मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १७७ * | ७२७ |
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| सुतलेनोच्छ्रयवता विपुलाङ्गुलिपर्वणा।<br>लम्बाभरणपूर्णेन किंचिच्चलितवर्मणा॥ ५५<br><br>उच्छ्रितेनाग्रहस्तेन दक्षिणेन वपुष्मता।<br>दानवान् देवनिहतानुत्तिष्ठध्वमिति ब्रुवन्॥ ५६<br><br>तं कालनेमिं समरे द्विषतां कालचेष्टितम्।<br>वीक्षन्ते स्म सुराः सर्वे भयवित्रस्तलोचनाः॥ ५७<br><br>तं वीक्षन्ति स्म भूतानि क्रमन्तं कालनेमिनम्।<br>त्रिविक्रमं विक्रमन्तं नारायणमिवापरम्॥ ५८<br><br>सोऽत्युच्छ्रयपुरःपादमरुताघूर्णिताम्बरः ।<br>प्रक्रामन्नसुरो युद्धे त्रासयामास देवताः॥ ५९<br><br>स मयेनासुरेन्द्रेण परिष्वक्तस्ततो रणे।<br>कालनेमिर्बभौ दैत्यः सविष्णुरिव मन्दरः॥ ६०<br><br>अथ विव्यथिरे देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः।<br>कालनेमिं समायान्तं दृष्ट्वा कालमिवापरम्॥ ६१ | तरह दीख रहा था। जो सुतलसे निकला था, जिसकी अंगुलियोंके पर्व (पोरु) विशाल थे, जो आभरणोंसे युक्त था, जिसका कवच कुछ हिल रहा था और जिसके दाहिने हाथका अग्रभाग उठा हुआ था, ऐसे शरीरसे युक्त कालनेमिने देवताओंद्धारा मारे गये दानवोंसे कहा— 'अब तुमलोग उठकर खड़े हो जाओ'॥ ४७—५६॥<br><br>इस प्रकार समरभूमिमें शत्रुओंके प्रति कालकी-सी भीषण चेष्टा करनेवाले उस कालनेमिकी ओर सभी देवता एकटक निहारने लगे। उस समय उनके नेत्र भयसे कातर हो रहे थे। इस प्रकार चलते हुए उस कालनेमिको समस्त प्राणी ऐसे देख रहे थे मानो तीन पगसे त्रिलोकीको नापनेके लिये चलते हुए दूसरे नारायण हों। अत्यन्त विशाल शरीरवाले कालनेमिके चलते हुए पैरोंकी वायुसे आकाश चक्कर-सा काटने लगता था, इस प्रकार वह असुर युद्धभूमिमें विचरण करता हुआ देवताओंको भयभीत करने लगा। तदुपरान्त रणक्षेत्रमें असुरराज मयने कालनेमिका आलिङ्गन किया। उस समय वह दैत्य विष्णुसहित मन्दराचलके समान सुशोभित हो रहा था। तदनन्तर इन्द्र आदि सभी देवता दूसरे कालकी तरह कालनेमिको आया हुआ देखकर अत्यन्त व्यथित हो गये॥ ५७—६१॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तारकामययुद्धे षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकामययुद्धमें एक सौ छिहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७६॥
एक सौ सतहत्तरवाँ अध्याय
देवताओं और दैत्योंकी सेनाओंकी अद्भुत मुठभेड़, कालनेमिका भीषण पराक्रम और उसकी देवसेनापर विजय
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— रविनन्दन! महान् तेजस्वी |
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| दानवानामनीकेषु कालनेमिर्महासुरः।<br>व्यवधर्त महातेजास्तपान्ते जलदो यथा॥ १<br><br>तं त्रैलोक्यान्तरगतं दृष्ट्वा ते दानवेश्वराः।<br>उत्तस्थुरपरिश्रान्ताः पीत्वामृतमनुत्तमम्॥ २<br><br>ते वीतभयसंत्रासा मयतारपुरोगमाः।<br>तारकामयसंग्रामे सततं जितकाशिनः॥ ३ | महासुर कालनेमि दानवोंकी सेनामें उसी प्रकार वृद्धिंगत होने लगा, जैसे ग्रीष्म-ऋतुके अन्तमें बादल उमड़ पड़ते हैं। तब वे सभी दानव-यूथपति कालनेमिको त्रिलोकीमें व्याप्त देखकर श्रमरहित हो गये और सर्वोत्तम अमृतका पान कर उठ खड़े हुए। उनके भय और त्रास समाप्त हो चुके थे। वे तारकामय-संग्राममें मय और तारकको आगे रखकर सदा विजयी होते रहे हैं। |