भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 743
* अध्याय १७८ *७३३
अयं स किल युद्धेषु सुरार्थे त्यक्तजीवितः।<br>सवितुस्तेजसा तुल्यं चक्रं क्षिपति शत्रु host... शत्रुषु॥ १३<br>अयं स कालो दैत्यानां कालभूतः समास्थितः।<br>अतिक्रान्तस्य कालस्य फलं प्राप्स्यति केशवः॥ १४<br>दिष्ट्येदानीं समक्षं मे विष्णुरेष समागतः।<br>अद्य मद्बाहुनिष्पिष्टो मामेव प्रणयिष्यति॥ १५<br>यास्याम्यपचितिं दिष्ट्या पूर्वेषामद्य संयुगे।<br>इमं नारायणं हत्वा दानवानां भयावहम्॥ १६<br>क्षिप्रमेव हनिष्यामि रणेऽमरगणांस्ततः।<br>जात्यन्तरगतो ह्येष बाधते दानवान् मृधे॥ १७<br>एषोऽनन्तः पुरा भूत्वा पद्मनाभ इति श्रुतः।<br>जघानैकार्णवे घोरे तावुभौ मधुकैटभौ॥ १८<br>द्विधाभूतं वपुः कृत्वा सिंहस्यार्धं नरस्य च।<br>पितरं मे जघानैको हिरण्यकशिपुं पुरा॥ १९<br>शुभं गर्भमधत्तैनमदितिर्देवतारणिः।<br>त्रींल्लोकानुज्जहारैकः क्रममाणस्त्रिभिः क्रमैः॥ २०<br>भूयस्त्विदानीं संग्रामे सम्प्राप्ते तारकामये।<br>मया सह समागम्य सदेवो विनशिष्यति॥ २१<br>एवमुक्त्वा बहुविधं क्षिपन्नारायणं रणे।<br>वाग्भिरप्रतिरूपाभिर्युद्धमेवाभ्यरोचयत् ॥ २२यह युद्धोंमें देवताओंके हितके लिये प्राणोंकी बाजी लगा देता है और शत्रुओंपर सूर्यके समान तेजस्वी चक्रका प्रयोग करता है। यह दैत्योंके कालरूपसे यहाँ स्थित है, किंतु अब यह केशव अपने बीते हुए कालका फल भोगेगा। सौभाग्यवश यह विष्णु इस समय मेरे ही समक्ष आ गया है। यह आज मेरी भुजाओंसे पिसकर मुझसे ही प्रेम करेगा। सौभाग्यकी बात है कि आज मैं रणभूमिमें दानवोंको भयभीत करनेवाले इस नारायणका वध कर पूर्वजोंके प्रायश्चित्तको पूर्ण कर दूँगा। तत्पश्चात् रणमें शीघ्र ही देवताओंका संहार कर डालूँगा। यह अन्य जातियोंमें भी उत्पन्न होकर समरमें दानवोंको कष्ट पहुँचाता है। यही पूर्वकालमें अनन्त होकर पुनः पद्मनाभ नामसे विख्यात हुआ। इसने ही भयंकर एकार्णवके जलमें मधु-कैटभ नामक दोनों दैत्योंका वध किया था। इसने अपने शरीरको आधा सिंह और आधा मनुष्य—इस प्रकार दो भागोंमें विभक्त करके पूर्वकालमें मेरे पिता हिरण्यकशिपुको मौतके घाट उतारा था। देवताओंकी जननी अदितिने इसीको अपने मङ्गलमय गर्भमें धारण किया था। अकेले इसीने तीन पगोंसे नापते हुए त्रिलोकीका उद्धार किया था। इस समय यह पुनः तारकामय संग्रामके प्राप्त होनेपर उपस्थित हुआ है। यह मेरे साथ उलझकर सभी देवताओंसहित नष्ट हो जायगा।' ऐसा कहकर उसने रणके मैदानमें प्रतिकूल वचनोंद्वारा अनेकों प्रकारसे नायणपर आक्षेप करते हुए युद्धके लिये ही अभिलाषा व्यक्त की॥ ११—२२॥
क्षिप्यमाणोऽसुरेन्द्रेण न चुकोप गदाधरः।<br>क्षमाबलेन महता सस्मितं चेदमब्रवीत्॥ २३भगवान् गदाधरमें क्षमाका महान् बल है, जिसके कारण असुरेन्द्रद्वारा इस प्रकार आक्षेप किये जानेपर भी वे कुपित नहीं हुए, अपितु मुसकराते हुए इस प्रकार बोले—'दैत्य!
अल्पं दर्पबलं दैत्य स्थिरमक्रोधजं बलम्।<br>हतस्त्वं दर्पजैर्दोषैर्हित्वा यद् भाषसे क्षमाम्॥ २४<br>अधीरस्त्वं मम मतो धिगेतत् तव वाग्बलम्।<br>न यत्र पुरुषाः सन्ति तत्र गर्जन्ति योषितः॥ २५<br>अहं त्वां दैत्य पश्यामि पूर्वेषां मार्गगामिनम्।<br>प्रजापतिकृतं सेतुं भित्त्वा कः स्वस्तिमान् व्रजेत्॥ २६दर्पका बल अल्पकालस्थायी होता है, किंतु क्षमाजनित बल स्थिर होता है। तुम क्षमाका परित्याग करके जो इस प्रकारकी ऊटपटाँग बातें बक रहे हो, इससे प्रतीत होता है कि तुम अपने दर्पजन्य दोषोंसे नष्ट हो चुके हो। मेरी समझसे तो तुम बड़े अधीर दीख रहे हो। तुम्हारे इस वाग्बलको धिक्कार है; क्योंकि ऐसी गर्जना तो जहाँ पुरुष नहीं होते, वहाँ स्त्रियाँ भी करती हैं। दैत्य! मैं तुम्हें भी पूर्वजोंके मार्गका अनुगामी ही देख रहा हूँ। भला, ब्रह्माद्वारा स्थापित की गयी मर्यादाओंको तोड़कर