भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 751

* अध्याय १७९ * <span style="float: right;">७४१</span>


शङ्कर उवाच
भवतीभिः प्रजाः सर्वा रक्षणीया न संशयः।<br>तस्माद् घोरादभिप्रायान्मनः शीघ्रं निवर्त्यताम्॥ ४२<br><br>इत्येवं शंकरेणोक्तमनादृत्य वचस्तदा।<br>भक्षयामासुरुत्युग्रास्त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ ४३<br><br>त्रैलोक्ये भक्ष्यमाणे तु तदा मातृगणेन वै।<br>नृसिंहमूर्तिं देवेशं प्रदध्यौ भगवान्शिवः॥ ४४<br><br>अनादिनिधनं देवं सर्वलोकभवोद्भवम्।<br>दैत्येन्द्रवक्षोरुधिरचर्चिताग्रमहानखम् ॥ ४५<br><br>विद्युज्जिह्वं महादंष्ट्रं स्फुरत्केसरकण्ठकम्।<br>कल्पान्तमारुतक्षुब्धं सप्तार्णवसमस्वनम्॥ ४६<br><br>वज्रतीक्ष्णनखं घोरमाकर्णव्यादिताननम्।<br>मेरुशैलप्रतीकाशमुदयार्कसमेक्षणम् ॥ ४७<br><br>हिमाद्रिशिखराकारं चारुदंष्ट्रोज्ज्वलाननम्।<br>नखनिःसृतरोषाग्निज्वालाकेसरमालिनम् ॥ ४८<br><br>बद्धाङ्गदं सुमुकुटं हारकेयूरभूषणम्।<br>श्रोणीसूत्रेण महता काञ्चनेन विराजितम्॥ ४९<br><br>नीलोत्पलदलश्यामं वासोयुगविभूषणम्।<br>तेजसाक्रान्तसकलब्रह्माण्डागारसङ्कुलम् ॥ ५०<br><br>पवनभ्राम्यमाणानां हुतहव्यवहार्चिषाम्।<br>आवर्तसदृशाकारैः संयुक्तं देहलोमजैः॥ ५१<br><br>सर्वपुष्पविचित्रां च धारयन्तं महास्रजम्।<br>स ध्यातमात्रो भगवान् प्रददौ तस्य दर्शनम्॥ ५२<br><br>यादृशेनैव रूपेण ध्यातो रुद्रेण धीमता।<br>तादृशेनैव रूपेण दुर्निरीक्ष्येण दैवतैः॥ ५३<br><br>प्रणिपत्य तु देवेशं तदा तुष्टाव शङ्करः॥ ५४**शंकरजीने कहा—**देवियो! आपलोगोंको तो निःसंदेह सभी प्रजाओंकी रक्षा करनी चाहिये, अतः आपलोग शीघ्र ही उस घोर अभिप्रायसे अपने मनको लौटा लें। इस प्रकार शंकरजीद्वारा कहे गये वचनकी अवहेलना करके वे अत्यन्त निष्ठुर मातृकाएँ चराचरसहित त्रिलोकीको भक्षण करने लगीं। तब मातृकाओंद्वारा त्रिलोकीको भक्षित होते हुए देखकर भगवान् शिवने उन नृसिंहमूर्ति भगवान् विष्णुका ध्यान किया, जो आदि-अन्तसे रहित और सभी लोकोंके उत्पादक हैं, जिनके विशाल नखोंका अग्रभाग दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपुके वक्षःस्थलके रुधिरसे चर्चित है, जिनकी जीभ बिजलीकी तरह लपलपाती रहती है और दाढ़ें विशाल हैं, जिनके कंधेके बाल हिलते रहते हैं, जो प्रलयकालीन वायुकी तरह क्षुब्ध और सप्तार्णवकी भाँति गर्जना करनेवाले हैं, जिनके नख वज्र-सदृश तीक्ष्ण हैं, जिनकी आकृति भयंकर है, जिनका मुख कानतक फैला हुआ है, जो सुमेरु पर्वतके समान चमकते रहते हैं, जिनके नेत्र उदयकालीन सूर्य-सरीखे उद्दीप्त हैं, जिनकी आकृति हिमालयके शिखर-जैसी है, जिनका मुख सुन्दर उज्ज्वल दाढ़ोंसे विभूषित है, जो नखोंसे निकलती हुई क्रोधाग्निकी ज्वालारूपी केसरसे युक्त रहते हैं, जिनकी भुजाओंपर अङ्गद बँधा रहता है, जो सुन्दर मुकुट, हार और केयूरसे विभूषित रहते हैं, विशाल स्वर्णमयी करधनीसे जिनकी शोभा होती है, जिनकी कान्ति नीले कमलदलके समान श्याम है, जो दो वस्त्र धारण किये रहते हैं और अपने तेजसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमण्डलको आक्रान्त किये रहते हैं, वायुद्वारा घुमायी जाती हुई हवनयुक्त अग्निकी लपटोंकी भँवर-सदृश आकारवाले शरीर-रोमसे संयुक्त हैं तथा जो सभी प्रकारके पुष्पोंसे बनी हुई हवनयुक्त विचित्र एवं विशाल मालाको धारण करते हैं। ध्यान करते ही भगवान् विष्णु शिवजीके नेत्रोंके समक्ष प्रकट हो गये। बुद्धिमान् शंकरने जिस प्रकारके रूपका ध्यान किया था, वे उसी रूपसे प्रकट हुए। उनका वह रूप देवताओंद्वारा भी दुर्निरीक्ष्य था। तब शंकरजी उन देवेश्वरको प्रणाम कर उनकी स्तुति करने लगे॥ ४२–५४॥
शङ्कर उवाचशंकरजी बोले—
नमस्तेऽस्तु जगन्नाथ नरसिंहवपुर्धर।<br>दैत्यनाथासृजापूर्णनखशक्तिविराजित ॥ ५५जगन्नाथ! आप नरसिंहका शरीर धारण करनेवाले हैं और आपकी नखशक्ति दैत्यराज हिरण्यकशिपुके रक्तसे रञ्जित होकर सुशोभित होती है, आपको नमस्कार