भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 738, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 738
७२८* मत्स्यपुराण *
रेजुरायोधनगता दानवा युद्धकाङ्क्षिणः।<br>मन्त्रमभ्यसतां तेषां व्यूहं च परिधावताम् ॥ ४<br>प्रेक्षतां चाभवत् प्रीतिर्दानवं कालनेमिनम्।<br>ये तु तत्र मयस्यासन् मुख्या युद्धपुरःसराः ॥ ५<br>ते तु सर्वे भयं त्यक्त्वा हृष्टा योद्धुमुपस्थिताः।<br>मयस्तारो वराहश्च हयग्रीवश्च वीर्यवान् ॥ ६<br>विप्रचित्तिसुतः श्वेतः खरलम्बावुभावपि।<br>अरिष्टो बलिपुत्रश्च किशोराख्यस्तथैव च ॥ ७<br>स्वर्भानुश्चामरप्रख्यो वक्त्रयोधी महासुरः।<br>एतेऽस्त्रवेदिनः सर्वे सर्वे तपसि सुस्थिताः ॥ ८<br>दानवाः कृतिनो जग्मुः कालनेमिं तमुद्धतम्।<br>ते गदाभिर्भुशुण्डीभिश्चक्रैरथ परश्वधैः ॥ ९<br>कालकल्पैश्च मुसलैः क्षेपणीयैश्च मुद्गरैः।<br>अश्मभिश्चाद्रिसदृशैर्गण्डशैलैश्च दारुणैः ॥ १०<br>पट्टिशैर्भिन्दिपालैश्च परिघैश्चोत्तमयसैः।<br>घातनीभिः सुगुर्वीभिः शतघ्नीभिस्तथैव च ॥ ११<br>युगैर्यन्त्रैश्च निर्मुक्तैर्मार्गणैरूग्रताडितैः।<br>दोर्भिश्चायतदीर्घैश्च प्रासैः पाशैश्च मूर्च्छनैः ॥ १२<br>भुजङ्गवक्त्रैर्लोलिहानैर्विसर्पद्भिश्च सायकैः।<br>वज्रैः प्रहरणीयैश्च दीप्यमानैश्च तोमरैः ॥ १३<br>विकोशैरसिभिस्तीक्ष्णैः शूलैश्च शितनिर्मलैः।<br>दैत्याः संदीप्तमनसः प्रगृहीतशरासनाः ॥ १४<br>ततः पुरस्कृत्य तदा कालनेमिं महाहवे।<br>सा दीप्तशस्त्रप्रवरा दैत्यानां रुरुचे चमूः ॥ १५<br>द्यौर्निमीलितसर्वाङ्गा घनानीलाम्बुदागमे।युद्धाभिलाषी वे दानव युद्धभूमिमें उपस्थित होकर शोभा पा रहे थे। उनमें कुछ परस्पर मन्त्रणा कर रहे थे, कुछ व्यूहकी रचना कर रहे थे और कुछ रक्षकके रूपमें थे। उन सबका कालनेमि दानवके प्रति प्रगाढ़ प्रेम हो गया। तत्पश्चात् वहाँ मयदानवके जितने मुख्य-मुख्य युद्धके अगुआ थे, वे सभी भय छोड़कर हर्षपूर्वक युद्ध करनेके लिये उपस्थित हुए। फिर मय, तारक, वराह, पराक्रमी हयग्रीव, विप्रचित्तिका पुत्र श्वेत, खर, लम्ब, बलिकाय पुत्र अरिष्ट, किशोर और देवरूपसे प्रसिद्ध मुखसे युद्ध करनेवाला महान् असुर स्वर्भानु—ये सभी अस्त्रवेत्ता थे और सभी तपोबलसे सम्पन्न थे। वे सभी सफल प्रयत्नवाले दानव उस उद्दण्ड कालनेमिके निकट गये। गदा, भुशुण्डि, चक्र, कुठार, काल-सदृश मुसल, क्षेपणीय (ढेलवाँस), मुद्गर, पर्वत-सदृश पत्थर, भीषण गण्डशैल, पट्टिश, भिन्दिपाल, उत्तम लोहेके बने हुए परिघ, संहारकारिणी बड़ी-बड़ी तोप, यन्त्र, हाथोंसे छूटनेपर भयानक चोट करनेवाले बाण, लम्बे चमकीले भाले, पाश, मूर्छन (बेहोश करनेका यन्त्र), रेंगते हुए जीभ लपलपानेवाले सर्पमुख बाण, फेंकने योग्य वज्र, चमचमाते हुए तोमर, म्यानसे बाहर निकली हुई तीखी तलवार और तीखे निर्मल शूलोंसे युक्त तथा धनुष धारण करनेवाले उन दैत्योंके मन उत्साहसे सम्पन्न थे, वे उस महासमरमें कालनेमिको आगे करके खड़े हो गये। उस समय देदीप्यमान शस्त्रोंसे युक्त दैत्योंकी वह सेना इस प्रकार शोभा पा रही थी मानो सघन नील बादलोंके छा जानेपर सर्वथा आच्छादित हुआ आकाशमण्डल हो॥ १-१५ १/२॥
देवतानामपि चमूर्मुमुदे शक्रपालिता ॥ १६<br>उपेतसितकृष्णाभ्यां ताराभ्यां चन्द्रसूर्ययोः।<br>वायुवेगवती सौम्या तारागणपताकिनी ॥ १७<br>तोयदाविद्धवसना ग्रहनक्षत्रहासिनी।<br>यमेन्द्रवरुणैर्गुप्ता धनदेन च धीमता ॥ १८<br>सम्प्रदीप्ताग्निनयना नारायणपरायणा।<br>सा समुद्रौघसदृशी दिव्या देवमहाचमूः ॥ १९दूसरी ओर इन्द्रद्वारा सुरक्षित देवताओंकी सेना भी अट्टहास कर रही थी। वह चन्द्रमा और सूर्यकी श्वेत और कृष्ण ताराओंसे युक्त, वायुकी-सी वेगशालिनी, सौम्य और तारागणको पताकारूपमें धारण करनेवाली थी। उसके वस्त्र बादलोंसे संयुक्त थे। वह ग्रहों और नक्षत्रोंका उपहास-सी कर रही थी। बुद्धिमान् कुबेर, यम, इन्द्र और वरुण उसकी रक्षा कर रहे थे। वह प्रज्वलित अग्निरूप नेत्रोंवाली और नारायणके आश्रित थी। इस प्रकार यक्षों एवं गन्धर्वोंसे युक्त सागरसमूहकी तरह भयंकर देवताओंकी वह विशाल दिव्य सेना अस्त्र
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