भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 736, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 736
७२६* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यजमानेषु भूतेषु प्रशान्तेषु च पाप्मसु।<br>अभिन्नबन्धने मृत्यौ हूयमाने हुताशने॥ ४१<br>यज्ञशोभिषु देवेषु स्वर्गार्थं दर्शयत्सु च।<br>लोकपालेषु सर्वेषु दिक्षु संयानवर्तिषु॥ ४२<br>भावे तपसि सिद्धानामभावे पापकर्मणाम्।<br>देवपक्षे प्रमुदिते दैत्यपक्षे विषीदति॥ ४३<br>त्रिपादविग्रहे धर्मे अधर्मे पादविग्रहे।<br>अपावृत्ते महाद्वारे वर्तमाने च सत्यथे॥ ४४<br>लोके प्रवृत्ते धर्मेषु सुधर्मेष्वाश्रमेषु च।<br>प्रजारक्षणयुक्तेषु भ्राजमानेषु राजसु॥ ४५<br>प्रशान्तकल्मषे लोके शान्ते तमसि दानवे।<br>अग्निमारुतयोस्तत्र वृत्ते संग्रामकर्मणि॥ ४६<br>तन्मया विपुला लोकास्ताभ्यां कृतजयक्रिया।चरित्रबल और बन्धुत्वकी भावना जाग्रत् हो गयी, सभी प्राणी यज्ञकी भावनासे पूर्ण हो गये, पापोंका प्रशमन हो गया, मृत्युका बन्धन सुदृढ़ हो गया, अग्निमें आहुतियाँ पड़ने लगीं, यज्ञोंमें शोभा पानेवाले देवगण स्वर्गकी प्राप्तिके हेतु मार्गदर्शन करने लगे, लोकपालगण सभी दिशाओंके लिये प्रस्थित हो गये, सिद्धोंकी भावना तपस्यामें संलग्न हो गयी, पापकर्मोंका अभाव हो गया, देवपक्षमें आनन्द मनाया जाने लगा। दैत्यपक्षमें उदासी छा गयी, धर्म तीन चरणोंसे स्थित हुआ और अधर्मका एक चरण रह गया, महाद्वार (यममार्ग) बंद हो गया और सन्मार्गका प्रचार होने लगा। सभी लोग अपने-अपने वर्णधर्म एवं आश्रमधर्ममें प्रवृत्त हो गये, राजाओंका दल प्रजाकी रक्षामें तत्पर होकर सुशोभित होने लगा, दानवरूपी तमोगुणके शान्त हो जानेपर जगत्में पापका विनाश हो गया। इस प्रकार अग्नि और वायुद्वारा युद्धकर्म किये जानेपर सभी विशाल लोक उन्हींसे युक्त हो गये और उन्हींके द्वारा यह विजयकी क्रिया सम्पन्न हुई॥ ३२-४६ १/२॥
पूर्वं दैत्यभयं श्रुत्वा मारुताग्निकृतं महत्॥ ४७<br>कालनेमीति विख्यातो दानवः प्रत्यदृश्यत।<br>भास्कराकारमुकुटः शिञ्जिताभरणाङ्गदः॥ ४८<br>मन्दराद्रिप्रतीकाशो महारजतपर्वतः।<br>शतप्रहरणोदग्रः शतबाहुः शताननः॥ ४९<br>शतशीर्षः स्थितः श्रीमाञ्छतशृङ्ग इवाचलः।<br>पक्षे महति संवृद्धो निदाघ इव पावकः॥ ५०<br>धूम्रकेशो हरिच्छ्मश्रुः संदष्टौष्ठपुटाननः।<br>त्रैलोक्यान्तरविस्तारि धारयन् विपुलं वपुः॥ ५१<br>बाहुभिस्तुलयन् व्योम क्षिपन् पद्भ्यां महीधरान्।<br>ईरयन् मुखनिःश्वासैर्वृष्टियुक्तान् बलाहकान्॥ ५२<br>तिर्यगायतरक्ताक्षं मन्दरोद्रग्रवर्चसम्।<br>दिधक्षन्तमिवायातं सर्वान् देवगणान् मृधे॥ ५३<br>तर्जयन्तं सुरगणांश्छादयन्तं दिशो दश।<br>संवर्तकाले तृषितं दृष्टं मृत्युमिवोत्थितम्॥ ५४तदनन्तर दैत्योंके लिये वायु और अग्निद्वारा उत्पन्न किये गये महान् भयको सुनकर सर्वप्रथम कालनेमि नामसे विख्यात दानव (युद्धभूमिमें) दिखायी पड़ा। वह सुवर्णसे युक्त मन्दराचलके समान विशालकाय था, उसके मस्तकपर सूर्य-सरीखा मुकुट चमक रहा था, वह मधुर शब्द करते हुए बाजूबंदसे विभूषित था, उसके सौ बाहु, सौ मुख और सौ मस्तक थे, वह परम भयानक सौ अस्त्रोंको एक साथ धारण किये हुए था, इस प्रकार वह सौ शिखरोंवाले पर्वतकी भाँति शोभा पा रहा था, दैत्योंके विशाल पक्षमें आगे बढ़ा हुआ वह दानव ग्रीष्मकालीन अग्निकी तरह दीख रहा था, उसके बाल धूमिल थे, उसकी दाढ़ी हरे रंगकी थी, वह दाँतोंसे होंठोंको दबाये हुए मुखसे युक्त था, इस प्रकार वह समूची त्रिलोकीमें विस्तृत विशाल शरीर धारण किये हुए था। वह भुजाओंसे आकाशको नापता हुआ, पैरोंसे पर्वतोंको फेंकता हुआ और मुखके निःश्वाससे जलयुक्त बादलोंको तितर-बितर करता हुआ चल रहा था। उसकी बड़ी-बड़ी लाल आँखें तिरछी मढ़ी हुई थीं। वह मन्दराचलके समान परम तेजस्वी था। वह युद्धस्थलमें समस्त देवगणोंको जलाते हुएकी तरह आ रहा था। वह देवगणोंको भयभीत कर रहा था, दसों दिशाओंको आच्छादित किये हुए था और प्रलयकालमें प्रकट हुए प्यासे मृत्युकी
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