भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७३६* मत्स्यपुराण *

| चकर्ष कस्यचिद् वक्त्रं मध्ये गृह्यादथापरम्।<br>ते गदाचक्रनिर्दग्धा गतसत्त्वा गतासवः॥ ५३<br>गगनाद् भ्रष्टसर्वाङ्गा निपेतुर्धरणीतले।<br>तेषु दैत्येषु सर्वेषु हतेषु पुरुषोत्तमः॥ ५४<br>तस्थौ शक्रप्रियं कृत्वा कृतकर्मा गदाधरः। | किसीका मुख फाड़ दिया तो दूसरेकी कमर तोड़ दी। इस प्रकार वे सभी गदाकी चोट और चक्रसे जल चुके थे, उनके पराक्रम नष्ट हो गये थे और शरीरके सभी अङ्ग चूर-चूर हो गये थे। वे प्राणरहित होकर आकाशसे भूतलपर गिर पड़े। इस प्रकार उन सभी दैत्योंके मारे जानेपर पुरुषोत्तम भगवान् गदाधर इन्द्रका प्रिय कार्य करके कृतार्थ हो शान्तिपूर्वक स्थित हुए॥ ४५–५४ १/२ ॥ | | तस्मिन् विमर्दे संग्रामे निवृत्ते तारकामये॥ ५५<br>तं देशमाजगामाशु ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>सर्वैर्ब्रह्मर्षिभिः सार्धं गन्धर्वाप्सरसां गणैः॥ ५६<br>देवदेवो हरिं देवं पूजयन् वाक्यमब्रवीत्।<br>कृतं देव महत् कर्म सुराणां शल्यमुद्धृतम्।<br>वधेनानेन दैत्यानां वयं च परितोषिताः॥ ५७<br>योऽयं त्वया हतो विष्णो कालनेमी महासुरः।<br>त्वमेकोऽस्य मृधे हन्ता नान्यः कश्चन विद्यते॥ ५८<br>एष देवान् परिभवँल्लोकांश्च ससुरासुरान्।<br>ऋषीणां कदनं कृत्वा मामपि प्रति गर्जति॥ ५९<br>तदनेन तवाग्र्येण परितुष्टोऽस्मि कर्मणा।<br>यदयं कालकल्पस्तु कालनेमी निपातितः॥ ६०<br>तदागच्छस्व भद्रं ते गच्छामः दिवमुत्तमम्।<br>ब्रह्मर्षयस्त्वां तत्रस्थाः प्रतीक्षन्ते सदोगताः॥ ६१<br>कं चाहं तव दास्यामि वरं वरवतां वर।<br>सुरेष्वथ च दैत्येषु वराणां वरदो भवान्॥ ६२<br>निर्यात्यैतत् त्रैलोक्यं स्फीतं निहतकण्टकम्।<br>अस्मिन्नेव मृधे विष्णो शक्राय सुमहात्मने॥ ६३<br>एवमुक्तो भगवता ब्रह्मणा हरिरव्ययः।<br>देवाञ्शक्रमुखान् सर्वानुवाच शुभया गिरा॥ ६४ | तदनन्तर उस भयानक तारकामय संग्रामके निवृत्त होनेपर लोकपितामह ब्रह्मा तुरंत ही उस स्थानपर आये। उस समय उनके साथ सभी ब्रह्मर्षि थे तथा गन्धर्वों एवं अप्सराओंका समुदाय भी था। तब देवाधिदेव ब्रह्माने भगवान् श्रीहरिका आदर करते हुए इस प्रकार कहा—'देव! आपने बहुत बड़ा काम किया है। आपने तो देवताओंका काँटा ही उखाड़ दिया। दैत्योंके इस संहारसे हमलोग परम संतुष्ट हैं। विष्णो! आपने जो इस महान् असुर कालनेमिका वध किया है, यह आपके ही योग्य है; क्योंकि एकमात्र आप ही रणभूमिमें इसके वधकर्ता हैं, दूसरा कोई नहीं है। यह दानव देवताओं और असुरोंसहित समस्त लोकों और देवताओंको तिरस्कृत करते हुए ऋषियोंका संहार कर मेरे पास भी आकर गर्जता था। इसलिये जो यह कालके समान भयंकर कालनेमि मारा गया, आपके इस श्रेष्ठ कर्मसे मैं भलीभाँति संतुष्ट हूँ। अतः आपका कल्याण हो, आइये, अब हमलोग उत्तम स्वर्गलोकमें चलें। वहाँ सभामें बैठे हुए ब्रह्मर्षिगण आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। वरदानियोंमें श्रेष्ठ भगवन्! आप तो स्वयं ही देवताओं और दैत्योंके लिये श्रेष्ठ वरदायक हैं। ऐसी दशामें मैं आपको कौन-सा वर प्रदान करूँ? विष्णो! त्रिलोकीका यह समृद्धिशाली राज्य अब कण्टकरहित हो गया है, इसे आप इसी युद्धस्थलमें महात्मा इन्द्रको समर्पित कर दीजिये।' भगवान् ब्रह्माद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर अविनाशी श्रीहरि इन्द्र आदि सभी देवताओंसे मधुर वाणीमें बोले॥ ५५–६४॥ | | विष्णुरुवाच<br>शृण्वन्तु त्रिदशाः सर्वे यावन्तोऽत्र समागताः।<br>श्रवणावहितैः श्रोत्रैः पुरस्कृत्य पुरंदरम्॥ ६५<br>अस्माभिः समरे सर्वे कालनेमिमुखा हताः।<br>दानवा विक्रमोपेताः शक्रादपि महत्तराः॥ ६६<br>अस्मिन् महति संग्रामे दैतेयौ द्वौ विनिःसृतौ।<br>विरोचनश्च दैत्येन्द्रः स्वर्भानुश्च महाग्रहः॥ ६७ | **भगवान् विष्णुने कहा—**यहाँ आये हुए जितने देवता हैं, वे सभी इन्द्रको आगे करके सावधानीपूर्वक कान लगाकर मेरी बात सुनें। इस समरमें हमलोगोंने कालनेमि आदि सभी महान् पराक्रमी दानवोंको, जो इन्द्रसे भी बढ़कर बलशाली थे, मार डाला है; किंतु इस महान् संग्राममें दैत्येन्द्र विरोचन और महान् ग्रह राहु—ये दोनों दैत्य भाग निकले हैं। |