भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 741
* अध्याय १७७ *७३१

| न शेकुर्यत्नवन्तोऽपि यत्नं कर्तुं विचेतसः।<br>तेन शक्रः सहस्राक्षः स्पन्दितः शरबन्धनैः॥ ४७<br>ऐरावतगतः संख्ये चलितुं न शशाक ह।<br>निर्जलाम्भोदसदृशो निर्जलार्णवसप्रभः॥ ४८<br>निर्व्यापारः कृतस्तेन विपाशो वरुणो मृधे।<br>रणे वैश्रवणस्तेन परिघैः कामरूपिणा॥ ४९<br>वित्तदोऽपि कृतः संख्ये निर्जितः कालनेमिना।<br>यमः सर्वहरस्तेन मृत्युप्रहरणे रणे॥ ५०<br>याम्यामवस्थां संत्यज्य भीतः स्वां दिशमाविशत्।<br>स लोकपालानुत्सार्य कृत्वा तेषां च कर्म तत्॥ ५१<br>दिक्षु सर्वासु देहं स्वं चतुर्धा विदधे तदा।<br>स नक्षत्रपथं गत्वा दिव्यं स्वर्भानुदर्शनम्॥ ५२<br>जहार लक्ष्मीं सोमस्य तं चास्य विषयं महत्। | प्रयत्न करनेके लिये उद्यत होनेपर भी कोई उपाय न कर सके; क्योंकि उनका मन भ्रमित हो उठा था। उसने सहस्र नेत्रधारी इन्द्रको भी बाणोंके बन्धनसे इस प्रकार जकड़ दिया था कि वे युद्धस्थलमें ऐरावतपर बैठे हुए भी चलनेमें समर्थ न हो सके। उसने समर-भूमिमें वरुणको जलहीन बादल और निर्जल महासागरकी भाँति कान्तिहीन, व्यापाररहित और पाशसे शून्य कर दिया। स्वेच्छानुसार रूप धारण करनेवाले उस दानवने रणभूमिमें परिघोंकी मारसे वैश्रवण कुबेरको भी जीत लिया। मृत्यु-सदृश प्रहार होनेवाले उस युद्धमें कालनेमिने सबके प्राणहर्ता यमको पराजित कर दिया। वे डरकर युद्धका परित्याग कर अपनी दक्षिण दिशाकी ओर चले गये। इस प्रकार उसने चारों लोकपालोंको पराजित कर दिया और अपने शरीरको चार भागोंमें विभक्त कर वह सभी दिशाओंमें उनका कार्य स्वयं सँभालने लगा। फिर जहाँ ग्रहणके समय राहुका दर्शन होता है, उस दिव्य नक्षत्रमार्गमें जाकर चन्द्रमाकी लक्ष्मी तथा उनके विशाल साम्राज्यका अपहरण कर लिया॥ ४४—५२ १/२ ॥ | | चालयामास दीप्तांशुं स्वर्गद्वारात् सभास्करम्॥ ५३<br>सायनं चास्य विषयं जहार दिनकर्म च।<br>सोऽग्निं देवमुखं दृष्ट्वा चकारात्ममुखाश्रयम्॥ ५४<br>वायुं च तरसा जित्वा चकारात्मवशानुगम्।<br>स समुद्रान् समानीय सर्वांश्च सरितो बलात्॥ ५५<br>चकारात्ममुखे वीर्याद् देहभूताश्च सिन्धवः।<br>अपः स्ववशगाः कृत्वा दिविजा याश्च भूमिजाः॥ ५६<br>स स्वयम्भूरिवाभाति महाभूतपतिर्यथा।<br>सर्वलोकमयो दैत्यः सर्वभूतभयावहः॥ ५७<br>स लोकपालैकवपुश्चन्द्रादित्यग्रहात्मवान्।<br>स्थापयामास जगतीं सुगुप्तां धरणीधरैः॥ ५८<br>पावकानिलसम्पातो रराज युधि दानवः।<br>पारमेष्ठ्ये स्थितः स्थाने लोकानां प्रभवोपमे।<br>तं तुष्टुवुर्दैत्यगणा देवा इव पितामहम्॥ ५९ | उसने प्रदीप्त किरणोंवाले सूर्यको स्वर्गद्वारसे खदेड़ दिया और उनके सायन नामक साम्राज्य और दिनकी सृष्टि करनेकी शक्तिको छीन लिया। उसने देवताओंके मुखस्वरूप अग्निको सम्मुख देखकर उन्हें अपने मुखमें निगल लिया तथा वायुको वेगपूर्वक जीतकर उन्हें अपना वशवर्ती बना लिया। उसने अपने पराक्रमसे बलपूर्वक समुद्रोंको वशमें करके सभी नदियोंको अपने मुखमें डाल लिया और सागरोंको शरीरका अङ्ग बना लिया। इस प्रकार स्वर्ग अथवा भूतलपर जितने जल थे, उन सबको उसने अपने अधीन कर लिया। उस समय समस्त प्राणियोंको भयभीत करनेवाला वह दैत्य सम्पूर्ण लोकोंसे युक्त होकर महाभूतपति ब्रह्माकी तरह सुशोभित हो रहा था। सम्पूर्ण लोकपालोंके एकमात्र मूर्तस्वरूप तथा चन्द्र, सूर्य आदि ग्रहोंसे युक्त उस दानवने पर्वतोंद्वारा सुरक्षित पृथ्वीको स्थापित किया। इस प्रकार अग्नि और वायुके समान वेगशाली दानवराज कालनेमि युद्धस्थलमें लोकोंकी उत्पत्तिके स्थानभूत ब्रह्माके पदपर स्थित होकर शोभा पा रहा था। उस समय दैत्यगण उसकी उसी प्रकार स्तुति कर रहे थे, जैसे देवगण ब्रह्माकी किया करते हैं॥ ५३—५९॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तारकामययुद्धं नाम सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें तारकामय-युद्ध नामक एक सौ सतहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७७॥