भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१७९- शिवजीके साथ अन्धकासुरका युद्ध, शिवजीद्वारा मातृकाओंकी सृष्टि, शिवजीके हाथों अन्धककी मृत्यु और उसे गणेशत्वकी प्राप्ति, मातृकाओंकी विध्वंसलीला तथा विष्णुनिर्मित देवियोंद्वारा उनका अवरोध

७३०* मत्स्यपुराण *

| अस्त्रैरन्ये विनिर्भिन्ना वेमू रक्तं हता युधि॥ ३४<br><br>क्षरजलानां सदृशा जलदानां समागमे।<br>तैरस्त्रशस्त्रग्रथितं क्षिप्तोत्क्षिप्तगदाविलम्॥ ३५<br><br>देवदानवसंक्षुब्धं संकुलं युद्धमाबभौ।<br>तद्दानवमहामेघं देवायुधविराजितम्॥ ३६<br><br>अन्योन्यबाणवर्षेण युद्धदुर्दिनमाबभौ।<br>एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धः कालनेमी स दानवः॥ ३७<br><br>व्यवधर्त समुद्रौघैः पूर्यमाण इवाम्बुदः।<br>तस्य विद्युच्चलापीडैः प्रदीप्ताशनिवर्षिणः॥ ३८<br><br>गात्रैर्नागगिरिप्रख्या विनिपेतुर्बलाहकाः।<br>क्रोधान्निःश्वसतस्तस्य भ्रूभेदस्वेदवर्षिणः॥ ३९<br><br>साग्निस्र्फुलिङ्गप्रतता मुखान्निष्पेतुरर्चिषः।<br>तिर्यगूर्ध्वं च गगने ववृधुस्तस्य बाहवः॥ ४०<br><br>पर्वतादिव निष्क्रान्ताः पञ्चास्या इव पन्नगाः।<br>सोऽस्त्रजालैर्बहुविधैर्धनुर्भिः परिघैरपि॥ ४१<br><br>दिव्यमाकाशमावव्रे पर्वतैरुच्छ्रितैरिव।<br>सोऽनिलोद्धूतवसनस्तस्थौ संग्रामलालसः॥ ४२<br><br>संध्यातपग्रस्तशिलः साक्षान्मेरुरिवाचलः।<br>ऊरुवेगप्रमथितैः शैलशृङ्गाग्रपादपैः॥ ४३<br><br>अपातयद् देवगणान् वज्रेणेव महागिरीन्। | इसी प्रकार अन्य वीर युद्धस्थलमें अस्त्रोंद्वारा घायल होकर रक्त वमन करते हुए जलकी वृष्टि करनेवाले बादलोंकी तरह प्रतीत हो रहे थे। उस समय वह युद्ध अस्त्रों एवं शस्त्रोंसे परिपूर्ण, फेंकी गयी एवं फेंकनेके लिये उठायी हुई गदाओंसे युक्त और देवताओं एवं दानवोंसे व्याप्त और संक्षुब्ध होकर शोभा पा रहा था। दानवरूपी महामेघसे युक्त और देवताओंके हथियारोंसे विभूषित वह युद्ध परस्परकी बाणवर्षामे मेघाच्छन्न दुर्दिन-सा लग रहा था। इसी बीच क्रोधसे भरा हुआ कालनेमि नामक दानव रणभूमिमें आगे बढ़ा। वह समुद्रकी लहरोंसे पूर्ण होते हुए बादलकी तरह शोभा पा रहा था। प्रज्वलित वज्रोंकी वर्षा करनेवाले उस दानवके बिजलीके समान चञ्चल मस्तकोंसे युक्त शरीरावयवोंसे टकराकर हाथी और पर्वत-सदृश विशाल बादल तितर-बितर होकर बिखर रहे थे। क्रोधवश निःश्वास लेते हुए उसकी टेढ़ी भौंहोंसे पसीनेकी बूँदें टपक रही थीं और मुखसे अग्निकी चिनगारियोंसे व्याप्त लपटें निकल रही थीं। उसकी भुजाएँ आकाशमें तिरछी होकर ऊपरकी ओर बढ़ रही थीं, जो पर्वतसे निकले हुए पाँच मुखवाले नागकी तरह लग रही थीं। उसने ऊँचे-ऊँचे पर्वतों-सरीखे अनेक प्रकारके अस्त्रसमूहों, धनुषों और परिघोंसे दिव्य आकाशको आच्छादित कर दिया। वायुद्वारा उड़ाये जाते हुए वस्त्रोंवाला वह दानव संग्रामकी लालसासे डटकर खड़ा हुआ। उस समय वह संध्याकालीन धूपसे ग्रस्त हुई शिलासे युक्त साक्षात् मेरुपर्वतकी तरह दीख रहा था। उसने अपनी जंघाओंके वेगसे उखाड़े गये पर्वतशिखरके अग्रवर्ती वृक्षोंके प्रहारसे देवगणोंको उसी प्रकार धराशायी कर दिया, जैसे वज्रके आघातसे विशाल पर्वत ढाह दिये गये थे॥ ३४-४३ १/२ ॥ | | बहुभिः शस्त्रनिस्त्रिंशैश्छिन्नभिन्नशिरोरुहाः॥ ४४<br><br>न शेकुश्चलितुं देवाः कालनेमिहता युधि।<br>मुष्टिभिर्निहताः केचित् केचित् तु विदलीकृताः॥ ४५<br><br>यक्षगन्धर्वपतयः पेतुः सह महोरगैः।<br>तेन वित्रासिता देवाः समरे कालनेमिना॥ ४६ | इस प्रकार रणभूमिमें कालनेमिद्वारा आहत हुए देवगण चलने-फिरनेमें भी असमर्थ हो गये। बहुत-से शस्त्रों तथा खड्गोंकी चोटसे कुछ लोगोंके सिरके बालतक छिन्न-भिन्न हो गये थे। कुछ मुक्कोंकी मारसे मार डाले गये और कुछके टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये। यक्षों और गन्धर्वोंके नायक बड़े-बड़े नागोंके साथ पृथ्‍वीकी गोदमें पड़ गये। समरभूमिमें उस कालनेमिद्वारा भयभीत किये गये देवगण |

* अध्याय १७७ *७३१

| न शेकुर्यत्नवन्तोऽपि यत्नं कर्तुं विचेतसः।<br>तेन शक्रः सहस्राक्षः स्पन्दितः शरबन्धनैः॥ ४७<br>ऐरावतगतः संख्ये चलितुं न शशाक ह।<br>निर्जलाम्भोदसदृशो निर्जलार्णवसप्रभः॥ ४८<br>निर्व्यापारः कृतस्तेन विपाशो वरुणो मृधे।<br>रणे वैश्रवणस्तेन परिघैः कामरूपिणा॥ ४९<br>वित्तदोऽपि कृतः संख्ये निर्जितः कालनेमिना।<br>यमः सर्वहरस्तेन मृत्युप्रहरणे रणे॥ ५०<br>याम्यामवस्थां संत्यज्य भीतः स्वां दिशमाविशत्।<br>स लोकपालानुत्सार्य कृत्वा तेषां च कर्म तत्॥ ५१<br>दिक्षु सर्वासु देहं स्वं चतुर्धा विदधे तदा।<br>स नक्षत्रपथं गत्वा दिव्यं स्वर्भानुदर्शनम्॥ ५२<br>जहार लक्ष्मीं सोमस्य तं चास्य विषयं महत्। | प्रयत्न करनेके लिये उद्यत होनेपर भी कोई उपाय न कर सके; क्योंकि उनका मन भ्रमित हो उठा था। उसने सहस्र नेत्रधारी इन्द्रको भी बाणोंके बन्धनसे इस प्रकार जकड़ दिया था कि वे युद्धस्थलमें ऐरावतपर बैठे हुए भी चलनेमें समर्थ न हो सके। उसने समर-भूमिमें वरुणको जलहीन बादल और निर्जल महासागरकी भाँति कान्तिहीन, व्यापाररहित और पाशसे शून्य कर दिया। स्वेच्छानुसार रूप धारण करनेवाले उस दानवने रणभूमिमें परिघोंकी मारसे वैश्रवण कुबेरको भी जीत लिया। मृत्यु-सदृश प्रहार होनेवाले उस युद्धमें कालनेमिने सबके प्राणहर्ता यमको पराजित कर दिया। वे डरकर युद्धका परित्याग कर अपनी दक्षिण दिशाकी ओर चले गये। इस प्रकार उसने चारों लोकपालोंको पराजित कर दिया और अपने शरीरको चार भागोंमें विभक्त कर वह सभी दिशाओंमें उनका कार्य स्वयं सँभालने लगा। फिर जहाँ ग्रहणके समय राहुका दर्शन होता है, उस दिव्य नक्षत्रमार्गमें जाकर चन्द्रमाकी लक्ष्मी तथा उनके विशाल साम्राज्यका अपहरण कर लिया॥ ४४—५२ १/२ ॥ | | चालयामास दीप्तांशुं स्वर्गद्वारात् सभास्करम्॥ ५३<br>सायनं चास्य विषयं जहार दिनकर्म च।<br>सोऽग्निं देवमुखं दृष्ट्वा चकारात्ममुखाश्रयम्॥ ५४<br>वायुं च तरसा जित्वा चकारात्मवशानुगम्।<br>स समुद्रान् समानीय सर्वांश्च सरितो बलात्॥ ५५<br>चकारात्ममुखे वीर्याद् देहभूताश्च सिन्धवः।<br>अपः स्ववशगाः कृत्वा दिविजा याश्च भूमिजाः॥ ५६<br>स स्वयम्भूरिवाभाति महाभूतपतिर्यथा।<br>सर्वलोकमयो दैत्यः सर्वभूतभयावहः॥ ५७<br>स लोकपालैकवपुश्चन्द्रादित्यग्रहात्मवान्।<br>स्थापयामास जगतीं सुगुप्तां धरणीधरैः॥ ५८<br>पावकानिलसम्पातो रराज युधि दानवः।<br>पारमेष्ठ्ये स्थितः स्थाने लोकानां प्रभवोपमे।<br>तं तुष्टुवुर्दैत्यगणा देवा इव पितामहम्॥ ५९ | उसने प्रदीप्त किरणोंवाले सूर्यको स्वर्गद्वारसे खदेड़ दिया और उनके सायन नामक साम्राज्य और दिनकी सृष्टि करनेकी शक्तिको छीन लिया। उसने देवताओंके मुखस्वरूप अग्निको सम्मुख देखकर उन्हें अपने मुखमें निगल लिया तथा वायुको वेगपूर्वक जीतकर उन्हें अपना वशवर्ती बना लिया। उसने अपने पराक्रमसे बलपूर्वक समुद्रोंको वशमें करके सभी नदियोंको अपने मुखमें डाल लिया और सागरोंको शरीरका अङ्ग बना लिया। इस प्रकार स्वर्ग अथवा भूतलपर जितने जल थे, उन सबको उसने अपने अधीन कर लिया। उस समय समस्त प्राणियोंको भयभीत करनेवाला वह दैत्य सम्पूर्ण लोकोंसे युक्त होकर महाभूतपति ब्रह्माकी तरह सुशोभित हो रहा था। सम्पूर्ण लोकपालोंके एकमात्र मूर्तस्वरूप तथा चन्द्र, सूर्य आदि ग्रहोंसे युक्त उस दानवने पर्वतोंद्वारा सुरक्षित पृथ्वीको स्थापित किया। इस प्रकार अग्नि और वायुके समान वेगशाली दानवराज कालनेमि युद्धस्थलमें लोकोंकी उत्पत्तिके स्थानभूत ब्रह्माके पदपर स्थित होकर शोभा पा रहा था। उस समय दैत्यगण उसकी उसी प्रकार स्तुति कर रहे थे, जैसे देवगण ब्रह्माकी किया करते हैं॥ ५३—५९॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तारकामययुद्धं नाम सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें तारकामय-युद्ध नामक एक सौ सतहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७७॥

७३२ * मत्स्यपुराण *


एक सौ अठहत्तरवाँ अध्याय

कालनेमि और भगवान् विष्णुका रोषपूर्वक वार्तालाप और भीषण युद्ध, विष्णुके चक्रके द्वारा कालनेमिका वध और देवताओंको पुनः निज पदकी प्राप्ति


मत्स्य उवाच
पञ्च तं नाभ्यवर्तन्त विपरीतेन कर्मणा।<br>वेदो धर्मः क्षमा सत्यं श्रीश्च नारायणाश्रया॥ १<br><br>स तेषामनुपस्थानात् सक्रोधो दानवेश्वरः।<br>वैष्णवं पदमन्विच्छन् ययौ नारायणान्तिकम्॥ २<br><br>स ददर्श सुपर्णस्थं शङ्खचक्रगदाधरम्।<br>दानवानां विनाशाय भ्रामयन्तं गदां शुभाम्॥ ३<br><br>सजलाम्भोधसदृशं विद्युत्सदृशवाससम्।<br>स्वारूढं स्वर्णपक्षाढ्यं शिखिनं काश्यपं खगम्॥ ४<br><br>दृष्ट्वा दैत्यविनाशाय रणे स्वस्थमवस्थितम्।<br>दानवो विष्णुमक्षोभ्यं बभाषे क्षुब्धमानसः॥ ५<br><br>अयं स रिपुरस्माकं पूर्वेषां प्राणनाशनः।<br>अर्णवावासिनश्चैव मधोर्वै कैटभस्य च॥ ६<br><br>अयं स विग्रहोऽस्माकमशाम्यः किल कथ्यते।<br>अनेन संयुगेष्वद्य दानवा बहवो हताः॥ ७<br><br>अयं स निर्घृणो लोके स्त्रीबालनिरपत्रपः।<br>येन दानवनारीणां सीमन्तोद्धरणं कृतम्॥ ८<br><br>अयं स विष्णुर्देवानां वैकुण्ठश्च दिवौकसाम्।<br>अनन्तो भोगिनामप्सु स्वपन्नाद्यः स्वयम्भुवः॥ ९<br><br>अयं स नाथो देवानांमस्माकं व्यथितात्मनाम्।<br>अस्य क्रोधं समासाद्य हिरण्यकशिपुर्हतः॥ १०मत्स्यभगवान् बोले— रविनन्दन! कालनेमिद्वारा विपरीत कर्म किये जानेके कारण वेद, धर्म, क्षमा, सत्य और नारायणके आश्रयमें रहनेवाली लक्ष्मी— ये पाँचों उसके अधीन नहीं हुए। उनके उपस्थित न होनेसे क्रोधसे भरा हुआ दानवेश्वर कालनेमि वैष्णवपदकी प्राप्तिकी अभिलाषासे नारायणके निकट गया। वहाँ जाकर उसने शङ्ख-चक्र-गदाधारी भगवान्‌को गरुड़की पीठपर बैठे तथा दैत्योंका विनाश करनेके लिये कल्याणमयी गदा घुमाते देखा। उनके शरीरकी कान्ति सजल मेघके समान थी। उनका पीताम्बर बिजलीके समान चमक रहा था। वे स्वर्णमय पंखसे युक्त शिखाधारी कश्यपनन्दन गरुडपर समासीन थे। इस प्रकार रणभूमिमें दैत्योंका विनाश करनेके लिये स्वस्थचित्तसे स्थित अक्षोभ्य भगवान् विष्णुको देखकर दानवराज कालनेमिका मन क्षुब्ध हो उठा, तब वह कहने लगा— 'यही हमलोगोंके पूर्वजोंका प्राणनाशक शत्रु है तथा यही महासागरमें निवास करनेवाले मधु और कैटभका भी प्राणहर्ता है। हमलोगोंका यह विग्रह शान्त होनेका नहीं, ऐसा निश्चितरूपसे कहा जाता है। बहुतेरे युद्धोंमें इसके द्वारा बहुत-से दानव मारे जा चुके हैं। यह बड़ा निष्ठुर है। इसे जगत्‌में स्त्री-बच्चोंपर भी हाथ उठाते समय लज्जा नहीं आती। इसने बहुत-सी दानव-पत्नियोंके सोहागका उन्मूलन कर दिया है। यही देवताओंमें विष्णु, स्वर्गवासियोंमें वैकुण्ठ, नागोंमें अनन्त और जलमें शयन करनेवाला आदि स्वयम्भू है। यही देवताओंका स्वामी और व्यथित हृदयवाले हमलोगोंका शत्रु है। इसीके क्रोधमें पड़कर हिरण्यकशिपु मारे गये हैं॥ १-१०॥
अस्य छायामुपाश्रित्य देवा मखमुखे श्रिताः।<br>आज्यं महर्षिभिर्दत्तमश्नुवन्ति त्रिधा हुतम्॥ ११'इसी प्रकार इसीका आश्रय ग्रहण कर यज्ञके प्रारम्भमें स्थित देवगण महर्षियोंद्वारा तीन प्रकारकी आहुति-रूपमें दिये गये आज्यका उपभोग करते हैं।
अयं स निधने हेतुः सर्वेषाममरद्विषाम्।<br>यस्य चक्रे प्रविष्टानि कुलान्यस्माकमाहवे॥ १२यही सभी देवद्रोही असुरोंकी मृत्युका कारण है। युद्धभूमिमें हमारे सभी कुल इसीके चक्रमें प्रविष्ट हो गये हैं।
* अध्याय १७८ *७३३
अयं स किल युद्धेषु सुरार्थे त्यक्तजीवितः।<br>सवितुस्तेजसा तुल्यं चक्रं क्षिपति शत्रु host... शत्रुषु॥ १३<br>अयं स कालो दैत्यानां कालभूतः समास्थितः।<br>अतिक्रान्तस्य कालस्य फलं प्राप्स्यति केशवः॥ १४<br>दिष्ट्येदानीं समक्षं मे विष्णुरेष समागतः।<br>अद्य मद्बाहुनिष्पिष्टो मामेव प्रणयिष्यति॥ १५<br>यास्याम्यपचितिं दिष्ट्या पूर्वेषामद्य संयुगे।<br>इमं नारायणं हत्वा दानवानां भयावहम्॥ १६<br>क्षिप्रमेव हनिष्यामि रणेऽमरगणांस्ततः।<br>जात्यन्तरगतो ह्येष बाधते दानवान् मृधे॥ १७<br>एषोऽनन्तः पुरा भूत्वा पद्मनाभ इति श्रुतः।<br>जघानैकार्णवे घोरे तावुभौ मधुकैटभौ॥ १८<br>द्विधाभूतं वपुः कृत्वा सिंहस्यार्धं नरस्य च।<br>पितरं मे जघानैको हिरण्यकशिपुं पुरा॥ १९<br>शुभं गर्भमधत्तैनमदितिर्देवतारणिः।<br>त्रींल्लोकानुज्जहारैकः क्रममाणस्त्रिभिः क्रमैः॥ २०<br>भूयस्त्विदानीं संग्रामे सम्प्राप्ते तारकामये।<br>मया सह समागम्य सदेवो विनशिष्यति॥ २१<br>एवमुक्त्वा बहुविधं क्षिपन्नारायणं रणे।<br>वाग्भिरप्रतिरूपाभिर्युद्धमेवाभ्यरोचयत् ॥ २२यह युद्धोंमें देवताओंके हितके लिये प्राणोंकी बाजी लगा देता है और शत्रुओंपर सूर्यके समान तेजस्वी चक्रका प्रयोग करता है। यह दैत्योंके कालरूपसे यहाँ स्थित है, किंतु अब यह केशव अपने बीते हुए कालका फल भोगेगा। सौभाग्यवश यह विष्णु इस समय मेरे ही समक्ष आ गया है। यह आज मेरी भुजाओंसे पिसकर मुझसे ही प्रेम करेगा। सौभाग्यकी बात है कि आज मैं रणभूमिमें दानवोंको भयभीत करनेवाले इस नारायणका वध कर पूर्वजोंके प्रायश्चित्तको पूर्ण कर दूँगा। तत्पश्चात् रणमें शीघ्र ही देवताओंका संहार कर डालूँगा। यह अन्य जातियोंमें भी उत्पन्न होकर समरमें दानवोंको कष्ट पहुँचाता है। यही पूर्वकालमें अनन्त होकर पुनः पद्मनाभ नामसे विख्यात हुआ। इसने ही भयंकर एकार्णवके जलमें मधु-कैटभ नामक दोनों दैत्योंका वध किया था। इसने अपने शरीरको आधा सिंह और आधा मनुष्य—इस प्रकार दो भागोंमें विभक्त करके पूर्वकालमें मेरे पिता हिरण्यकशिपुको मौतके घाट उतारा था। देवताओंकी जननी अदितिने इसीको अपने मङ्गलमय गर्भमें धारण किया था। अकेले इसीने तीन पगोंसे नापते हुए त्रिलोकीका उद्धार किया था। इस समय यह पुनः तारकामय संग्रामके प्राप्त होनेपर उपस्थित हुआ है। यह मेरे साथ उलझकर सभी देवताओंसहित नष्ट हो जायगा।' ऐसा कहकर उसने रणके मैदानमें प्रतिकूल वचनोंद्वारा अनेकों प्रकारसे नायणपर आक्षेप करते हुए युद्धके लिये ही अभिलाषा व्यक्त की॥ ११—२२॥
क्षिप्यमाणोऽसुरेन्द्रेण न चुकोप गदाधरः।<br>क्षमाबलेन महता सस्मितं चेदमब्रवीत्॥ २३भगवान् गदाधरमें क्षमाका महान् बल है, जिसके कारण असुरेन्द्रद्वारा इस प्रकार आक्षेप किये जानेपर भी वे कुपित नहीं हुए, अपितु मुसकराते हुए इस प्रकार बोले—'दैत्य!
अल्पं दर्पबलं दैत्य स्थिरमक्रोधजं बलम्।<br>हतस्त्वं दर्पजैर्दोषैर्हित्वा यद् भाषसे क्षमाम्॥ २४<br>अधीरस्त्वं मम मतो धिगेतत् तव वाग्बलम्।<br>न यत्र पुरुषाः सन्ति तत्र गर्जन्ति योषितः॥ २५<br>अहं त्वां दैत्य पश्यामि पूर्वेषां मार्गगामिनम्।<br>प्रजापतिकृतं सेतुं भित्त्वा कः स्वस्तिमान् व्रजेत्॥ २६दर्पका बल अल्पकालस्थायी होता है, किंतु क्षमाजनित बल स्थिर होता है। तुम क्षमाका परित्याग करके जो इस प्रकारकी ऊटपटाँग बातें बक रहे हो, इससे प्रतीत होता है कि तुम अपने दर्पजन्य दोषोंसे नष्ट हो चुके हो। मेरी समझसे तो तुम बड़े अधीर दीख रहे हो। तुम्हारे इस वाग्बलको धिक्कार है; क्योंकि ऐसी गर्जना तो जहाँ पुरुष नहीं होते, वहाँ स्त्रियाँ भी करती हैं। दैत्य! मैं तुम्हें भी पूर्वजोंके मार्गका अनुगामी ही देख रहा हूँ। भला, ब्रह्माद्वारा स्थापित की गयी मर्यादाओंको तोड़कर

७३४ * मत्स्यपुराण *


संस्कृतहिन्दी
अद्य त्वां नाशयिष्यामि देवव्यापारघातकम्।<br>स्वेषु स्वेषु च स्थानेषु स्थापयिष्यामि देवताः॥ २७कौन कुशलपूर्वक जीवित रह सकता है। अतः देवताओंके कार्योंमें बाधा पहुँचानेवाले तुम्हें मैं आज ही नष्ट कर डालूँगा और देवताओंको पुनः अपने-अपने स्थानोंपर स्थापित कर दूँगा।'॥ २३-२७॥
एवं ब्रुवति वाक्यं तु मृधे श्रीवत्सधारिणि।<br>जहास दानवः क्रोधाद्धस्तांश्चक्रे सहायुधान्॥ २८<br>स बाहुशतमुद्यम्य सर्वास्त्रग्रहणं रणे।<br>क्रोधाद् द्विगुणरक्ताक्षो विष्णुं वक्ष्यस्ताडयत्॥ २९<br>दानवाश्चापि समरे मयतारपुरोगमाः।<br>उद्यतायुधनिस्त्रिंशा विष्णुमभ्यद्रवन् रणे॥ ३०<br>स ताड्यमानोऽतिबलैर्दैत्यैः सर्वोद्यतायुधैः।<br>न चचाल ततो युद्धेऽकम्प्यमान इवाचलः॥ ३१<br>संसक्तश्च सुपर्णेन कालनेमी महासुरः।<br>स्वप्राणेन महतीं गदामुद्यम्य बाहुभिः॥ ३२<br>घोरां ज्वलन्तीं मुमुचे संरब्धो गरुडोपरि।<br>कर्मणा तेन दैत्यस्य विष्णुर्विस्मयमाविशत्॥ ३३<br>यदा तेन सुपर्णस्य पातिता मूर्ध्नि सा गदा।<br>सुपर्णं व्यथितं दृष्ट्वा कृत्तं च वपुरात्मनः॥ ३४<br>क्रोधसंरक्तनयनो वैकुण्ठश्चक्रमाददे।<br>व्यवधंत स वेगेन सुपर्णेन समं विभुः॥ ३५<br>भुजाश्चास्य व्यवर्धन्त व्याप्नुवन्तो दिशो दश।<br>प्रदिशश्चैव खं गां वै पूरयामास केशवः॥ ३६रणभूमिमें श्रीवत्सधारी भगवान्‌के इस प्रकार कहनेपर दानवराज कालनेमि ठहाका मारकर हँस पड़ा और फिर उसने क्रोधवश हाथोंमें हथियार धारण कर लिया। क्रोधके कारण उसके नेत्र दुगुने लाल हो गये थे। उसने रणभूमिमें सभी प्रकारके अस्त्रोंको धारण करनेवाली अपनी सैकड़ों भुजाओंको उठाकर भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलपर प्रहार किया। इसी प्रकार मय, तारक आदि अन्यान्य दानव भी खड्ग आदि आयुध लेकर युद्धस्थलमें भगवान् विष्णुपर टूट पड़े। यद्यपि सभी प्रकारके अस्त्रोंसे युक्त अत्यन्त बली दैत्य उनपर प्रहार कर रहे थे, तथापि वे विचलित नहीं हुए, अपितु युद्धभूमिमें पर्वतकी तरह अटल बने रहे। तब महान् असुर कालनेमि गरुडके साथ उलझ गया। उसने अपनी विशाल गदाको हाथोंमें धारण कर ली और क्रोधमें भरकर पूरी शक्तिके साथ उस चमकती हुई भयंकर गदाको गरुडके ऊपर छोड़ दिया। इस प्रकार उसके द्वारा फेंकी गयी वह गदा जब गरुडके मस्तकपर जा गिरी, तब दैत्यके उस कर्मसे भगवान् विष्णु आश्चर्यचकित हो उठे। फिर गरुडको पीड़ित तथा अपने शरीरको क्षत-विक्षत देखकर उनके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। तब उन्होंने चक्र हाथमें उठाया। फिर तो वे सर्वव्यापी विष्णु गरुडके साथ वेगपूर्वक आगे बढ़े। उनकी भुजाएँ दसों दिशाओंमें व्यास होकर बढ़ने लगीं। इस प्रकार भगवान् केशवने प्रदिशाओं, आकाशमण्डल और भूतलको आच्छादित कर लिया॥ २८-३६॥
ववृधे च पुनर्लोकान् क्रान्तुकाम इवौजसा।<br>तर्जनायासुरेन्द्राणां वर्धमानं नभस्तले॥ ३७<br>ऋषयश्चैव गन्धर्वास्तुष्टुवुर्मधुसूदनम्।<br>सर्वान् किरीटेन लिहन् साभ्रमम्बरमम्बरैः॥ ३८<br>पद्भ्यामाक्रम्य वसुधां दिशः प्रच्छाद्य बाहुभिः।<br>स सूर्यकरतुल्याभं सहस्रारमरिक्षयम्॥ ३९पुनः वे अपने तेजसे लोकोंका अतिक्रमण करते हुए-से बढ़ने लगे। जिस समय वे आकाशमण्डलमें सुरेन्द्रोंको भयभीत करनेके लिये बढ़ रहे थे, उस समय ऋषिगण और गन्धर्व भगवान् मधुसूदनकी स्तुति कर रहे थे। वे अपने किरीटसे ऊपरी सभी लोकोंको तथा वस्त्रोंसे मेघसहित आकाशको छूते हुए पैरोंसे पृथ्वीको आक्रान्त करके और भुजाओंसे दिशाओंको आच्छादित करके स्थित थे। उनके चक्रकी कान्ति सूर्यकी किरणोंकी-सी उद्दीप्त थी। उसमें हजारों अरे लगे थे। वह शत्रुओंका
* अध्याय १७८ *७३५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दीप्ताग्निसदृशं घोरं दर्शनेन सुदर्शनम्।<br>सुवर्णरेणुपर्यन्तं वज्रनाभं भयावहम्॥ ४०<br><br>मेदोऽस्थिमज्जारुधिरैः सिक्तं दानवसम्भवैः।<br>अद्वितीयप्रहरणं क्षुरपर्यन्तमण्डलम्॥ ४१<br><br>स्रग्दाममालाविततं कामगं कामरूपिणम्।<br>स्वयं स्वयम्भुवा सृष्टं भयदं सर्वविद्विषाम्॥ ४२<br><br>महर्षिरोषैराविष्टं नित्यमाहवदर्पितम्।<br>क्षेपणाद् यस्य मुह्यन्ति लोकाः स्थाणुजङ्गमाः॥ ४३<br><br>क्रव्यादानि च भूतानि तृप्तिं यान्ति महामृधे।<br>तदप्रतिमकर्म्मोग्रं समानं सूर्यवर्चसा॥ ४४विनाशक था। वह प्रज्वलित अग्निकी तरह भयंकर होनेपर भी देखनेमें परम सुन्दर था। सुवर्णकी रेणुकासे धूसरित, वज्रकी नाभिसे युक्त और अत्यन्त भयानक था। वह दानवोंके शरीरसे निकले हुए मेदा, अस्थि, मज्जा और रुधिरसे चुपड़ा हुआ था। वह अपने ढंगका अकेला ही अस्त्र था। उसके चारों ओर खुरे लगे हुए थे। वह माला और हारसे विभूषित था। वह अभीप्सित स्थानपर जानेवाला तथा स्वेच्छानुकूल रूप धारण करनेवाला था। स्वयं ब्रह्माने उसकी रचना की थी। वह सम्पूर्ण शत्रुओंके लिये भयदायक था तथा महर्षिके क्रोधसे परिपूर्ण और नित्य युद्धमें गर्वीला बना रहता था। उसका प्रयोग करनेसे स्थावर-जङ्गमसहित सभी प्राणी मोहित हो जाते हैं तथा महासमरमें मांसभोजी जीव तृप्तिको प्राप्त होते हैं। वह अनुपम कर्म करनेवाला, भयंकर और सूर्यके समान तेजस्वी था॥ ३७—४४॥
चक्रमुद्यम्य समरे क्रोधदीप्तो गदाधरः।<br>स मुष्णन् दानवं तेजः समरे स्वेन तेजसा॥ ४५<br><br>चिच्छेद बाहूंश्चक्रेण श्रीधरः कालनेमिनः।<br>तस्य वक्त्रशतं घोरं साग्निपूर्णाट्टहासिवै॥ ४६<br><br>तस्य दैत्यस्य चक्रेण प्रमथ्य बलाद्धरिः।<br>स च्छिन्नबाहुर्विशिरा न प्राकम्पत दानवः॥ ४७<br><br>कबन्धोऽवस्थितः संख्ये विशाख इव पादपः।<br>संवितत्य महापक्षाै वायोः कृत्वा समं जवम्॥ ४८<br><br>उरसा पातयामास गरुडः कालनेमिनम्।<br>स तस्य देहो विमुखो विबाहुश्च परिभ्रमन्॥ ४९<br><br>निपपात दिवं त्यक्त्वा क्षोभयन् धरणीतलम्।<br>तस्मिन् निपतिते दैत्ये देवाः सर्षिगणास्तदा॥ ५०<br><br>साधुसाध्विति वैकुण्ठं समेताः प्रत्यपूजयन्।<br>अपरे ये तु दैत्याश्च युद्धे दृष्टपराक्रमाः॥ ५१<br><br>ते सर्वे बाहुभिर्व्याप्ता न शेकुश्चलितुं रणे।<br>कांश्चित् केशेषु जग्राह कांश्चित् कण्ठेषु पीडयन्॥ ५२क्रोधसे उद्दीप्त हुए भगवान् गदाधरने समरभूमिमें उस चक्रको उठाकर अपने तेजसे दानवके तेजको नष्ट कर दिया और फिर उन श्रीधरने चक्रद्वारा कालनेमिकी भुजाओंको काट डाला। तत्पश्चात् श्रीहरिने उस दैत्यके सौ मुखोंको, जो भयंकर, अग्निके समान तेजस्वी और अट्टहास कर रहे थे, बलपूर्वक चक्रके प्रहारसे काट डाला। इस प्रकार भुजाओं और सिरोंके कट जानेपर भी वह दानव विचलित नहीं हुआ, अपितु युद्धभूमिमें शाखाओंसे हीन वृक्षकी तरह कबन्धरूपसे स्थित रहा। तब गरुड़ने अपने विशाल पंखोंको फैलाकर और वायुके समान वेग भरकर अपनी छातीके धक्केसे कालनेमिके कबन्धको धराशायी कर दिया। मुखों और भुजाओंसे हीन उसका वह शरीर चक्कर काटता हुआ स्वर्गलोकको छोड़कर भूतलको क्षुब्ध करता हुआ नीचे गिर पड़ा। उस दैत्यके गिर जानेपर ऋषियोंसहित देवगणोंने उस समय संगठित होकर भगवान् विष्णुको साधुवाद देते हुए उनकी पूजा की। दूसरे दैत्यगण, जो युद्धमें भगवान्‌के पराक्रमको देख चुके थे, वे सभी भगवान्‌की भुजाओंके वशीभूत हो रणभूमिमें चलने-फिरनेमें भी असमर्थ थे। भगवान्‌ने किन्हींको केश पकड़कर पटक दिया तो किन्हींको गला घोंटकर मार डाला।

और उसका माहात्म्य तथा हरिकेशको शिवजीद्वारा वरप्राप्ति

७३६* मत्स्यपुराण *

| चकर्ष कस्यचिद् वक्त्रं मध्ये गृह्यादथापरम्।<br>ते गदाचक्रनिर्दग्धा गतसत्त्वा गतासवः॥ ५३<br>गगनाद् भ्रष्टसर्वाङ्गा निपेतुर्धरणीतले।<br>तेषु दैत्येषु सर्वेषु हतेषु पुरुषोत्तमः॥ ५४<br>तस्थौ शक्रप्रियं कृत्वा कृतकर्मा गदाधरः। | किसीका मुख फाड़ दिया तो दूसरेकी कमर तोड़ दी। इस प्रकार वे सभी गदाकी चोट और चक्रसे जल चुके थे, उनके पराक्रम नष्ट हो गये थे और शरीरके सभी अङ्ग चूर-चूर हो गये थे। वे प्राणरहित होकर आकाशसे भूतलपर गिर पड़े। इस प्रकार उन सभी दैत्योंके मारे जानेपर पुरुषोत्तम भगवान् गदाधर इन्द्रका प्रिय कार्य करके कृतार्थ हो शान्तिपूर्वक स्थित हुए॥ ४५–५४ १/२ ॥ | | तस्मिन् विमर्दे संग्रामे निवृत्ते तारकामये॥ ५५<br>तं देशमाजगामाशु ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>सर्वैर्ब्रह्मर्षिभिः सार्धं गन्धर्वाप्सरसां गणैः॥ ५६<br>देवदेवो हरिं देवं पूजयन् वाक्यमब्रवीत्।<br>कृतं देव महत् कर्म सुराणां शल्यमुद्धृतम्।<br>वधेनानेन दैत्यानां वयं च परितोषिताः॥ ५७<br>योऽयं त्वया हतो विष्णो कालनेमी महासुरः।<br>त्वमेकोऽस्य मृधे हन्ता नान्यः कश्चन विद्यते॥ ५८<br>एष देवान् परिभवँल्लोकांश्च ससुरासुरान्।<br>ऋषीणां कदनं कृत्वा मामपि प्रति गर्जति॥ ५९<br>तदनेन तवाग्र्येण परितुष्टोऽस्मि कर्मणा।<br>यदयं कालकल्पस्तु कालनेमी निपातितः॥ ६०<br>तदागच्छस्व भद्रं ते गच्छामः दिवमुत्तमम्।<br>ब्रह्मर्षयस्त्वां तत्रस्थाः प्रतीक्षन्ते सदोगताः॥ ६१<br>कं चाहं तव दास्यामि वरं वरवतां वर।<br>सुरेष्वथ च दैत्येषु वराणां वरदो भवान्॥ ६२<br>निर्यात्यैतत् त्रैलोक्यं स्फीतं निहतकण्टकम्।<br>अस्मिन्नेव मृधे विष्णो शक्राय सुमहात्मने॥ ६३<br>एवमुक्तो भगवता ब्रह्मणा हरिरव्ययः।<br>देवाञ्शक्रमुखान् सर्वानुवाच शुभया गिरा॥ ६४ | तदनन्तर उस भयानक तारकामय संग्रामके निवृत्त होनेपर लोकपितामह ब्रह्मा तुरंत ही उस स्थानपर आये। उस समय उनके साथ सभी ब्रह्मर्षि थे तथा गन्धर्वों एवं अप्सराओंका समुदाय भी था। तब देवाधिदेव ब्रह्माने भगवान् श्रीहरिका आदर करते हुए इस प्रकार कहा—'देव! आपने बहुत बड़ा काम किया है। आपने तो देवताओंका काँटा ही उखाड़ दिया। दैत्योंके इस संहारसे हमलोग परम संतुष्ट हैं। विष्णो! आपने जो इस महान् असुर कालनेमिका वध किया है, यह आपके ही योग्य है; क्योंकि एकमात्र आप ही रणभूमिमें इसके वधकर्ता हैं, दूसरा कोई नहीं है। यह दानव देवताओं और असुरोंसहित समस्त लोकों और देवताओंको तिरस्कृत करते हुए ऋषियोंका संहार कर मेरे पास भी आकर गर्जता था। इसलिये जो यह कालके समान भयंकर कालनेमि मारा गया, आपके इस श्रेष्ठ कर्मसे मैं भलीभाँति संतुष्ट हूँ। अतः आपका कल्याण हो, आइये, अब हमलोग उत्तम स्वर्गलोकमें चलें। वहाँ सभामें बैठे हुए ब्रह्मर्षिगण आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। वरदानियोंमें श्रेष्ठ भगवन्! आप तो स्वयं ही देवताओं और दैत्योंके लिये श्रेष्ठ वरदायक हैं। ऐसी दशामें मैं आपको कौन-सा वर प्रदान करूँ? विष्णो! त्रिलोकीका यह समृद्धिशाली राज्य अब कण्टकरहित हो गया है, इसे आप इसी युद्धस्थलमें महात्मा इन्द्रको समर्पित कर दीजिये।' भगवान् ब्रह्माद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर अविनाशी श्रीहरि इन्द्र आदि सभी देवताओंसे मधुर वाणीमें बोले॥ ५५–६४॥ | | विष्णुरुवाच<br>शृण्वन्तु त्रिदशाः सर्वे यावन्तोऽत्र समागताः।<br>श्रवणावहितैः श्रोत्रैः पुरस्कृत्य पुरंदरम्॥ ६५<br>अस्माभिः समरे सर्वे कालनेमिमुखा हताः।<br>दानवा विक्रमोपेताः शक्रादपि महत्तराः॥ ६६<br>अस्मिन् महति संग्रामे दैतेयौ द्वौ विनिःसृतौ।<br>विरोचनश्च दैत्येन्द्रः स्वर्भानुश्च महाग्रहः॥ ६७ | **भगवान् विष्णुने कहा—**यहाँ आये हुए जितने देवता हैं, वे सभी इन्द्रको आगे करके सावधानीपूर्वक कान लगाकर मेरी बात सुनें। इस समरमें हमलोगोंने कालनेमि आदि सभी महान् पराक्रमी दानवोंको, जो इन्द्रसे भी बढ़कर बलशाली थे, मार डाला है; किंतु इस महान् संग्राममें दैत्येन्द्र विरोचन और महान् ग्रह राहु—ये दोनों दैत्य भाग निकले हैं। |

  • अध्याय १७८ * | ७३७ ---|---

| स्वां दिशं भजतां शक्रो दिशं वरुण एव च।<br>याम्यां यमः पालयतामुत्तरां च धनाधिपः॥ ६८<br>ऋक्षैः सह यथायोगं गच्छतां चैव चन्द्रमाः।<br>अब्दमृतुमुखे सूर्यो भजतामयनैः सह॥ ६९<br>आज्यभागाः प्रवर्त्तन्तां सदस्यैरभिपूजिताः।<br>हूयन्तामग्नयो विप्रैर्वेददृष्टेन कर्मणा॥ ७०<br>देवाश्चाप्यग्निहोमेन स्वाध्यायेन महर्षयः।<br>श्राद्धेन पितरश्चैव तृप्तिं यान्तु यथासुखम्॥ ७१<br>वायुश्चरतु मार्गस्थस्त्रिधा दीप्यतु पावकः।<br>त्रींस्तु वर्णांश्च लोकांस्त्रींस्तर्पयंश्चात्मजैर्गुणैः॥ ७२<br>क्रतवः सम्प्रवर्त्तन्तां दीक्षणीयैर्द्विजातिभिः।<br>दक्षिणाश्चोपपाद्यन्तां याज्ञिकेभ्यः पृथक् पृथक् ॥ ७३<br>गां तु सूर्यो रसान् सोमो वायुः प्राणांश्च प्राणिषु।<br>तर्पयन्तः प्रवर्त्तन्तां सर्व एव स्वकर्मभिः॥ ७४<br>यथावदानुपूर्व्येण महेन्द्रमलयोद्भवाः।<br>त्रैलोक्यमातरः सर्वाः समुद्रं यान्तु सिन्धवः॥ ७५<br>दैत्येभ्यस्त्यज्यतां भीश्च शान्तिं व्रजत देवताः।<br>स्वस्ति वोऽस्तु गमिष्यामि ब्रह्मलोकं सनातनम्॥ ७६<br>स्वगृहे स्वर्गलोके वा संग्रामे वा विशेषतः।<br>विश्रम्भो वो न मन्तव्यो नित्यं क्षुद्रा हि दानवाः॥ ७७<br>छिद्रेषु प्रहरन्त्येते न तेषां संस्थितिर्ध्रुवा।<br>सौम्यानामृजुभावानां भवतामार्जवं धनम्॥ ७८<br>एवमुक्त्वा सुरगणान् विष्णुः सत्यपराक्रमः।<br>जगाम ब्रह्मणा सार्धं स्वलोकं तु महायशाः॥ ७९<br>एतदाश्चर्यमभवत् संग्रामे तारकामये।<br>दानवानां च विष्णोश्च यन्मां त्वं परिपृष्टवान्॥ ८० | अब इन्द्र अपनी पूर्व दिशाकी रक्षा करें तथा वरुण पश्चिम दिशाकी, यम दक्षिण दिशाका और कुबेर उत्तर दिशाका पालन करें। चन्द्रमा नक्षत्रोंके साथ पूर्ववत् अपने स्थानको चले जायँ। सूर्य अयनोंके साथ ऋतुकालानुसार वर्षका उपभोग करें। यज्ञोंमें सदस्योंद्वारा अभिपूजित हो देवगण आज्यभाग ग्रहण करें। ब्राह्मणलोग वेदविहित कर्मानुसार अग्निमें आहुतियाँ डालें। देवगण अग्निहोत्रसे, महर्षिगण स्वाध्यायसे और पितृगण श्राद्धसे सुखपूर्वक तृप्तिलाभ करें। वायु अपने मार्गसे प्रवाहित हों। अग्नि अपने गुणोंसे तीनों वर्णों और तीनों लोकोंको तृप्त करते हुए तीन भागोंमें विभक्त होकर प्रकाशित हों॥ ६५-७२॥<br><br>दीक्षित ब्राह्मणोंद्वारा यज्ञानुष्ठान प्रारम्भ हों। याज्ञिक ब्राह्मणोंको पृथक्-पृथक् दक्षिणाएँ दी जायँ। सूर्य पृथ्वीको, चन्द्रमा रसोंको और वायु प्राणियोंमें स्थित प्राणोंको तृप्त करते हुए सभी अपने-अपने कर्ममें प्रवृत्त हों। महेन्द्र और मलय पर्वतसे निकलनेवाली त्रिलोकीकी मातास्वरूप सभी नदियाँ आनुपूर्वी पूर्ववत् समुद्रमें प्रविष्ट हों। देवगण! आपलोग दैत्योंसे प्राप्त होनेवाले भयको छोड़ दें और शान्ति धारण करें। आपलोगोंका कल्याण हो। अब मैं सनातन ब्रह्मलोकको जा रहा हूँ। आपलोगोंको अपने घरमें अथवा स्वर्गलोकमें अथवा विशेषकर संग्राममें दैत्योंका विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि दानव सदा क्षुद्र प्रकृतिवाले होते हैं। वे छिद्र पाकर तुरंत प्रहार कर बैठते हैं। उनकी स्थिति कभी निश्चित नहीं रहती। इधर सौम्य एवं कोमल स्वभाववाले आपलोगोंका आर्जव ही धन है। महायशस्वी एवं सत्यपराक्रमी भगवान् विष्णु देवगणोंसे ऐसा कहकर ब्रह्माके साथ अपने लोकको चले गये। राजन्! दानवों और भगवान् विष्णुके मध्य घटित हुए तारकामय संग्राममें यही आश्चर्य हुआ था, जिसके विषयमें तुमने मुझसे प्रश्न किया था॥ ७३-८०॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावसंग्रहो नामाष्टासप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पद्मोद्भवप्रादुर्भावसंग्रह नामक एक सौ अठहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७८॥

७३८ * मत्स्यपुराण *


एक सौ उनासीवाँ अध्याय

शिवजीके साथ अन्धकासुरका युद्ध, शिवजीद्वारा मातृकाओंकी सृष्टि, शिवजीके हाथों अन्धककी मृत्यु और उसे गणेशत्वकी प्राप्ति, मातृकाओंकी विध्वंसलीला तथा विष्णुनिर्मित देवियोंद्वारा उनका अवरोध

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>श्रुतः पद्मोद्भवस्तात विस्तरेण त्वयेरितः।<br>समासाद् भवमाहात्म्यं भैरवस्याभिधीयताम्॥ १ऋषियोंने पूछा—तात! आपके द्वारा विस्तारपूर्वक कहे गये पद्मोद्भवके प्रसङ्गको हमलोग सुन चुके, अब आप भैरवस्वरूप शंकरजीके माहात्म्यका संक्षेपसे वर्णन कीजिये॥ १॥
सूत उवाच<br>तस्यापि देवदेवस्य शृणुध्वं कर्म चोत्तमम्।<br>आसीद् दैत्योऽन्धको नाम भिन्नाञ्जनचयोपमः॥ २<br>तपसा महता युक्तो ह्यवध्यस्त्रिदिवौकसाम्।<br>स कदाचिन्महादेवं पार्वत्या सहितं प्रभुम्॥ ३<br>क्रीडमानं तदा दृष्ट्वा हर्तुं देवीं प्रचक्रमे।<br>तस्य युद्धं तदा घोरमभवत् सह शम्भुना॥ ४<br>आवन्त्ये विषये घोरे महाकालवनं प्रति।<br>तस्मिन् युद्धे तदा रुद्रश्चान्धकेनातिपीडितः॥ ५<br>सुषुवे बाणमत्युग्रं नाम्ना पाशुपतं हि तत्।<br>रुद्रबाणविनिर्भेदाद् रुधिरादन्धकस्य तु॥ ६<br>अन्धकाश्च समुत्पन्नाः शतशोऽथ सहस्रशः।<br>तेषां विदार्यमाणानां रुधिरादपरे पुनः॥ ७<br>बभूवुरन्धका घोरा यैर्व्याप्तमखिलं जगत्।<br>एवं मायाविनं दृष्ट्वा तं च देवस्तदान्धकम्॥ ८<br>पानार्थमन्धकास्रस्य सोऽसृजन्मातरस्तदा।सूतजी कहते हैं—ऋषियो! अच्छा, आपलोग देवाधिदेव शंकरजीके भी उत्तम कर्मको सुनिये। पूर्वकालमें अञ्जनसमूहके सदृश वर्णवाला अन्धक नामका एक दैत्य हुआ था। वह महान् तपोबलसे सम्पन्न था, इसी कारण देवताओंद्वारा अवध्य था। किसी समय उसकी दृष्टि पार्वतीके साथ क्रीडा करते हुए भगवान् शंकरपर पड़ी, तब वह पार्वती देवीका अपहरण करनेके लिये प्रयास करने लगा। उस समय अवन्ती-प्रदेशमें स्थित भयंकर महाकालवनमें उसका शंकरजीके साथ भीषण संग्राम हुआ। उस युद्धमें जब भगवान् रुद्र अन्धकद्वारा अत्यन्त पीडित कर दिये गये, तब उन्होंने अतिशय भयंकर पाशुपत नामक बाणको प्रकट किया। शंकरजीके उस बाणके आघातसे निकलते हुए अन्धकके रक्तसे दूसरे सैकड़ों-हजारों अन्धक उत्पन्न हो गये। पुनः उनके घायल शरीरोंसे बहते हुए रुधिरसे दूसरे भयंकर अन्धक प्रकट हुए, जिनके द्वारा सारा जगत् व्याप्त हो गया। तब उस अन्धकको इस प्रकारका मायावी जानकर भगवान् शंकरने उसके रक्तको पान करनेके लिये मातृकाओंकी सृष्टि की॥ २–८ १/२॥
माहेश्वरी तथा ब्राह्मी कौमारी मालिनी तथा॥ ९<br>सौपर्णी ह्याथ वायव्या शाक्री वै नैरृती तथा।<br>सौरी सौम्या शिवा दूती चामुण्डा चाथ वारुणी॥ १०<br>वाराही नारसिंही च वैष्णवी च चलच्छिखा।<br>शतानन्दा भगानन्दा पिच्छिला भगमालिनी॥ ११उन (मातृकाओं)-के नाम हैं—माहेश्वरी, ब्राह्मी, कौमारी, मालिनी, सौपर्णी, वायव्या, शाक्री, नैर्ऋती, सौरी, सौम्या, शिवा, दूती, चामुण्डा, वारुणी, वाराही, नारसिंही, वैष्णवी, चलच्छिखा, शतानन्दा, भगानन्दा, पिच्छिला, भगमालिनी,
  • अध्याय १७९ * ७३९
संस्कृत श्लोकहिन्दी सूची
बला चातिबला रक्ता सुरभी मुखमण्डिका।<br>मातृनन्दा सुनन्दा च बिडाली शकुनी तथा ॥ १२बला, अतिबला, रक्ता, सुरभी, मुखमण्डिका, मातृनन्दा, सुनन्दा, बिडाली, शकुनी, रेवती, महारक्ता, पिलपिच्छिका,
रेवती च महारक्ता तथैव पिलपिच्छिका।<br>जया च विजया चैव जयन्ती चापराजिता ॥ १३जया, विजया, जयन्ती, अपराजिता, काली, महाकाली, दूती, सुभगा, दुर्भगा, कराली, नन्दिनी, अदिति, दिति,
काली चैव महाकाली दूती चैव तथैव च।<br>सुभगा दुर्भगा चैव कराली नन्दिनी तथा ॥ १४मारी, मृत्यु, कर्णमोटी, ग्राम्या, उलूकी, घटोदरी, कपाली, वज्रहस्ता, पिशाची, राक्षसी, भुशुण्डी, शांकरी, चण्डा,
अदितिश्च दितिश्चैव मारी वै मृत्युरेव च।<br>कर्णमोटी तथा ग्राम्या उलूकी च घटोदरी ॥ १५लाङ्गली, कुटभी, खेटा, सुलोचना, धूम्रा, एकवीरा, करालिनी, विशालदंष्ट्रिणी, श्यामा, त्रिजटी, कुकुटी, वैनायकी, वैताली,
कपाली वज्रहस्ता च पिशाची राक्षसी तथा।<br>भुशुण्डी शाङ्करी चण्डा लाङ्गली कुटभी तथा ॥ १६उन्मत्तोदुम्बरी, सिद्धि, लेलिहाना, केकरी, गर्दभी, भुकुटी, बहुपुत्री, प्रेतयाना, बिडम्बिनी, क्रौञ्चा, शैलमुखी, विनता,
खेटा सुलोचना धूम्रा एकवीरा करालिनी।<br>विशालदंष्ट्रिणी श्यामा त्रिजटी कुक्कुटी तथा ॥ १७सुरसा, दनु, उषा, रम्भा, मेनका, सलिला, चित्ररूपिणी, स्वाहा, स्वधा, वषट्कारा, धृति, ज्येष्ठा, कपर्दिनी, माया,
वैनायकी च वैताली उन्मत्तोदुम्बरी तथा।<br>सिद्धिश्च लेलिहाना च केकरी गर्दभी तथा ॥ १८विचित्ररूपा, कामरूपा, संगमा, मुखेविला, मङ्गला, महानासा, महामुखी, कुमारी, रोचना, भीमा, सदाहा, मदोद्धता, अलम्बाक्षी,
भुकुटी बहुपुत्री च प्रेतयाना विडम्बिनी।<br>क्रौञ्चा शैलमुखी चैव विनता सुरसा दनुः ॥ १९कालपर्णी, कुम्भकर्णी, महासुरी, केशिनी, शंखिनी, लम्बा, पिंगला, लोहितामुखी, घण्टारवा, दंष्ट्रला, रोचना, काकजंघिका,
उषा रम्भा मेनका च ललिता चित्ररूपिणी।<br>स्वाहा स्वधा वषट्कारा धृतिर्ज्येष्ठा कपर्दिनी ॥ २०गोकर्णिका, अजमुखिका, महाग्रीवा, महामुखी, उल्कामुखी, धूमशिखा, कम्पिनी, परिकम्पिनी, मोहना, कम्पना, श्वेला,
माया विचित्ररूपा च कामरूपा च सङ्गमा।<br>मुखेविला मङ्गला च महानासा महामुखी ॥ २१निर्भया, बाहुशालिनी, सर्पकर्णी, एकाक्षी, विशोका, नन्दिनी, ज्योत्स्नामुखी, रभसा, निकुम्भा, रक्तकम्पना,
कुमारी रोचना भीमा सदाहा सा मदोद्धता।<br>अलम्बाक्षी कालपर्णी कुम्भकर्णी महासुरी ॥ २२अविकारा, महाचित्रा, चन्द्रसेना, मनोरमा, अदर्शना, हरत्पापा, मातंगी, लम्बमेखला, अबाला, वञ्चना, काली, प्रमोदा,
केशिनी शङ्खिनी लम्बा पिङ्गला लोहितामुखी।<br>घण्टारवाथ दंष्ट्राला रोचना काकजङ्घिका ॥ २३लाङ्गलावती, चित्ता, चित्तजला, कोणा, शान्तिका, अघविनाशिनी, लम्बस्तनी, लम्बसटा, विसटा, वासचूर्णिनी,
गोकर्णिकाजमुखिका महाग्रीवा महामुखी।<br>उल्कामुखी धूमशिखा कम्पिनी परिकम्पिनी ॥ २४
मोहना कम्पना श्वेला निर्भया बाहुशालिनी।<br>सर्पकर्णी तथैकाक्षी विशोका नन्दिनी तथा ॥ २५
ज्योत्स्नामुखी च रभसा निकुम्भा रक्तकम्पना।<br>अविकारा महाचित्रा चन्द्रसेना मनोरमा ॥ २६
अदर्शना हरत्पापा मातङ्गी लम्बमेखला।<br>अबाला वञ्चना काली प्रमोदा लाङ्गलावती ॥ २७
चित्ता चित्तजला कोणा शान्तिकाघविनाशिनी।<br>लम्बस्तनी लम्बसटा विसटा वासचूर्णिनी ॥ २८

७४० * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स्खलन्ती दीर्घकेशी च सुचिरा सुन्दरी शुभा।<br>अयोमुखी कटुमुखी क्रोधनी च तथाशनी ॥ २९<br>कुटुम्बिका मुक्तिका च चन्द्रिका बलमोहिनी।<br>सामान्या हासिनी लम्बा कोविदारी समासवी ॥ ३०<br>शङ्कुकर्णी महानादा महादेवी महोदरी।<br>हुंकारी रुद्रसुसटा रुद्रेशी भूतडामरी ॥ ३१<br>पिण्डजिह्वा चलज्वाला शिवा ज्वालामुखी तथा।<br>एताश्चान्याश्च देवेशः सोऽसृजन्मातरस्तदा ॥ ३२<br>अन्धकानां महाघोराः पपुस्तद्रुधिरं तदा।<br>ततोऽन्धकासृजः सर्वाः परां तृप्तिमुपागताः ॥ ३३<br>तासु तृप्तासु सम्भूता भूय एवान्धकप्रजाः।<br>अर्दितस्तैर्महादेवः शूलमुद्गरपाणिभिः ॥ ३४<br>ततः स शङ्करो देवस्त्वन्धकैर्व्याकुलीकृतः।<br>जगाम शरणं देवं वासुदेवमजं विभुम् ॥ ३५<br>ततस्तु भगवान् विष्णुः सृष्टवान् शुष्करेवतीम्।<br>या पपौ सकलं तेषामन्धकानामसृक् क्षणात् ॥ ३६<br>यथा यथा च रुधिरं पिबन्त्यन्धकसम्भवम्।<br>तथा तथाधिकं देवी संशुष्यति जनाधिप ॥ ३७<br>पीयमाने तया तेषामन्धकानां तथासृजि।<br>अन्धकास्तु क्षयं नीताः सर्वे ते त्रिपुरारिणा ॥ ३८<br>मूलान्धकं तु विक्रम्य तदा शर्वस्त्रिलोकधृक्।<br>चकार वेगाच्छूलाग्रे स च तुष्टाव शङ्करम् ॥ ३९<br>अन्धकस्तु महावीर्यस्तस्य तुष्टोऽभवद् भवः।<br>सामीप्यं प्रददौ नित्यं गणेशत्वं तथैव च ॥ ४०<br>ततो मातृगणाः सर्वे शङ्करं वाक्यमब्रुवन्।<br>भगवन् भक्षयिष्यामः सदेवासुरमानुषान्।<br>त्वत्प्रसादाज्जगत्सर्वं तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ ४१स्खलन्ती, दीर्घकेशी, सुचिरा, सुन्दरी, शुभा, अयोमुखी, कटुमुखी, क्रोधनी, अशनी, कुटुम्बिका, मुक्तिका, चन्द्रिका, बलमोहिनी, सामान्या, हासिनी, लम्बा, कोविदारी, समासवी, शंकुकर्णी, महानादा, महादेवी, महोदरी, हुंकारी, रुद्रसुसटा, रुद्रेशी, भूतडामरी, पिण्डजिह्वा, चलज्वाला, शिवा तथा ज्वालामुखी। इनकी तथा इनके अतिरिक्त अन्यान्य मातृकाओंकी* देवेश्वर शंकरने उस समय सृष्टि की॥ ९–३२॥<br><br>तदनन्तर उत्पन्न हुई इन महाभयावनी मातृकाओंने अन्धकोंके रक्तको चूस लिया। इस प्रकार अन्धकोंके रक्तका पान करनेसे इन सबको परम तृप्तिका अनुभव हुआ। उनके तृप्त हो जानेके पश्चात् पुनः अन्धककी संतानें उत्पन्न हुई। उन्होंने हाथमें शूल और मुद्गर धारण करके पुनः महादेवजीको पीडित कर दिया। इस प्रकार जब अन्धकोंने भगवान् शंकरको व्याकुल कर दिया, तब वे सर्वव्यापी एवं अजन्मा भगवान् वासुदेवकी शरणमें गये। तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने शुष्करेवती नामवाली एक देवीको प्रकट किया, जिसने क्षणमात्रमें ही उन अन्धकोंके सम्पूर्ण रक्तको चूस लिया। जनेश्वर! वह देवी ज्यों-ज्यों अन्धकोंके शरीरसे निकले हुए रुधिरको पीती जाती थी, त्यों-त्यों वह अधिक क्षुधित एवं पिपासित होती जाती थी। इस प्रकार जब उस देवीद्वारा उन अन्धकोंका रक्त पान कर लिया गया, तब त्रिपुरारि शंकरने उन सभी अन्धकोंको कालके हवाले कर दिया। फिर त्रिलोकीको धारण करनेवाले भगवान् शंकरने जब वेगपूर्वक पराक्रम प्रकट करके प्रधान अन्धकको अपने त्रिशूलके अग्रभागका लक्ष्य बनाया, तब वह महापराक्रमी अन्धक शंकरजीकी स्तुति करने लगा। उसके स्तवन करनेसे भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये, तब उन्होंने उसे अपना नित्य सामीप्य तथा गणेशत्वका पद प्रदान कर दिया। यह देखकर सभी मातृकाएँ शंकरजीसे इस प्रकार बोलीं—‘भगवन्! हमलोग आपकी कृपासे देवता, असुर और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण जगत्‌को खा जाना चाहती हैं, इसके लिये आप हमलोगोंको आज्ञा देनेकी कृपा करें'॥ ३३—४१॥

* अन्धकका वृत्तान्त शिव, सौरादि प्रायः दस पुराणोंमें भी है। पर इतनी संख्यामें मातृकाओंका वर्णन अन्यत्र कहीं नहीं आया है।

* अध्याय १७९ * <span style="float: right;">७४१</span>


शङ्कर उवाच
भवतीभिः प्रजाः सर्वा रक्षणीया न संशयः।<br>तस्माद् घोरादभिप्रायान्मनः शीघ्रं निवर्त्यताम्॥ ४२<br><br>इत्येवं शंकरेणोक्तमनादृत्य वचस्तदा।<br>भक्षयामासुरुत्युग्रास्त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ ४३<br><br>त्रैलोक्ये भक्ष्यमाणे तु तदा मातृगणेन वै।<br>नृसिंहमूर्तिं देवेशं प्रदध्यौ भगवान्शिवः॥ ४४<br><br>अनादिनिधनं देवं सर्वलोकभवोद्भवम्।<br>दैत्येन्द्रवक्षोरुधिरचर्चिताग्रमहानखम् ॥ ४५<br><br>विद्युज्जिह्वं महादंष्ट्रं स्फुरत्केसरकण्ठकम्।<br>कल्पान्तमारुतक्षुब्धं सप्तार्णवसमस्वनम्॥ ४६<br><br>वज्रतीक्ष्णनखं घोरमाकर्णव्यादिताननम्।<br>मेरुशैलप्रतीकाशमुदयार्कसमेक्षणम् ॥ ४७<br><br>हिमाद्रिशिखराकारं चारुदंष्ट्रोज्ज्वलाननम्।<br>नखनिःसृतरोषाग्निज्वालाकेसरमालिनम् ॥ ४८<br><br>बद्धाङ्गदं सुमुकुटं हारकेयूरभूषणम्।<br>श्रोणीसूत्रेण महता काञ्चनेन विराजितम्॥ ४९<br><br>नीलोत्पलदलश्यामं वासोयुगविभूषणम्।<br>तेजसाक्रान्तसकलब्रह्माण्डागारसङ्कुलम् ॥ ५०<br><br>पवनभ्राम्यमाणानां हुतहव्यवहार्चिषाम्।<br>आवर्तसदृशाकारैः संयुक्तं देहलोमजैः॥ ५१<br><br>सर्वपुष्पविचित्रां च धारयन्तं महास्रजम्।<br>स ध्यातमात्रो भगवान् प्रददौ तस्य दर्शनम्॥ ५२<br><br>यादृशेनैव रूपेण ध्यातो रुद्रेण धीमता।<br>तादृशेनैव रूपेण दुर्निरीक्ष्येण दैवतैः॥ ५३<br><br>प्रणिपत्य तु देवेशं तदा तुष्टाव शङ्करः॥ ५४**शंकरजीने कहा—**देवियो! आपलोगोंको तो निःसंदेह सभी प्रजाओंकी रक्षा करनी चाहिये, अतः आपलोग शीघ्र ही उस घोर अभिप्रायसे अपने मनको लौटा लें। इस प्रकार शंकरजीद्वारा कहे गये वचनकी अवहेलना करके वे अत्यन्त निष्ठुर मातृकाएँ चराचरसहित त्रिलोकीको भक्षण करने लगीं। तब मातृकाओंद्वारा त्रिलोकीको भक्षित होते हुए देखकर भगवान् शिवने उन नृसिंहमूर्ति भगवान् विष्णुका ध्यान किया, जो आदि-अन्तसे रहित और सभी लोकोंके उत्पादक हैं, जिनके विशाल नखोंका अग्रभाग दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपुके वक्षःस्थलके रुधिरसे चर्चित है, जिनकी जीभ बिजलीकी तरह लपलपाती रहती है और दाढ़ें विशाल हैं, जिनके कंधेके बाल हिलते रहते हैं, जो प्रलयकालीन वायुकी तरह क्षुब्ध और सप्तार्णवकी भाँति गर्जना करनेवाले हैं, जिनके नख वज्र-सदृश तीक्ष्ण हैं, जिनकी आकृति भयंकर है, जिनका मुख कानतक फैला हुआ है, जो सुमेरु पर्वतके समान चमकते रहते हैं, जिनके नेत्र उदयकालीन सूर्य-सरीखे उद्दीप्त हैं, जिनकी आकृति हिमालयके शिखर-जैसी है, जिनका मुख सुन्दर उज्ज्वल दाढ़ोंसे विभूषित है, जो नखोंसे निकलती हुई क्रोधाग्निकी ज्वालारूपी केसरसे युक्त रहते हैं, जिनकी भुजाओंपर अङ्गद बँधा रहता है, जो सुन्दर मुकुट, हार और केयूरसे विभूषित रहते हैं, विशाल स्वर्णमयी करधनीसे जिनकी शोभा होती है, जिनकी कान्ति नीले कमलदलके समान श्याम है, जो दो वस्त्र धारण किये रहते हैं और अपने तेजसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमण्डलको आक्रान्त किये रहते हैं, वायुद्वारा घुमायी जाती हुई हवनयुक्त अग्निकी लपटोंकी भँवर-सदृश आकारवाले शरीर-रोमसे संयुक्त हैं तथा जो सभी प्रकारके पुष्पोंसे बनी हुई हवनयुक्त विचित्र एवं विशाल मालाको धारण करते हैं। ध्यान करते ही भगवान् विष्णु शिवजीके नेत्रोंके समक्ष प्रकट हो गये। बुद्धिमान् शंकरने जिस प्रकारके रूपका ध्यान किया था, वे उसी रूपसे प्रकट हुए। उनका वह रूप देवताओंद्वारा भी दुर्निरीक्ष्य था। तब शंकरजी उन देवेश्वरको प्रणाम कर उनकी स्तुति करने लगे॥ ४२–५४॥
शङ्कर उवाचशंकरजी बोले—
नमस्तेऽस्तु जगन्नाथ नरसिंहवपुर्धर।<br>दैत्यनाथासृजापूर्णनखशक्तिविराजित ॥ ५५जगन्नाथ! आप नरसिंहका शरीर धारण करनेवाले हैं और आपकी नखशक्ति दैत्यराज हिरण्यकशिपुके रक्तसे रञ्जित होकर सुशोभित होती है, आपको नमस्कार

७४२ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततः सकलसंलग्न हेमपिङ्गलविग्रह।<br>नतोऽस्मि पद्मनाभ त्वां सुरशक्रजगद्गुरो॥ ५६<br>कल्पान्ताम्भोदनिर्घोष सूर्यकोटिसमप्रभ।<br>सहस्रयमसङ्क्रोध सहस्रेन्द्रपराक्रम॥ ५७<br>सहस्रधनदस्फीत सहस्रवरुणात्मक।<br>सहस्रकालरचित सहस्रनियतेन्द्रिय॥ ५८<br>सहस्रभूमहाधैर्य सहस्रानन्तमूर्तिमन्।<br>सहस्रचन्द्रप्रतिम सहस्रग्रहविक्रम॥ ५९<br>सहस्ररुद्रतेजस्क सहस्रब्रह्मसंस्तुत।<br>सहस्रबाहुवेगो ग्र सहस्त्रास्यनिरीक्षण।<br>सहस्रयन्त्रमथन सहस्रवधमोचन॥ ६०<br>अन्धकस्य विनाशाय याः सृष्टा मातरो मया।<br>अनादृत्य तु मद्वाक्यं भक्षयन्त्यद्य ताः प्रजाः॥ ६१<br>कृत्वा ताश्च न शक्तोऽहं संहर्तुमपराजित।<br>स्वयं कृत्वा कथं तासां विनाशमभिकारये॥ ६२है। पद्मनाभ! आप सर्वव्यापी हैं, आपका शरीर स्वर्णके समान पीला है और आप देवता, इन्द्र तथा जगत्‌के गुरु हैं, आपको प्रणाम है। आपका सिंहनाद प्रलयकालीन मेघोंके समान है, आपकी कान्ति करोड़ों सूर्योंके सदृश है, आपका क्रोध हजारों यमराजके तथा पराक्रम सहस्रों इन्द्रके समान है, आप हजारों कुबेरोंसे भी बढ़कर समृद्ध, हजारों वरुणोंके समान, हजारों कालोंद्वारा रचित और हजारों इन्द्रियनिग्रहियोंसे बढ़कर हैं, आपका धैर्य सहस्रों पृथ्वियोंसे भी उत्तम है, आप सहस्रों अनन्तोंकी मूर्ति धारण करनेवाले, सहस्रों चन्द्रमा-सरीखे सौन्दर्यशाली और सहस्रों ग्रहों-सदृश पराक्रमी हैं, आपका तेज हजारों रुद्रोंके समान है, हजारों ब्रह्मा आपकी स्तुति करते हैं, आप हजारों बाहु, मुख और नेत्रवाले हैं, आपका वेग अत्यन्त उग्र है, आप सहस्रों यन्त्रोंको एक साथ तोड़ डालनेवाले तथा सहस्रोंका वध और सहस्रोंको बन्धनमुक्त करनेवाले हैं। भगवन्! अन्धकका विनाश करनेके लिये मैंने जिन मातृकाओंकी सृष्टि की थी, वे सभी आज मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन कर प्रजाओंको खा जानेके लिये उतारू हैं। अपराजित! उन्हें उत्पन्न कर मैं पुन: उन्हींका संहार नहीं कर सकता। स्वयं उत्पन्न करके भला मैं उनका विनाश कैसे करूँ॥ ५५—६२॥
एवमुक्तः स रुद्रेण नरसिंहवपुर्धरः।<br>ससर्ज देवो जिह्वायास्तदा वागीश्वरीं हरिः॥ ६३<br>हृदयाच्च तथा माया गुह्याच्च भवमालिनी।<br>अस्थिभ्यश्च तथा काली सृष्टा पूर्वं महात्मना॥ ६४<br>यया तद्रुधिरं पीतमन्धकानां महात्मनाम्।<br>या चास्मिन् कथिता लोके नामतः शुष्करेवती॥ ६५रुद्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर नरसिंह-विग्रहधारी भगवान् श्रीहरिने अपनी जीभसे वागीश्वरीको, हृदयसे मायाको, गुह्यप्रदेशसे भवमालिनीको और हड्डियोंसे कालीको प्रकट किया। उन महात्माने इस कालीकी सृष्टि पहले भी की थी, जिसने महान् आत्मबलसे सम्पन्न अन्धकोंके रुधिरका पान किया था और जो इस लोकमें शुष्करेवती नामसे प्रसिद्ध है।
द्वात्रिंशन्मातरः सृष्टा गात्रेभ्यश्चक्रिणा ततः।<br>तासां नामानि वक्ष्यामि तानि मे गदतः शृणु॥ ६६<br>सर्वास्तास्तु महाभागा घण्टाकर्णी तथैव च।<br>त्रैलोक्यमोहिनी पुण्या सर्वसत्त्ववशङ्करी॥ ६७<br>तथा च चक्रहृदया पञ्चमी व्योमचारिणी।<br>शङ्खिनी लेखिनी चैव कालसंकर्षणी तथा॥ ६८<br>इत्येताः पृष्ठगा राजन् वागीशानुचराः स्मृताः।<br>संकर्षणी तथाश्वत्था बीजभावापराजिता॥ ६९<br>कल्याणी मधुदंष्ट्री च कमलोत्पलहस्तिका।<br>इति देव्यष्टकं राजन् मायानुचरमुच्यते॥ ७०इसी प्रकार सुदर्शन चक्रधारी भगवान्‌ने अपने अङ्गोंसे बत्तीस अन्य मातृकाओंकी सृष्टि की, वे सभी महान् भाग्यशालिनी थीं। मैं उनके नामोंका वर्णन कर रहा हूँ, तुम उन्हें मुझसे श्रवण करो। उनके नाम हैं—घण्टाकर्णी, त्रैलोक्यमोहिनी, पुण्यमयी सर्वसत्त्ववशंकरी, चक्रहृदया, पाँचवीं व्योमचारिणी, शङ्खिनी, लेखिनी और काल-संकर्षणी। राजन्! ये वागीश्वरीके पीछे चलनेवाली उनकी अनुचरी कही गयी हैं। राजन्! संकर्षणी, अश्वत्था, बीजभावा, अपराजिता, कल्याणी, मधुदंष्ट्री, कमला और उत्पलहस्तिका—ये आठों देवियाँ मायाकी अनुचरी कहलाती हैं।
* अध्याय १७९ *७४३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अजिता सूक्ष्महृदया वृद्धा वेशाश्मदर्शना।<br>नृसिंहभैरवा बिल्वा गरुत्मद्धृदया जया॥ ७१<br>भवमालिन्यनुचरा इत्यष्टौ नृप मातरः।<br>आकर्णनी सम्भटा च तथैवोत्तरमालिका॥ ७२<br>ज्वालामुखी भीषणिका कामधेनुश्च बालिका।<br>तथा पद्मकरा राजन् रेवत्यनुचराः स्मृताः॥ ७३<br>अष्टौ महाबलाः सर्वा देवगात्रसमुद्भवाः।<br>त्रैलोक्यसृष्टिसंहारसमर्थाः सर्वदेवताः॥ ७४नरेश! अजिता, सूक्ष्महृदया, वृद्धा, वेशाश्मदर्शना, नृसिंहभैरवा, बिल्वा, गरुत्मद्धृदया और जया—ये आठों मातृकाएँ भवमालिनीकी अनुचरी हैं। राजन्! आकर्णनी, सम्भटा, उत्तरमालिका, ज्वालामुखी, भीषणिका, कामधेनु, बालिका तथा पद्मकरा—ये शुष्करेवतीकी अनुचरी कही जाती हैं। आठ-आठके विभागसे भगवान्‌के शरीरसे उद्भूत हुई ये सभी देवियाँ महान् बलवती तथा त्रिलोकीके सृजन और संहारमें समर्थ थीं॥ ६३—७४॥
ताः सृष्टमात्रा देवेन क्रुद्धा मातृगणस्य तु।<br>प्रधाविता महाराज क्रोधविस्फारितेक्षणाः॥ ७५<br>अविसह्यतमं तासां दृष्टितेजः सुदारुणम्।<br>तमेव शरणं प्राप्ता नृसिंहो वाक्यमब्रवीत्॥ ७६महाराज! भगवान् विष्णुद्वारा प्रकट किये जाते ही वे देवियाँ कुपित हो मातृकाओंकी ओर क्रोधवश आँखें फाड़कर देखती हुई उनपर टूट पड़ीं। उन देवियोंके नेत्रोंका तेज अत्यन्त भीषण और सर्वथा असह्य था, इसलिये वे मातृकाएँ भगवान् नृसिंहकी शरणमें आ पड़ीं। तब भगवान् नरसिंहने उनसे इस प्रकार कहा—
यथा मनुष्याः पशवः पालयन्ति चिरात् सुतान्।<br>जयन्ति ते तथैवाशु यथा वै देवतागणाः॥ ७७<br>भवत्यस्तु तथा लोकान् पालयन्तु मयेरिताः।<br>मनुजैश्च तथा देव्यैर्यजध्वं त्रिपुरान्तकम्॥ ७८<br>न च बाधा प्रकर्तव्या ये भक्तास्त्रिपुरान्तके।<br>ये च मां संस्मरन्तीह ते च रक्ष्याः सदा नराः॥ ७९<br>बलिकर्म करिष्यन्ति युष्माकं ये सदा नराः।<br>सर्वकामप्रदास्तेषां भविष्यध्वं तथैव च॥ ८०‘जिस प्रकार मनुष्य और पशु चिरकालसे अपनी संतानका पालन-पोषण करते आ रहे हैं और जिस प्रकार शीघ्र दोनों देवताओंको वशमें कर लेते हैं, उसी तरह तुमलोग मेरे आदेशानुसार समस्त लोकोंकी रक्षा करो। मनुष्य तथा देवता सभी त्रिपुरहन्ता शिवजीका यजन करें। जो लोग शंकरजीके भक्त हैं, उनके प्रति तुमलोगोंको कोई बाधा नहीं करनी चाहिये। इस लोकमें जो मनुष्य मेरा स्मरण करते हैं, वे तुमलोगोंद्वारा सदा रक्षणीय हैं। जो मनुष्य सदा तुमलोगोंके निमित्त बलिकर्म करेंगे, तुमलोग उनके सभी मनोरथ पूर्ण करो।
उच्छासनादिकं ये च कथयन्ति मयेरितम्।<br>ते च रक्ष्याः सदा लोका रक्षितव्यं च शासनम्॥ ८१<br>रौद्रीं चैव परां मूर्तिं महादेवः प्रदास्यति।<br>युष्मन्मुख्या महादेव्यस्तदुक्तं परिरक्ष्यथ॥ ८२जो लोग मेरे इस चरित्रका कथन करेंगे, उन लोगोंकी सदा रक्षा तथा मेरे आदेशका भी पालन करना चाहिये। तुमलोगोंमें जो मुख्य महादेवियाँ हैं, उन्हें महादेवजी अपनी परमोत्कृष्ट रौद्री मूर्ति प्रदान करेंगे। तुमलोगोंको उनकी आज्ञाका पालन करना चाहिये।
मया मातृगणः सृष्टो योऽयं विगतसाध्वसः।<br>एष नित्यं विशालाक्षो मयैव सह रंस्यते॥ ८३<br>मया सार्धं तथा पूजां नरेभ्यश्चैव लप्स्यथ।<br>पृथक् सुपूजिता लोके सर्वान् कामान् प्रदास्यथ॥ ८४लज्जा और भयसे रहित हो मैंने जो इस मातृगणकी सृष्टि की है, यह विशाल नेत्रोंवाला दल नित्य मेरे साथ ही निवास करेगा तथा मेरे साथ इसे मनुष्योंद्वारा प्रदान की गयी पूजा भी प्राप्त होती रहेगी। लोगोंद्वारा पृथक्-रूपसे सुपूजित होनेपर ये देवियाँ सभी कामनाएँ प्रदान करेंगी।

७४४ * मत्स्यपुराण *

शुष्कां सम्पूजयिष्यन्ति ये च पुत्रार्थिनो जनाः।<br>तेषां पुत्रप्रदा देवी भविष्यति न संशयः॥ ८५<br>एवमुक्त्वा तु भगवान् सह मातृगणेन तु।<br>ज्वालामालाकुलवपुस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ८६<br>तत्र तीर्थं समुत्पन्नं कृतशौचेति यज्जगुः।<br>तत्रापि पूर्वजो देवो जगदार्तिहरो हरः॥ ८७<br>रौद्रस्य मातृवर्गस्य दत्त्वा रुद्रस्तु पार्थिव।<br>रौद्रां दिव्यां तनुं तत्र मातृमध्ये व्यवस्थितः॥ ८८<br>सप्त ता मातरो देव्यः सार्धनारीनरः शिवः।<br>निवेश्य रौद्रं तत्स्थानं तत्रैवान्तरधीयत॥ ८९<br>समातृवर्गस्य हरस्य मूर्ति-<br>र्यदा यदा याति च तत्समीपे।<br>देवेश्वरस्यापि नृसिंहमूर्तेः<br>पूजां विधत्ते त्रिपुरान्धकारिः॥ ९०जो पुत्राभिलाषी लोग शुष्करेवतीकी पूजा करेंगे, उनके लिये वह देवी पुत्र प्रदान करनेवाली होगी—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है'॥ ७५-८५॥<br>राजन्! ऐसा कहकर ज्वालासमूहोंसे व्याप्त शरीरवाले भगवान् नरसिंह उस मातृगणके साथ वहीं अन्तर्हित हो गये। वहीं एक तीर्थ उत्पन्न हो गया, जिसे लोग 'कृतशौच' नामसे पुकारते हैं। वहीं सबके पूर्वज तथा जगत्का कष्ट दूर करनेवाले भगवान् रुद्र उस भयंकर मातृवर्गको अपनी रौद्री दिव्य मूर्ति प्रदान कर उन्हीं मातृकाओंके मध्यस्थित हो गये। इस प्रकार अर्धनारी-नरस्वरूप शिव उन सातों मातृ-देवियोंको उस रौद्रस्थानपर स्थापित कर स्वयं वहीं अन्तर्हित हो गये। मातृवर्गसहित शिवजीकी मूर्ति जब-जब देवेश्वर भगवान् नरसिंहकी मूर्तिके निकट जाती है, तब-तब त्रिपुर एवं अन्धकके शत्रु शंकरजी उस नृसिंहमूर्तिकी पूजा करते हैं॥ ८६-९०॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽन्धकवधो नामैकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७९ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अन्धकवध नामक एक सौ उन्नासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७९॥


एक सौ असीवाँ अध्याय

वाराणसी-माहात्म्यके प्रसङ्गमें हरिकेश यक्षकी तपस्या, अविमुक्तकी शोभा और उसका माहात्म्य तथा हरिकेशको शिवजीद्वारा वरप्राप्ति

ऋषय ऊचुः<br><br>श्रुतोऽन्धकवधः सूत यथावत् त्वदुदीरितः।<br>वाराणस्यास्तु माहात्म्यं श्रोतुमिच्छाम साम्प्रतम्॥ १<br>भगवान् पिङ्गलः केन गणत्वं समुपागतः।<br>अन्नदत्वं च सम्प्राप्तो वाराणस्यां महाद्युतिः॥ २<br>क्षेत्रपालः कथं जातः प्रियत्वं च कथं गतः।<br>एतदिच्छाम कथितं श्रोतुं ब्रह्मसुत त्वया॥ ३ऋषियोंने पूछा—सूतजी! आपद्वारा कहा गया अन्धक-वधका प्रसङ्ग तो हमलोगोंने यथार्थरूपसे सुन लिया, अब हमलोग वाराणसीका माहात्म्य सुनना चाहते हैं। ब्रह्मपुत्र सूतजी! वाराणसीमें परम कान्तिमान् भगवान् पिङ्गलको गणेश्वरत्वकी प्राप्ति कैसे हुई? वे अन्नदाता कैसे बने और क्षेत्रपाल कैसे हो गये? तथा वे शंकरजीके प्रेमपात्र कैसे बने? आपके द्वारा कहे गये इस सारे प्रसङ्गको सुननेके लिये हमलोगोंकी उत्कट अभिलाषा है॥ १-३॥

१८१- अविमुक्तक्षेत्र-(वाराणसी) का माहात्म्य

* अध्याय १८० *७४५

| सूत उवाच<br><br>शृणुध्वं वै यथा लेभे गणेशत्वं स पिङ्गलः।<br>अन्नदत्वं च लोकानां स्थानं वाराणसीं त्विह॥ ४<br>पूर्णभद्रसुतः श्रीमानासीद्यक्षः प्रतापवान्।<br>हरिकेश इति ख्यातो ब्रह्मण्यो धार्मिकश्च ह॥ ५<br>तस्य जन्मप्रभृत्येव शर्वे भक्तिरनुत्तमा।<br>तदासीत्तन्नमस्कारस्तन्निष्ठस्तत्परायणः ॥ ६<br>आसीनश्च शयानश्च गच्छंस्तिष्ठन्ननुव्रजन्।<br>भुञ्जानोऽथ पिबन् वापि रुद्रमेवान्वचिन्तयत्॥ ७<br>तमेवं युक्तमनसं पूर्णभद्रः पिताब्रवीत्।<br>न त्वां पुत्रमहं मन्ये दुर्जातो यस्त्वमन्यथा॥ ८<br>न हि यक्षकुलीनानामेतद् वृत्तं भवत्युत।<br>गुह्यका बत यूयं वै स्वभावात् क्रूरचेतसः॥ ९<br>क्रव्यादाम्रैव किम्भक्षा हिंसाशीलाश्च पुत्रक।<br>मैवं कार्षीर्न ते वृत्तिरेवं दृष्टा महात्मना॥ १०<br>स्वयम्भुवा यथाऽऽदिष्टा त्यक्तव्या यदि नो भवेत्।<br>आश्रमान्तरजं कर्म न कुर्युर्गृहिणस्तु तत्॥ ११<br>हित्वा मनुष्यभावं च कर्मभिर्विविधैश्चर।<br>यत्त्वमेवं विमार्गस्थो मनुष्याजात एव च॥ १२<br>यथावद् विविधं तेषां कर्म तज्जातिसंश्रयम्।<br>मयापि विहितं पश्य कर्मैतन्नात्र संशयः॥ १३ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पिंगलको जिस प्रकार गणेशत्व, लोकोंके लिये अन्नदत्व और वाराणसी-जैसा स्थान प्राप्त हुआ था वह प्रसङ्ग बतला रहा हूँ, सुनिये। प्राचीनकालमें हरिकेश नामसे विख्यात एक सौन्दर्यशाली यक्ष हो गया है, जो पूर्णभद्रका पुत्र था। वह महाप्रतापी, ब्राह्मणभक्त और धर्मात्मा था। जन्मसे ही उसकी शंकरजीमें प्रगाढ़ भक्ति थी। वह तन्मय होकर उन्हींको नमस्कार करनेमें, उन्हींकी भक्ति करनेमें और उन्हींके ध्यानमें तत्पर रहता था। वह बैठते, सोते, चलते, खड़े होते, घूमते तथा खाते-पीते समय सदा शिवजीके ध्यानमें ही मग्न रहता था। इस प्रकार शंकरजीमें लीन मनवाले उससे उसके पिता पूर्णभद्रने कहा—'पुत्र! मैं तुम्हें अपना पुत्र नहीं मानता। ऐसा प्रतीत होता है कि तुम अन्यथा ही उत्पन्न हुए हो; क्योंकि यक्षकुलमें उत्पन्न होनेवालोंका ऐसा आचरण नहीं होता। तुम गुह्यक* हो। राक्षस ही स्वभावसे क्रूर चित्तवाले, मांसभक्षी, सर्वभक्षी और हिंसापरायण होते हैं। महात्मा ब्रह्माद्वारा ऐसा ही निर्देश दिया गया है। तुम ऐसा मत करो; क्योंकि तुम्हारे लिये ऐसी वृत्ति नहीं बतलायी गयी है। गृहस्थ भी अन्य आश्रमोंका कर्म नहीं करते। इसलिये तुम मनुष्यभावका परित्याग करके यक्षोंके अनुकूल विविध कर्मोंका आचरण करो। यदि तुम इस प्रकार विमार्गपर ही स्थित रहोगे तो मनुष्यसे उत्पन्न हुआ ही समझे जाओगे। अतः तुम यक्षजातिके अनुकूल विविध कर्मोंका ठीक-ठीक आचरण करो। देखो, मैं भी निःसंदेह वैसा ही आचरण कर रहा हूँ॥ ४-१३॥ | | सूत उवाच<br><br>एवमुक्त्वा स तं पुत्रं पूर्णभद्रः प्रतापवान्।<br>उवाच निष्क्रम क्षिप्रं गच्छ पुत्र यथेच्छसि॥ १४<br>ततः स निर्गतस्त्यक्त्वा गृहं सम्बन्धिनस्तथा।<br>वाराणसीं समासाद्य तपस्तेपे सुदुष्करम्॥ १५<br>स्थाणुभूतो ह्यनिमिषः शुष्ककाष्ठोपलोपमः।<br>संनियम्येन्द्रियग्राममवातिष्ठत निश्चलः॥ १६<br>अथ तस्यैवमनिशं तत्परस्य तदाशिषः।<br>सहस्त्रमेकं वर्षाणां दिव्यमप्यभ्यवर्तत॥ १७<br>वल्मीकेन समाक्रान्तो भक्ष्यमाणः पिपीलिकैः।<br>वज्रसूचीमुखैस्तीक्ष्णैर्विध्यमानस्तथैव च॥ १८ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! प्रतापी पूर्णभद्रने अपने उस पुत्रसे इस प्रकार (कहा; किंतु जब उसपर कोई प्रभाव पड़ते नहीं देखा, तब वह पुनः कुपित होकर) बोला—'पुत्र! तुम शीघ्र ही मेरे घरसे निकल जाओ और जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहाँ चले जाओ।' तब वह हरिकेश गृह तथा सम्बन्धियोंका त्याग कर निकल पड़ा और वाराणसीमें आकर अत्यन्त दुष्कर तपस्यामें संलग्न हो गया। वहाँ वह इन्द्रियसमुदायको संयमित कर सूखे काष्ठ और पत्थरकी भाँति निश्चल हो एकटक स्थाणु (ठूँठ)-की तरह स्थित हो गया। इस प्रकार निरन्तर तपस्यामें लगे रहनेवाले हरिकेशके एक सहस्र दिव्य वर्ष व्यतीत हो गये। उसके शरीरपर बामवट जम गयी। वज्रके समान कठोर और सूई-जैसे पतले एवं तीखे मुखवाली चींटियोंने उसमें छेद कर उसे खा डाला। |


* अमर, व्याडि, हलायुध आदि कोशों एवं भारतादि प्रायः सभी ग्रन्थोंमें यक्षोंकी निधिरक्षक श्रेणीको ही गुह्यक कहा गया है—'निधिं गृह्णन्ति ये यक्षास्ते स्युर्गुह्यकसंज्ञकाः।'

७४६* मत्स्यपुराण *

| निर्मांसरुधिरत्वक् च कुन्दशङ्खेन्दुसप्रभः।<br>अस्थिशेषोऽभवच्छर्वं देवं वै चिन्तयन्नपि॥ १९<br><br>एतस्मिन्नन्तरे देवी व्यज्ञापयत शङ्करम्॥ २० | इस प्रकार वह मांस, रुधिर और चमड़ेसे रहित हो अस्थिमात्र अवशेष रह गया, जो कुन्द, शङ्ख और चन्द्रमाके समान चमक रहा था। इतनेपर भी वह भगवान् शंकरका ध्यान कर ही रहा था। इसी बीच पार्वती देवीने भगवान् शंकरसे निवेदन किया॥ १४—२०॥ | | देव्युवाच<br>उद्यानं पुनरेवेदं द्रष्टुमिच्छामि सर्वदा।<br>क्षेत्रस्य देव माहात्म्यं श्रोतुं कौतूहलं हि मे।<br>यतश्च प्रियमेतत् ते तथास्य फलमुत्तमम्॥ २१<br>इति विज्ञापितो देवः शर्वाण्या परमेश्वरः।<br>सर्वं पृष्टं ते यथातथ्यमाख्यातुमुपचक्रमे॥ २२<br>निर्जगाम च देवेशः पार्वत्या सह शङ्करः।<br>उद्यानं दर्शयामास देव्या देवः पिनाकधृक्॥ २३ | देवीने कहा— देव! मैं इस उद्यानको पुनः देखना चाहती हूँ। साथ ही इस क्षेत्रका माहात्म्य सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है; क्योंकि यह आपको परम प्रिय है और इसके श्रवणका फल भी उत्तम है। इस प्रकार भवानीद्वारा निवेदन किये जानेपर परमेश्वर शंकर प्रश्नानुसार सारा प्रसंग यथार्थरूपसे कहनेके लिये उद्यत हुए। तदनन्तर पिनाकधारी देवेश्वर भगवान् शंकर पार्वतीके साथ वहाँसे चल पड़े और देवीको उस उद्यानका दर्शन कराते हुए बोले॥ २१—२३॥ | | देवदेव उवाच<br>प्रोत्फुल्लनानाविधगुल्मशोभितं<br>लताप्रतानावनतं मनोहरम्।<br>विरूढपुष्पैः परितः प्रियङ्गुभिः<br>सुपुष्पितैः कण्टकितैश्च केतकैः॥ २४<br>तमालगुल्मैर्निचितं सुगन्धिभिः<br>सकर्णिकारैर्बकुलैश्च सर्वशः।<br>अशोकपुन्नागवरैः सुपुष्पितै-<br>र्द्विरेफमालाकुलपुष्पसञ्चयैः ॥ २५<br>क्वचित् प्रफुल्लाम्बुजरेणूरूषितै-<br>र्विहङ्गमैश्चारुकलप्रणादिभिः ।<br>विनादितं सारसमण्डनादिभिः<br>प्रमत्तदात्यूहरुतैश्च वल्गुभिः॥ २६<br>क्वचिच्च चक्राह्वरवोपनादितं<br>क्वचिच्च कादम्बकदम्बकैर्युतम्।<br>क्वचिच्च कारण्डवनादनादितं<br>क्वचिच्च मत्तालिकुलाकुलीकृतम्॥ २७<br>मदाकुलाभिस्त्वमराङ्गनाभि-<br>र्निषेवितं चारुसुगन्धिपुष्पम् ।<br>क्वचित् सुपुष्पैः सहकारवृक्षै-<br>र्लतोपगूढैस्तिलकद्रुमैश्च ॥ २८ | देवाधिदेव शंकरने कहा— प्रिये! यह उद्यान खिले हुए नाना प्रकारके गुल्मोंसे सुशोभित है। यह लताओंके विस्तारसे अवनत होनेके कारण मनोहर लग रहा है। इसमें चारों ओर पुष्पोंसे लदे हुए प्रियङ्गुके तथा भली-भाँति खिली हुई कँटीली केतकीके वृक्ष दीख रहे हैं। यह सब ओर तमालके गुल्मों, सुगन्धित कनेर और मौलसिरी तथा फूलोंसे लदे हुए अशोक और पुंनागके उत्तम वृक्षोंसे, जिसके पुष्पोंपर भ्रमरसमूह गुञ्जार कर रहे हैं, व्याप्त है। कहीं पूर्णरूपसे खिले हुए कमलके परागसे धूसरित अङ्गवाले पक्षी सुन्दर कलनाद कर रहे हैं, कहीं सारसोंका दल बोल रहा है। कहीं मतवाले चातकोंकी मधुर बोली सुनायी पड़ रही है। कहीं चक्रवाकोंका शब्द गूँज रहा है। कहीं यूथ-के-यूथ कलहंस विचर रहे हैं। कहीं बतखोंके नादसे निनादित हो रहा है। कहीं झुंड-के-झुंड मतवाले भौंरे गुनगुना रहे हैं। कहीं मदसे मतवाली हुई देवाङ्गनाएँ सुन्दर एवं सुगन्धित पुष्पोंका सेवन कर रही हैं। कहीं सुन्दर पुष्पोंसे आच्छादित आमके वृक्ष और लताओंसे आच्छादित तिलकके वृक्ष शोभा पा रहे हैं। |

१८२- अविमुक्त-माहात्म्य

* अध्याय १८० *७४७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रगीतविद्याधरसिद्धचारणं<br>प्रमत्तनृत्याप्सरसां गणाकुलम् ।<br>प्रहृष्टनानाविधपक्षिसेवितं<br>प्रमत्तहारीतकुलोपनादितम् ॥ २९<br>मृगेन्द्रनादाकुलसत्त्वमानसैः<br>क्वचित्क्वचिद्द्वन्द्वकदम्बकैर्मृगैः ।<br>प्रफुल्लनानाविधचारुपङ्कजैः<br>सरस्तटाकैरुपशोभितं क्वचित् ॥ ३०कहीं विद्याधर, सिद्ध और चारण राग अलाप रहे हैं तो कहीं अप्सराओंका दल उन्मत्त होकर नाच रहा है। इसमें नाना प्रकारके पक्षी प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं। यह मतवाले हारीतसमूहसे निनादित है। कहीं-कहीं झुंड-के-झुंड मृगके जोड़े सिंहकी दहाड़से व्याकुल मनवाले होकर इधर-उधर भाग रहे हैं। कहीं ऐसे तालाब शोभा पा रहे हैं, जिनके तटपर नाना प्रकारके सुन्दर कमल खिले हुए हैं॥ २४—३०॥
निबिडनिचुलनीलं नीलकण्ठाभिरामं<br>मदमुदितविहङ्गव्रातनादाभिरामम् ।<br>कुसुमिततरुशाखालीनमत्तद्विरेफं<br>नवकिसलयशोभाशोभितप्रान्तशाखम् ॥ ३१यह घने बेंतकी लताओं एवं नीलमयूरोंसे सुशोभित और मदसे उन्मत्त हुए पक्षिसमूहोंके नादसे मनोरम लग रहा है। इसके खिले हुए वृक्षोंकी शाखाओंमें मतवाले भौंरे छिपे हुए हैं और उन शाखाओंके प्रान्तभाग नये किसलयोंकी शोभासे सुशोभित हैं।
क्वचिच्च दन्तिक्षतचारुवीरुधं<br>क्वचिल्लतालिङ्गितचारुवृक्षकम् ।<br>क्वचिद्विलासालसगामिबर्हिणं<br>निषेवितं किम्पुरुषव्रजैः क्वचित् ॥ ३२कहीं सुन्दर वृक्ष हाथियोंके दाँतोंसे क्षत-विक्षत हो गये हैं। कहीं लताएँ मनोहर वृक्षोंका आलिङ्गन कर रही हैं। कहीं भोगसे अलसाये हुए मयूरगण मन्दगतिसे विचरण कर रहे हैं। कहीं किम्पुरुषगण निवास कर रहे हैं।
पारावतध्वनिविकूजितचारुशृङ्गै-<br>रभ्रंकषैः सितमनोहरचारुरूपैः ।<br>आकीर्णपुष्यनिकुरम्बविमुक्तहासै-<br>र्विभ्राजितं त्रिदशदेवकुलैरनेकैः ॥ ३३जो कबूतरोंकी ध्वनिसे निनादित हो रहे थे, जिनका उज्ज्वल मनोहर रूप है, जिनपर बिखरे हुए पुष्पसमूह हासकी छटा दिखा रहे हैं और जिनपर अनेकों देवकुल निवास कर रहे हैं, उन गगनचुम्बी मनोहर शिखरोंसे सुशोभित हो रहा है।
फुल्लोत्पलागुरुसहस्रवितानयुक्तै-<br>स्तोयाशयैः समनुशोभितदेवमार्गम् ।<br>मार्गान्तरागलितपुष्यविचित्रभक्ति-<br>सम्बद्धगुल्मविटपैर्विहगैरुपेतम् ॥ ३४खिले हुए कमल और अगुरुके सहस्रों वितानोंसे युक्त जलाशयोंसे जिसका देवमार्ग सुशोभित हो रहा है। उन मार्गोंपर पुष्प बिखरे हुए हैं और वह विचित्र भक्तिसे युक्त पक्षियोंसे सेवित गुल्मों और वृक्षोंसे युक्त है।
तुङ्गाग्रैर्नीलपुष्यस्तबकभरनतप्रान्तशाखैरशोकै-<br>र्मत्तालिवातगीतश्रुतिसुखजननैर्भासितान्तर्मनोज्ञैः ।<br>रात्रौ चन्द्रस्य भासा कुसुमिततिलकैरेकतां सम्प्रयातं<br>छायासुमप्रबुद्धस्थितहरिणकुलालुमद्भाङ्कुराग्रम् ॥ ३५जिनके अग्रभाग ऊँचे हैं, जिनकी शाखाओंका प्रान्तभाग नीले पुष्पोंके गुच्छोंके भारसे झुके हुए हैं तथा जिनकी शाखाओंके अन्तर्भागमें लीन मतवाले भ्रमरसमूहोंकी श्रवण-सुखदायिनी मनोहर गीत हो रही है, ऐसे अशोकवृक्षोंसे युक्त है। रात्रिमें यह अपने खिले हुए तिलक-वृक्षोंसे चन्द्रमाकी चाँदनीके साथ एकताको प्राप्त हो जाता है। कहीं वृक्षोंकी छायामें सोये हुए, सोकर जगे हुए तथा बैठे हुए हरिणसमूहोंद्वारा काटे गये दूर्वाङ्कुरोंके अग्रभागसे युक्त

७४८ * मत्स्यपुराण *


संस्कृतहिन्दी अर्थ
हंसानां पक्षपातप्रचलितकमलस्वच्छविस्तीर्णतोयं<br>तोयानां तीरजातप्रविकचकदलीवाटनृत्यन्मयूरम्।<br>मायूरैः पक्षचन्द्रैः क्वचिदपि पतितै रञ्जितक्ष्माप्रदेशं<br>देशे देशे विकीर्णप्रमुदितविलसन्मत्तहारीतवृक्षम्॥ ३६<br>सारङ्गैः क्वचिदपि सेवितप्रदेशं<br>संछन्नं कुसुमचयैः क्वचिद्विचित्रैः।<br>हृष्टाभिः क्वचिदपि किंनराङ्गनाभिः<br>क्षीबाभिः सुमधुरगीतवृक्षखण्डम्॥ ३७है। कहीं हंसोंके पंख हिलानेसे चञ्चल हुए कमलोंसे युक्त, निर्मल एवं विस्तीर्ण जलराशि शोभा पा रही है। कहीं जलाशयोंके तटपर उगे हुए फूलोंसे सम्पन्न कदलीके लतामण्डपोंमें मयूर नृत्य कर रहे हैं। कहीं झड़कर गिरे हुए चन्द्रकयुक्त मयूरोंके पंखोंसे भूतल अनुरञ्जित हो रहा है। जगह-जगह पृथक्-पृथक् यूथ बनाकर हर्षपूर्वक विलास करते हुए मतवाले हारीत पक्षियोंसे युक्त वृक्ष शोभा पा रहे हैं। किसी प्रदेशमें सारङ्ग जातिके मृग बैठे हुए हैं। कुछ भाग विचित्र पुष्पसमूहोंसे आच्छादित है। कहीं उन्मत्त हुई किंनराङ्गनाएँ हर्षपूर्वक सुमधुर गीत आलाप रही हैं, जिनसे वृक्षखण्ड मुखरित हो रहा है॥ ३१—३७॥
संसृष्टैः क्वचिदुपलिसकीर्णपुष्पै-<br>रावासैः परिवृतपादपं मुनीनाम्।<br>आमूलात् फलनिचितैः क्वचिद्विशालै-<br>रुत्तुङ्गैः पनसमहीरुहैरुपेतम्॥ ३८कहीं वृक्षोंके नीचे मुनियोंके आवासस्थल बने हैं, जिनकी भूमि लिपी-पुती हुई है और उनपर पुष्प बिखेरा हुआ है। कहीं जिनमें जड़से लेकर अन्ततक फल लदे हुए हैं, ऐसे विशाल एवं ऊँचे कटहलके वृक्षोंसे युक्त है।
फुल्लातिमुक्तकलतागृहसिद्धलीलं<br>सिद्धाङ्गनाकनकनूपुरनादरम्यम् ।<br>रम्यप्रियङ्गुतरुमञ्जरिसक्तभृङ्गं<br>भृङ्गावलीषु स्खलिताम्बुकदम्बपुष्पम्॥ ३९कहीं खिली हुई अतिमुक्तक लताके बने हुए सिद्धोंके गृह शोभा पा रहे हैं, जिनमें सिद्धाङ्गनाओंके स्वर्णमय नूपुरोंका सुरम्य नाद हो रहा है। कहीं मनोहर प्रियंगु वृक्षोंकी मंजरियोंपर भँवरे मँडरा रहे हैं। कहीं भ्रमर-समूहोंके पंखोंके आघातसे कदम्बके पुष्प नीचे गिर रहे हैं।
पुष्पोत्करानिलविधूर्णितपादपाग्र-<br>मग्रेसरो भुवि निपातितवंशगुल्मम्।<br>गुल्मान्तरप्रभृतिलीनमृगीसमूहं<br>सम्मुह्यतां तनुभृतामपवर्गदात् ॥ ४०कहीं पुष्पसमूहका स्पर्श करके बहती हुई वायु बड़े-बड़े वृक्षोंके ऊपरकी शाखाओंको झुका दे रही है, जिनके आघातसे बाँसोंके झुरमुट भूतलपर गिर जा रहे हैं। उन गुल्मोंके अन्तर्गत हरिणियोंका समूह छिपा हुआ है। इस प्रकार यह उपवन मोहग्रस्त प्राणियोंको मोक्ष प्रदान करनेवाला है।
चन्द्रांशुजालधवलैस्तिलकैर्मनोज्ञैः<br>सिन्दूरकुङ्कुमकुसुम्भनिभैरशोकैः ।<br>चामीकराभनिचयैरथ कर्णिकारैः<br>फुल्लारविन्दरचितं सुविशालशाखैः ॥ ४१यहाँ कहीं चन्द्रमाकी किरणों-सरीखे उज्ज्वल मनोहर तिलकके वृक्ष, कहीं सिंदूर, कुंकुम और कुसुम्भ-जैसे लाल रंगवाले अशोकके वृक्ष, कहीं स्वर्णके समान पीले एवं लम्बी शाखाओंवाले कनेरके वृक्ष और कहीं खिले हुए कमलके पुष्प शोभा पा रहे हैं।
क्वचिद्रजतपर्णाभैः क्वचिद्विद्रुमसन्निभैः।<br>क्वचित्काञ्चनसंकाशैः पुष्पैराचितभूतलम्॥ ४२इस उपवनकी भूमि कहीं चाँदीके पत्र-जैसे श्वेत, कहीं मूँगे-सरीखे लाल और कहीं स्वर्ण-सदृश पीले पुष्पोंसे आच्छादित है।
पुंनागेषु द्विजगणविरुतं<br>रक्ताशोकस्तबकभरनमितम् ।<br>रम्योपान्तश्रमहरपवनं<br>फुल्लाब्जेषु भ्रमरविलसितम्॥ ४३कहीं पुंनागके वृक्षोंपर पक्षिगण चहचहा रहे हैं। कहीं लाल अशोककी डालियाँ पुष्प-गुच्छोंके भारसे झुक गयी हैं। रमणीय एवं श्रमहारी पवन शरीरका स्पर्श करके बह रहा है। उत्फुल्ल कमलपुष्पोंपर भौंरें गुञ्जार कर रहे हैं।

१८३- अविमुक्तमाहात्म्यके प्रसङ्गमें शिव-पार्वतीका प्रश्नोत्तर

* अध्याय १८० *७४९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सकलभुवनभर्ता लोकनाथस्तदानीं<br>तुहिनशिखरिपुत्र्याः सार्द्धमिष्टैर्गणेशैः ।<br>विविधतरुविशालं मत्तहृष्टान्यपुष्ट-<br>मुपवनतरुरम्यं दर्शयामास देव्याः ॥ ४४इस प्रकार समस्त भुवनोंके पालक जगदीश्वर शंकरने अपने प्रिय गणेश्वरोंको साथ लेकर उस विविध प्रकारके विशाल वृक्षोंसे युक्त तथा उन्मत्त और हर्ष प्रदान करनेवाले उपवनको हिमालयकी पुत्री पार्वतीदेवीको दिखाया ॥ ३८—४४ ॥
देव्युवाच<br>उद्यानं दर्शितं देव शोभया परया युतम् ।<br>क्षेत्रस्य तु गुणान् सर्वान् पुनर्वक्तुमिहार्हसि ॥ ४५<br>अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्यमविमुक्तस्य तत्त्वतः ।<br>श्रुत्वापि हि न मे तृप्तिरतो भूयो वदस्व मे ॥ ४६देवीने पूछा— देव! अनुपम शोभासे युक्त इस उद्यानको तो आपने दिखला दिया। अब आप पुनः इस क्षेत्रके सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन कीजिये। इस क्षेत्रका तथा अविमुक्तका माहात्म्य सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हो रही है, अतः आप पुनः मुझसे वर्णन कीजिये ॥ ४५-४६ ॥
देवदेव उवाच<br>इदं गुह्यतमं क्षेत्रं सदा वाराणसी मम ।<br>सर्वेषामेव भूतानां हेतुर्मोक्षस्य सर्वदा ॥ ४७<br>अस्मिन् सिद्धाः सदा देवि मदीयं व्रतमास्थिताः ।<br>नानालिङ्गधरा नित्यं मम लोकाभिकाङ्क्षिणः ॥ ४८<br>अभ्यस्यन्ति परं योगं मुक्तात्मानो जितेन्द्रियाः ।<br>नानावृक्षसमाकीर्णे नानाविहगकूजिते ॥ ४९<br>कमलोत्पलपुष्पाढ्यैः सरोभिः समलङ्कृते ।<br>अप्सरोगणगन्धर्वैः सदा संसेविते शुभे ॥ ५०<br>रोचते मे सदा वासो येन कार्येण तच्छृणु ।<br>मन्मना मम भक्तश्च मयि सर्वार्पितक्रियः ॥ ५१<br>यथा मोक्षमिहाप्नोति ह्यान्यत्र न तथा क्वचित् ।<br>एतन्मम पुरं दिव्यं गुह्याद् गुह्यतरं महत् ॥ ५२<br>ब्रह्मादयस्तु जानन्ति येऽपि सिद्धा मुमुक्षवः ।<br>अतः प्रियतमं क्षेत्रं तस्माच्चेह रतिर्मम ॥ ५३<br>विमुक्तं न मया यस्मान्मोक्ष्यते वा कदाचन ।<br>महत् क्षेत्रमिदं तस्मादविमुक्तमिदं स्मृतम् ॥ ५४<br>नैमिषेऽथ कुरुक्षेत्रे गङ्गाद्वारे च पुष्करे ।<br>स्नानात् संसेविताद् वापि न मोक्षः प्राप्यते यतः ॥ ५५<br>इह सम्प्राप्यते येन तत एतद् विशिष्यते ।<br>प्रयागे च भवेन्मोक्ष इह वा मत्परिग्रहात् ॥ ५६देवाधिदेव शंकर बोले— देवि! मेरा यह वाराणसी क्षेत्र परम गुह्य है। यह सर्वदा सभी प्राणियोंके मोक्षका कारण है। देवि! इस क्षेत्रमें नाना प्रकारका स्वरूप धारण करनेवाले नित्य मेरे लोकके अभिलाषी मुक्तात्मा जितेन्द्रिय सिद्धगण मेरा व्रत धारण कर परम योगका अभ्यास करते हैं। अब इस नाना प्रकारके वृक्षोंसे व्याप्त, अनेकविध पक्षियोंद्वारा निनादित, कमल और उत्पलके पुष्पोंसे भरे हुए सरोवरोंसे सुशोभित और अप्सराओं तथा गन्धर्वोंद्वारा सदा संसेवित इस शुभमय उपवनमें जिस हेतुसे मुझे सदा निवास करना अच्छा लगता है, उसे सुनो। मेरा भक्त मुझमें मन लगाकर और सारी क्रियाएँ मुझमें समर्पित कर इस क्षेत्रमें जैसी सुगमतासे मोक्ष प्राप्त कर सकता है, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं प्राप्त कर सकता। यह मेरी महान् दिव्य नगरी गुह्यसे भी गुह्यतर है। ब्रह्मा आदि जो सिद्ध मुमुक्षु हैं, वे इसके विषयमें पूर्णरूपसे जानते हैं। अतः यह क्षेत्र मुझे परम प्रिय है और इसी कारण इसके प्रति मेरी विशेष रति है। चूँकि मैं कभी भी इस विमुक्त क्षेत्रका त्याग नहीं करता, इसलिये यह महान् क्षेत्र अविमुक्त नामसे कहा जाता है। नैमिष, कुरुक्षेत्र, गङ्गाद्वार और पुष्करमें निवास करने तथा स्नान करनेसे यदि मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती तो इस क्षेत्रमें वह प्राप्त हो जाता है, इसीलिये यह उनसे विशिष्ट है। प्रयागमें अथवा मेरा आश्रय ग्रहण करनेसे काशीमें मोक्ष प्राप्त हो जाता है ॥ ४७—५६ ॥