मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
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७४० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्खलन्ती दीर्घकेशी च सुचिरा सुन्दरी शुभा।<br>अयोमुखी कटुमुखी क्रोधनी च तथाशनी ॥ २९<br>कुटुम्बिका मुक्तिका च चन्द्रिका बलमोहिनी।<br>सामान्या हासिनी लम्बा कोविदारी समासवी ॥ ३०<br>शङ्कुकर्णी महानादा महादेवी महोदरी।<br>हुंकारी रुद्रसुसटा रुद्रेशी भूतडामरी ॥ ३१<br>पिण्डजिह्वा चलज्वाला शिवा ज्वालामुखी तथा।<br>एताश्चान्याश्च देवेशः सोऽसृजन्मातरस्तदा ॥ ३२<br>अन्धकानां महाघोराः पपुस्तद्रुधिरं तदा।<br>ततोऽन्धकासृजः सर्वाः परां तृप्तिमुपागताः ॥ ३३<br>तासु तृप्तासु सम्भूता भूय एवान्धकप्रजाः।<br>अर्दितस्तैर्महादेवः शूलमुद्गरपाणिभिः ॥ ३४<br>ततः स शङ्करो देवस्त्वन्धकैर्व्याकुलीकृतः।<br>जगाम शरणं देवं वासुदेवमजं विभुम् ॥ ३५<br>ततस्तु भगवान् विष्णुः सृष्टवान् शुष्करेवतीम्।<br>या पपौ सकलं तेषामन्धकानामसृक् क्षणात् ॥ ३६<br>यथा यथा च रुधिरं पिबन्त्यन्धकसम्भवम्।<br>तथा तथाधिकं देवी संशुष्यति जनाधिप ॥ ३७<br>पीयमाने तया तेषामन्धकानां तथासृजि।<br>अन्धकास्तु क्षयं नीताः सर्वे ते त्रिपुरारिणा ॥ ३८<br>मूलान्धकं तु विक्रम्य तदा शर्वस्त्रिलोकधृक्।<br>चकार वेगाच्छूलाग्रे स च तुष्टाव शङ्करम् ॥ ३९<br>अन्धकस्तु महावीर्यस्तस्य तुष्टोऽभवद् भवः।<br>सामीप्यं प्रददौ नित्यं गणेशत्वं तथैव च ॥ ४०<br>ततो मातृगणाः सर्वे शङ्करं वाक्यमब्रुवन्।<br>भगवन् भक्षयिष्यामः सदेवासुरमानुषान्।<br>त्वत्प्रसादाज्जगत्सर्वं तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ ४१ | स्खलन्ती, दीर्घकेशी, सुचिरा, सुन्दरी, शुभा, अयोमुखी, कटुमुखी, क्रोधनी, अशनी, कुटुम्बिका, मुक्तिका, चन्द्रिका, बलमोहिनी, सामान्या, हासिनी, लम्बा, कोविदारी, समासवी, शंकुकर्णी, महानादा, महादेवी, महोदरी, हुंकारी, रुद्रसुसटा, रुद्रेशी, भूतडामरी, पिण्डजिह्वा, चलज्वाला, शिवा तथा ज्वालामुखी। इनकी तथा इनके अतिरिक्त अन्यान्य मातृकाओंकी* देवेश्वर शंकरने उस समय सृष्टि की॥ ९–३२॥<br><br>तदनन्तर उत्पन्न हुई इन महाभयावनी मातृकाओंने अन्धकोंके रक्तको चूस लिया। इस प्रकार अन्धकोंके रक्तका पान करनेसे इन सबको परम तृप्तिका अनुभव हुआ। उनके तृप्त हो जानेके पश्चात् पुनः अन्धककी संतानें उत्पन्न हुई। उन्होंने हाथमें शूल और मुद्गर धारण करके पुनः महादेवजीको पीडित कर दिया। इस प्रकार जब अन्धकोंने भगवान् शंकरको व्याकुल कर दिया, तब वे सर्वव्यापी एवं अजन्मा भगवान् वासुदेवकी शरणमें गये। तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने शुष्करेवती नामवाली एक देवीको प्रकट किया, जिसने क्षणमात्रमें ही उन अन्धकोंके सम्पूर्ण रक्तको चूस लिया। जनेश्वर! वह देवी ज्यों-ज्यों अन्धकोंके शरीरसे निकले हुए रुधिरको पीती जाती थी, त्यों-त्यों वह अधिक क्षुधित एवं पिपासित होती जाती थी। इस प्रकार जब उस देवीद्वारा उन अन्धकोंका रक्त पान कर लिया गया, तब त्रिपुरारि शंकरने उन सभी अन्धकोंको कालके हवाले कर दिया। फिर त्रिलोकीको धारण करनेवाले भगवान् शंकरने जब वेगपूर्वक पराक्रम प्रकट करके प्रधान अन्धकको अपने त्रिशूलके अग्रभागका लक्ष्य बनाया, तब वह महापराक्रमी अन्धक शंकरजीकी स्तुति करने लगा। उसके स्तवन करनेसे भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये, तब उन्होंने उसे अपना नित्य सामीप्य तथा गणेशत्वका पद प्रदान कर दिया। यह देखकर सभी मातृकाएँ शंकरजीसे इस प्रकार बोलीं—‘भगवन्! हमलोग आपकी कृपासे देवता, असुर और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण जगत्को खा जाना चाहती हैं, इसके लिये आप हमलोगोंको आज्ञा देनेकी कृपा करें'॥ ३३—४१॥ |
* अन्धकका वृत्तान्त शिव, सौरादि प्रायः दस पुराणोंमें भी है। पर इतनी संख्यामें मातृकाओंका वर्णन अन्यत्र कहीं नहीं आया है।