारूढः स भगवान् पर्यति सकलं जगत्।<br>हविर्धानेषु गायन्ति विप्रा मखमुखे स्थिताः॥ ७<br><br>स्वर्गे शक़्रानुयातेषु देवतूर्यनिनादिषु।<br>सुन्दर्यः परिनृत्यन्ति शतशोऽप्सरसां गणाः॥ ८<br><br>केतुना नागराजेन राजमानो यथा रविः।<br>युक्तो हयसहस्रेण मनोमारुतरंहसा॥ ९<br><br>स स्यन्दनवरो भाति गुप्तो मातलिना तदा।<br>कृत्स्नः परिवृतो मेरुर्भास्करस्येव तेजसा॥ १० | सहस्र नेत्रधारी लोकपाल इन्द्र जो समस्त देवताओंके नायक हैं, सर्वप्रथम सुरगजेन्द्र ऐरावतपर आरूढ़ हुए। सेनाके मध्यभागमें इन्द्रका वह रथ भी खड़ा किया गया, जो समस्त पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुडके समान वेगशाली था। उसमें सुन्दर पहिये लगे हुए थे तथा वह स्वर्ण और वज्रसे विभूषित था। सहस्रोंकी संख्यामें देवताओं, गन्धर्वों और यक्षोंके समूह उसके पीछे-पीछे चल रहे थे। दीप्तिशाली सदस्य और महर्षि उसकी स्तुति कर रहे थे तथा वह वज्रकी गड़गड़ाहटके सदृश शब्द करनेवाले, बिजली और इन्द्रधनुषसे सुशोभित तथा स्वेच्छाचारी पर्वतकी तरह दीखनेवाले मेघसमूहोंसे घिरा हुआ था। उसपर सवार होकर ऐश्वर्यशाली इन्द्र समस्त जगत्में भ्रमण करते हैं, यज्ञोंमें स्थित ब्राह्मणलोग यज्ञके प्रारम्भमें उसकी प्रशंसा करते हैं, स्वर्गलोकमें उसपर बैठकर इन्द्रके प्रस्थित होनेपर उनके पीछे देवताओंकी तुरहियाँ बजने लगती हैं और सैकड़ों सुन्दरी अप्सराएँ संगठित होकर नृत्य करती हैं। वह रथ शेषनागसे अङ्कित ध्वजसे युक्त होकर सूर्यकी भाँति शोभा पाता है तथा उसमें मन और वायुके समान वेगशाली एक हजार घोड़े जोते जाते हैं। उस समय मातलिद्वारा सुरक्षित वह श्रेष्ठ रथ उसी प्रकार सुशोभित हो रहा था, जैसे सूर्यके तेजसे पूर्णतया घिरा हुआ सुमेरुपर्वत हो॥ १-१०॥ |
| यमस्तु दण्डमुद्यम्य कालयुक्तश्च मुद्गरम्।<br>तस्थौ सुरगणानीके दैत्यान् नादेन भीषयन्॥ ११ | इसी प्रकार कालसहित यमराज भी दण्ड और मुद्गरको हाथमें लेकर अपने सिंहनादसे दैत्योंको भयभीत करते हुए देवसेनामें खड़े हुए। |
| चतुर्भिः सागरैर्युक्तो लेलिहानैश्च पन्नगैः।<br>शङ्खमुक्ताङ्गदधरो बिभ्रत् तोयमयं वपुः॥ १२<br><br>कालपाशान् समाविध्यन् हयैः शशिकरोपमैः।<br>वाय्वीरितैर्जलाकारैः कुर्वँल्लीलाः सहस्रशः॥ १३<br><br>पाण्डुरोद्भूतवसनः प्रवालरुचिराङ्गदः।<br>मणिश्यामोत्तमवपुर्हरिभारार्पितो वरः॥ १४<br><br>वरुणः पाशधृङ्मध्ये देवानीकस्य तस्थिवान्।<br>युद्धवेलामभिलषन् भिन्नवेल इवार्णवः॥ १५ | पाशधारी वरुण जलमय शरीर धारणकर देवसेनाके मध्यभागमें स्थित हुए। उनके साथ चारों सागर तथा जीभ लपलपाते हुए नाग भी थे, वे शङ्ख और मुक्ताजटित केयूर धारण किये हुए थे, हाथमें कालपाश लिये हुए थे, वायुके समान वेगशाली, चन्द्र-किरणोंके-से उज्ज्वल तथा जलाकार घोड़ोंसे युक्त रथपर सवार थे। वे हजारों प्रकारकी लीलाएँ कर रहे थे, पीले वस्त्र और प्रवालजटित अङ्गदसे विभूषित थे, उनकी शरीरकान्ति नीलमणिकी-सी सुन्दर थी, उन श्रेष्ठ देवपर इन्द्रने अपना भार सौंप रखा था। वे तटको छिन्न-भिन्न कर देनेवाले सागरकी तरह युद्ध-वेलाकी बाट जोह रहे थे। |
| यक्षराक्षससैन्येन गुह्यकानां गणैरपि।<br>युक्तश्च शङ्खपद्माभ्यां निधीनामधिपः प्रभुः॥ १६ | तत्पश्चात् निधियोंके अधिपति एवं विमानद्वारा युद्ध करनेवाले सामर्थ्यशाली राजराजेश्वर श्रीमान् कुबेर यक्षों, राक्षसों और गुह्यकोंकी सेना तथा शङ्ख और पद्मके साथ |