भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 745
* अध्याय १७८ *७३५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दीप्ताग्निसदृशं घोरं दर्शनेन सुदर्शनम्।<br>सुवर्णरेणुपर्यन्तं वज्रनाभं भयावहम्॥ ४०<br><br>मेदोऽस्थिमज्जारुधिरैः सिक्तं दानवसम्भवैः।<br>अद्वितीयप्रहरणं क्षुरपर्यन्तमण्डलम्॥ ४१<br><br>स्रग्दाममालाविततं कामगं कामरूपिणम्।<br>स्वयं स्वयम्भुवा सृष्टं भयदं सर्वविद्विषाम्॥ ४२<br><br>महर्षिरोषैराविष्टं नित्यमाहवदर्पितम्।<br>क्षेपणाद् यस्य मुह्यन्ति लोकाः स्थाणुजङ्गमाः॥ ४३<br><br>क्रव्यादानि च भूतानि तृप्तिं यान्ति महामृधे।<br>तदप्रतिमकर्म्मोग्रं समानं सूर्यवर्चसा॥ ४४विनाशक था। वह प्रज्वलित अग्निकी तरह भयंकर होनेपर भी देखनेमें परम सुन्दर था। सुवर्णकी रेणुकासे धूसरित, वज्रकी नाभिसे युक्त और अत्यन्त भयानक था। वह दानवोंके शरीरसे निकले हुए मेदा, अस्थि, मज्जा और रुधिरसे चुपड़ा हुआ था। वह अपने ढंगका अकेला ही अस्त्र था। उसके चारों ओर खुरे लगे हुए थे। वह माला और हारसे विभूषित था। वह अभीप्सित स्थानपर जानेवाला तथा स्वेच्छानुकूल रूप धारण करनेवाला था। स्वयं ब्रह्माने उसकी रचना की थी। वह सम्पूर्ण शत्रुओंके लिये भयदायक था तथा महर्षिके क्रोधसे परिपूर्ण और नित्य युद्धमें गर्वीला बना रहता था। उसका प्रयोग करनेसे स्थावर-जङ्गमसहित सभी प्राणी मोहित हो जाते हैं तथा महासमरमें मांसभोजी जीव तृप्तिको प्राप्त होते हैं। वह अनुपम कर्म करनेवाला, भयंकर और सूर्यके समान तेजस्वी था॥ ३७—४४॥
चक्रमुद्यम्य समरे क्रोधदीप्तो गदाधरः।<br>स मुष्णन् दानवं तेजः समरे स्वेन तेजसा॥ ४५<br><br>चिच्छेद बाहूंश्चक्रेण श्रीधरः कालनेमिनः।<br>तस्य वक्त्रशतं घोरं साग्निपूर्णाट्टहासिवै॥ ४६<br><br>तस्य दैत्यस्य चक्रेण प्रमथ्य बलाद्धरिः।<br>स च्छिन्नबाहुर्विशिरा न प्राकम्पत दानवः॥ ४७<br><br>कबन्धोऽवस्थितः संख्ये विशाख इव पादपः।<br>संवितत्य महापक्षाै वायोः कृत्वा समं जवम्॥ ४८<br><br>उरसा पातयामास गरुडः कालनेमिनम्।<br>स तस्य देहो विमुखो विबाहुश्च परिभ्रमन्॥ ४९<br><br>निपपात दिवं त्यक्त्वा क्षोभयन् धरणीतलम्।<br>तस्मिन् निपतिते दैत्ये देवाः सर्षिगणास्तदा॥ ५०<br><br>साधुसाध्विति वैकुण्ठं समेताः प्रत्यपूजयन्।<br>अपरे ये तु दैत्याश्च युद्धे दृष्टपराक्रमाः॥ ५१<br><br>ते सर्वे बाहुभिर्व्याप्ता न शेकुश्चलितुं रणे।<br>कांश्चित् केशेषु जग्राह कांश्चित् कण्ठेषु पीडयन्॥ ५२क्रोधसे उद्दीप्त हुए भगवान् गदाधरने समरभूमिमें उस चक्रको उठाकर अपने तेजसे दानवके तेजको नष्ट कर दिया और फिर उन श्रीधरने चक्रद्वारा कालनेमिकी भुजाओंको काट डाला। तत्पश्चात् श्रीहरिने उस दैत्यके सौ मुखोंको, जो भयंकर, अग्निके समान तेजस्वी और अट्टहास कर रहे थे, बलपूर्वक चक्रके प्रहारसे काट डाला। इस प्रकार भुजाओं और सिरोंके कट जानेपर भी वह दानव विचलित नहीं हुआ, अपितु युद्धभूमिमें शाखाओंसे हीन वृक्षकी तरह कबन्धरूपसे स्थित रहा। तब गरुड़ने अपने विशाल पंखोंको फैलाकर और वायुके समान वेग भरकर अपनी छातीके धक्केसे कालनेमिके कबन्धको धराशायी कर दिया। मुखों और भुजाओंसे हीन उसका वह शरीर चक्कर काटता हुआ स्वर्गलोकको छोड़कर भूतलको क्षुब्ध करता हुआ नीचे गिर पड़ा। उस दैत्यके गिर जानेपर ऋषियोंसहित देवगणोंने उस समय संगठित होकर भगवान् विष्णुको साधुवाद देते हुए उनकी पूजा की। दूसरे दैत्यगण, जो युद्धमें भगवान्‌के पराक्रमको देख चुके थे, वे सभी भगवान्‌की भुजाओंके वशीभूत हो रणभूमिमें चलने-फिरनेमें भी असमर्थ थे। भगवान्‌ने किन्हींको केश पकड़कर पटक दिया तो किन्हींको गला घोंटकर मार डाला।