भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७३०* मत्स्यपुराण *

| अस्त्रैरन्ये विनिर्भिन्ना वेमू रक्तं हता युधि॥ ३४<br><br>क्षरजलानां सदृशा जलदानां समागमे।<br>तैरस्त्रशस्त्रग्रथितं क्षिप्तोत्क्षिप्तगदाविलम्॥ ३५<br><br>देवदानवसंक्षुब्धं संकुलं युद्धमाबभौ।<br>तद्दानवमहामेघं देवायुधविराजितम्॥ ३६<br><br>अन्योन्यबाणवर्षेण युद्धदुर्दिनमाबभौ।<br>एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धः कालनेमी स दानवः॥ ३७<br><br>व्यवधर्त समुद्रौघैः पूर्यमाण इवाम्बुदः।<br>तस्य विद्युच्चलापीडैः प्रदीप्ताशनिवर्षिणः॥ ३८<br><br>गात्रैर्नागगिरिप्रख्या विनिपेतुर्बलाहकाः।<br>क्रोधान्निःश्वसतस्तस्य भ्रूभेदस्वेदवर्षिणः॥ ३९<br><br>साग्निस्र्फुलिङ्गप्रतता मुखान्निष्पेतुरर्चिषः।<br>तिर्यगूर्ध्वं च गगने ववृधुस्तस्य बाहवः॥ ४०<br><br>पर्वतादिव निष्क्रान्ताः पञ्चास्या इव पन्नगाः।<br>सोऽस्त्रजालैर्बहुविधैर्धनुर्भिः परिघैरपि॥ ४१<br><br>दिव्यमाकाशमावव्रे पर्वतैरुच्छ्रितैरिव।<br>सोऽनिलोद्धूतवसनस्तस्थौ संग्रामलालसः॥ ४२<br><br>संध्यातपग्रस्तशिलः साक्षान्मेरुरिवाचलः।<br>ऊरुवेगप्रमथितैः शैलशृङ्गाग्रपादपैः॥ ४३<br><br>अपातयद् देवगणान् वज्रेणेव महागिरीन्। | इसी प्रकार अन्य वीर युद्धस्थलमें अस्त्रोंद्वारा घायल होकर रक्त वमन करते हुए जलकी वृष्टि करनेवाले बादलोंकी तरह प्रतीत हो रहे थे। उस समय वह युद्ध अस्त्रों एवं शस्त्रोंसे परिपूर्ण, फेंकी गयी एवं फेंकनेके लिये उठायी हुई गदाओंसे युक्त और देवताओं एवं दानवोंसे व्याप्त और संक्षुब्ध होकर शोभा पा रहा था। दानवरूपी महामेघसे युक्त और देवताओंके हथियारोंसे विभूषित वह युद्ध परस्परकी बाणवर्षामे मेघाच्छन्न दुर्दिन-सा लग रहा था। इसी बीच क्रोधसे भरा हुआ कालनेमि नामक दानव रणभूमिमें आगे बढ़ा। वह समुद्रकी लहरोंसे पूर्ण होते हुए बादलकी तरह शोभा पा रहा था। प्रज्वलित वज्रोंकी वर्षा करनेवाले उस दानवके बिजलीके समान चञ्चल मस्तकोंसे युक्त शरीरावयवोंसे टकराकर हाथी और पर्वत-सदृश विशाल बादल तितर-बितर होकर बिखर रहे थे। क्रोधवश निःश्वास लेते हुए उसकी टेढ़ी भौंहोंसे पसीनेकी बूँदें टपक रही थीं और मुखसे अग्निकी चिनगारियोंसे व्याप्त लपटें निकल रही थीं। उसकी भुजाएँ आकाशमें तिरछी होकर ऊपरकी ओर बढ़ रही थीं, जो पर्वतसे निकले हुए पाँच मुखवाले नागकी तरह लग रही थीं। उसने ऊँचे-ऊँचे पर्वतों-सरीखे अनेक प्रकारके अस्त्रसमूहों, धनुषों और परिघोंसे दिव्य आकाशको आच्छादित कर दिया। वायुद्वारा उड़ाये जाते हुए वस्त्रोंवाला वह दानव संग्रामकी लालसासे डटकर खड़ा हुआ। उस समय वह संध्याकालीन धूपसे ग्रस्त हुई शिलासे युक्त साक्षात् मेरुपर्वतकी तरह दीख रहा था। उसने अपनी जंघाओंके वेगसे उखाड़े गये पर्वतशिखरके अग्रवर्ती वृक्षोंके प्रहारसे देवगणोंको उसी प्रकार धराशायी कर दिया, जैसे वज्रके आघातसे विशाल पर्वत ढाह दिये गये थे॥ ३४-४३ १/२ ॥ | | बहुभिः शस्त्रनिस्त्रिंशैश्छिन्नभिन्नशिरोरुहाः॥ ४४<br><br>न शेकुश्चलितुं देवाः कालनेमिहता युधि।<br>मुष्टिभिर्निहताः केचित् केचित् तु विदलीकृताः॥ ४५<br><br>यक्षगन्धर्वपतयः पेतुः सह महोरगैः।<br>तेन वित्रासिता देवाः समरे कालनेमिना॥ ४६ | इस प्रकार रणभूमिमें कालनेमिद्वारा आहत हुए देवगण चलने-फिरनेमें भी असमर्थ हो गये। बहुत-से शस्त्रों तथा खड्गोंकी चोटसे कुछ लोगोंके सिरके बालतक छिन्न-भिन्न हो गये थे। कुछ मुक्कोंकी मारसे मार डाले गये और कुछके टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये। यक्षों और गन्धर्वोंके नायक बड़े-बड़े नागोंके साथ पृथ्‍वीकी गोदमें पड़ गये। समरभूमिमें उस कालनेमिद्वारा भयभीत किये गये देवगण |