मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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७४२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततः सकलसंलग्न हेमपिङ्गलविग्रह।<br>नतोऽस्मि पद्मनाभ त्वां सुरशक्रजगद्गुरो॥ ५६<br>कल्पान्ताम्भोदनिर्घोष सूर्यकोटिसमप्रभ।<br>सहस्रयमसङ्क्रोध सहस्रेन्द्रपराक्रम॥ ५७<br>सहस्रधनदस्फीत सहस्रवरुणात्मक।<br>सहस्रकालरचित सहस्रनियतेन्द्रिय॥ ५८<br>सहस्रभूमहाधैर्य सहस्रानन्तमूर्तिमन्।<br>सहस्रचन्द्रप्रतिम सहस्रग्रहविक्रम॥ ५९<br>सहस्ररुद्रतेजस्क सहस्रब्रह्मसंस्तुत।<br>सहस्रबाहुवेगो ग्र सहस्त्रास्यनिरीक्षण।<br>सहस्रयन्त्रमथन सहस्रवधमोचन॥ ६०<br>अन्धकस्य विनाशाय याः सृष्टा मातरो मया।<br>अनादृत्य तु मद्वाक्यं भक्षयन्त्यद्य ताः प्रजाः॥ ६१<br>कृत्वा ताश्च न शक्तोऽहं संहर्तुमपराजित।<br>स्वयं कृत्वा कथं तासां विनाशमभिकारये॥ ६२ | है। पद्मनाभ! आप सर्वव्यापी हैं, आपका शरीर स्वर्णके समान पीला है और आप देवता, इन्द्र तथा जगत्के गुरु हैं, आपको प्रणाम है। आपका सिंहनाद प्रलयकालीन मेघोंके समान है, आपकी कान्ति करोड़ों सूर्योंके सदृश है, आपका क्रोध हजारों यमराजके तथा पराक्रम सहस्रों इन्द्रके समान है, आप हजारों कुबेरोंसे भी बढ़कर समृद्ध, हजारों वरुणोंके समान, हजारों कालोंद्वारा रचित और हजारों इन्द्रियनिग्रहियोंसे बढ़कर हैं, आपका धैर्य सहस्रों पृथ्वियोंसे भी उत्तम है, आप सहस्रों अनन्तोंकी मूर्ति धारण करनेवाले, सहस्रों चन्द्रमा-सरीखे सौन्दर्यशाली और सहस्रों ग्रहों-सदृश पराक्रमी हैं, आपका तेज हजारों रुद्रोंके समान है, हजारों ब्रह्मा आपकी स्तुति करते हैं, आप हजारों बाहु, मुख और नेत्रवाले हैं, आपका वेग अत्यन्त उग्र है, आप सहस्रों यन्त्रोंको एक साथ तोड़ डालनेवाले तथा सहस्रोंका वध और सहस्रोंको बन्धनमुक्त करनेवाले हैं। भगवन्! अन्धकका विनाश करनेके लिये मैंने जिन मातृकाओंकी सृष्टि की थी, वे सभी आज मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन कर प्रजाओंको खा जानेके लिये उतारू हैं। अपराजित! उन्हें उत्पन्न कर मैं पुन: उन्हींका संहार नहीं कर सकता। स्वयं उत्पन्न करके भला मैं उनका विनाश कैसे करूँ॥ ५५—६२॥ |
| एवमुक्तः स रुद्रेण नरसिंहवपुर्धरः।<br>ससर्ज देवो जिह्वायास्तदा वागीश्वरीं हरिः॥ ६३<br>हृदयाच्च तथा माया गुह्याच्च भवमालिनी।<br>अस्थिभ्यश्च तथा काली सृष्टा पूर्वं महात्मना॥ ६४<br>यया तद्रुधिरं पीतमन्धकानां महात्मनाम्।<br>या चास्मिन् कथिता लोके नामतः शुष्करेवती॥ ६५ | रुद्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर नरसिंह-विग्रहधारी भगवान् श्रीहरिने अपनी जीभसे वागीश्वरीको, हृदयसे मायाको, गुह्यप्रदेशसे भवमालिनीको और हड्डियोंसे कालीको प्रकट किया। उन महात्माने इस कालीकी सृष्टि पहले भी की थी, जिसने महान् आत्मबलसे सम्पन्न अन्धकोंके रुधिरका पान किया था और जो इस लोकमें शुष्करेवती नामसे प्रसिद्ध है। |
| द्वात्रिंशन्मातरः सृष्टा गात्रेभ्यश्चक्रिणा ततः।<br>तासां नामानि वक्ष्यामि तानि मे गदतः शृणु॥ ६६<br>सर्वास्तास्तु महाभागा घण्टाकर्णी तथैव च।<br>त्रैलोक्यमोहिनी पुण्या सर्वसत्त्ववशङ्करी॥ ६७<br>तथा च चक्रहृदया पञ्चमी व्योमचारिणी।<br>शङ्खिनी लेखिनी चैव कालसंकर्षणी तथा॥ ६८<br>इत्येताः पृष्ठगा राजन् वागीशानुचराः स्मृताः।<br>संकर्षणी तथाश्वत्था बीजभावापराजिता॥ ६९<br>कल्याणी मधुदंष्ट्री च कमलोत्पलहस्तिका।<br>इति देव्यष्टकं राजन् मायानुचरमुच्यते॥ ७० | इसी प्रकार सुदर्शन चक्रधारी भगवान्ने अपने अङ्गोंसे बत्तीस अन्य मातृकाओंकी सृष्टि की, वे सभी महान् भाग्यशालिनी थीं। मैं उनके नामोंका वर्णन कर रहा हूँ, तुम उन्हें मुझसे श्रवण करो। उनके नाम हैं—घण्टाकर्णी, त्रैलोक्यमोहिनी, पुण्यमयी सर्वसत्त्ववशंकरी, चक्रहृदया, पाँचवीं व्योमचारिणी, शङ्खिनी, लेखिनी और काल-संकर्षणी। राजन्! ये वागीश्वरीके पीछे चलनेवाली उनकी अनुचरी कही गयी हैं। राजन्! संकर्षणी, अश्वत्था, बीजभावा, अपराजिता, कल्याणी, मधुदंष्ट्री, कमला और उत्पलहस्तिका—ये आठों देवियाँ मायाकी अनुचरी कहलाती हैं। |