भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 742

७३२ * मत्स्यपुराण *


एक सौ अठहत्तरवाँ अध्याय

कालनेमि और भगवान् विष्णुका रोषपूर्वक वार्तालाप और भीषण युद्ध, विष्णुके चक्रके द्वारा कालनेमिका वध और देवताओंको पुनः निज पदकी प्राप्ति


मत्स्य उवाच
पञ्च तं नाभ्यवर्तन्त विपरीतेन कर्मणा।<br>वेदो धर्मः क्षमा सत्यं श्रीश्च नारायणाश्रया॥ १<br><br>स तेषामनुपस्थानात् सक्रोधो दानवेश्वरः।<br>वैष्णवं पदमन्विच्छन् ययौ नारायणान्तिकम्॥ २<br><br>स ददर्श सुपर्णस्थं शङ्खचक्रगदाधरम्।<br>दानवानां विनाशाय भ्रामयन्तं गदां शुभाम्॥ ३<br><br>सजलाम्भोधसदृशं विद्युत्सदृशवाससम्।<br>स्वारूढं स्वर्णपक्षाढ्यं शिखिनं काश्यपं खगम्॥ ४<br><br>दृष्ट्वा दैत्यविनाशाय रणे स्वस्थमवस्थितम्।<br>दानवो विष्णुमक्षोभ्यं बभाषे क्षुब्धमानसः॥ ५<br><br>अयं स रिपुरस्माकं पूर्वेषां प्राणनाशनः।<br>अर्णवावासिनश्चैव मधोर्वै कैटभस्य च॥ ६<br><br>अयं स विग्रहोऽस्माकमशाम्यः किल कथ्यते।<br>अनेन संयुगेष्वद्य दानवा बहवो हताः॥ ७<br><br>अयं स निर्घृणो लोके स्त्रीबालनिरपत्रपः।<br>येन दानवनारीणां सीमन्तोद्धरणं कृतम्॥ ८<br><br>अयं स विष्णुर्देवानां वैकुण्ठश्च दिवौकसाम्।<br>अनन्तो भोगिनामप्सु स्वपन्नाद्यः स्वयम्भुवः॥ ९<br><br>अयं स नाथो देवानांमस्माकं व्यथितात्मनाम्।<br>अस्य क्रोधं समासाद्य हिरण्यकशिपुर्हतः॥ १०मत्स्यभगवान् बोले— रविनन्दन! कालनेमिद्वारा विपरीत कर्म किये जानेके कारण वेद, धर्म, क्षमा, सत्य और नारायणके आश्रयमें रहनेवाली लक्ष्मी— ये पाँचों उसके अधीन नहीं हुए। उनके उपस्थित न होनेसे क्रोधसे भरा हुआ दानवेश्वर कालनेमि वैष्णवपदकी प्राप्तिकी अभिलाषासे नारायणके निकट गया। वहाँ जाकर उसने शङ्ख-चक्र-गदाधारी भगवान्‌को गरुड़की पीठपर बैठे तथा दैत्योंका विनाश करनेके लिये कल्याणमयी गदा घुमाते देखा। उनके शरीरकी कान्ति सजल मेघके समान थी। उनका पीताम्बर बिजलीके समान चमक रहा था। वे स्वर्णमय पंखसे युक्त शिखाधारी कश्यपनन्दन गरुडपर समासीन थे। इस प्रकार रणभूमिमें दैत्योंका विनाश करनेके लिये स्वस्थचित्तसे स्थित अक्षोभ्य भगवान् विष्णुको देखकर दानवराज कालनेमिका मन क्षुब्ध हो उठा, तब वह कहने लगा— 'यही हमलोगोंके पूर्वजोंका प्राणनाशक शत्रु है तथा यही महासागरमें निवास करनेवाले मधु और कैटभका भी प्राणहर्ता है। हमलोगोंका यह विग्रह शान्त होनेका नहीं, ऐसा निश्चितरूपसे कहा जाता है। बहुतेरे युद्धोंमें इसके द्वारा बहुत-से दानव मारे जा चुके हैं। यह बड़ा निष्ठुर है। इसे जगत्‌में स्त्री-बच्चोंपर भी हाथ उठाते समय लज्जा नहीं आती। इसने बहुत-सी दानव-पत्नियोंके सोहागका उन्मूलन कर दिया है। यही देवताओंमें विष्णु, स्वर्गवासियोंमें वैकुण्ठ, नागोंमें अनन्त और जलमें शयन करनेवाला आदि स्वयम्भू है। यही देवताओंका स्वामी और व्यथित हृदयवाले हमलोगोंका शत्रु है। इसीके क्रोधमें पड़कर हिरण्यकशिपु मारे गये हैं॥ १-१०॥
अस्य छायामुपाश्रित्य देवा मखमुखे श्रिताः।<br>आज्यं महर्षिभिर्दत्तमश्नुवन्ति त्रिधा हुतम्॥ ११'इसी प्रकार इसीका आश्रय ग्रहण कर यज्ञके प्रारम्भमें स्थित देवगण महर्षियोंद्वारा तीन प्रकारकी आहुति-रूपमें दिये गये आज्यका उपभोग करते हैं।
अयं स निधने हेतुः सर्वेषाममरद्विषाम्।<br>यस्य चक्रे प्रविष्टानि कुलान्यस्माकमाहवे॥ १२यही सभी देवद्रोही असुरोंकी मृत्युका कारण है। युद्धभूमिमें हमारे सभी कुल इसीके चक्रमें प्रविष्ट हो गये हैं।