मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १८० * | ७४९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सकलभुवनभर्ता लोकनाथस्तदानीं<br>तुहिनशिखरिपुत्र्याः सार्द्धमिष्टैर्गणेशैः ।<br>विविधतरुविशालं मत्तहृष्टान्यपुष्ट-<br>मुपवनतरुरम्यं दर्शयामास देव्याः ॥ ४४ | इस प्रकार समस्त भुवनोंके पालक जगदीश्वर शंकरने अपने प्रिय गणेश्वरोंको साथ लेकर उस विविध प्रकारके विशाल वृक्षोंसे युक्त तथा उन्मत्त और हर्ष प्रदान करनेवाले उपवनको हिमालयकी पुत्री पार्वतीदेवीको दिखाया ॥ ३८—४४ ॥ |
| देव्युवाच<br>उद्यानं दर्शितं देव शोभया परया युतम् ।<br>क्षेत्रस्य तु गुणान् सर्वान् पुनर्वक्तुमिहार्हसि ॥ ४५<br>अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्यमविमुक्तस्य तत्त्वतः ।<br>श्रुत्वापि हि न मे तृप्तिरतो भूयो वदस्व मे ॥ ४६ | देवीने पूछा— देव! अनुपम शोभासे युक्त इस उद्यानको तो आपने दिखला दिया। अब आप पुनः इस क्षेत्रके सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन कीजिये। इस क्षेत्रका तथा अविमुक्तका माहात्म्य सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हो रही है, अतः आप पुनः मुझसे वर्णन कीजिये ॥ ४५-४६ ॥ |
| देवदेव उवाच<br>इदं गुह्यतमं क्षेत्रं सदा वाराणसी मम ।<br>सर्वेषामेव भूतानां हेतुर्मोक्षस्य सर्वदा ॥ ४७<br>अस्मिन् सिद्धाः सदा देवि मदीयं व्रतमास्थिताः ।<br>नानालिङ्गधरा नित्यं मम लोकाभिकाङ्क्षिणः ॥ ४८<br>अभ्यस्यन्ति परं योगं मुक्तात्मानो जितेन्द्रियाः ।<br>नानावृक्षसमाकीर्णे नानाविहगकूजिते ॥ ४९<br>कमलोत्पलपुष्पाढ्यैः सरोभिः समलङ्कृते ।<br>अप्सरोगणगन्धर्वैः सदा संसेविते शुभे ॥ ५०<br>रोचते मे सदा वासो येन कार्येण तच्छृणु ।<br>मन्मना मम भक्तश्च मयि सर्वार्पितक्रियः ॥ ५१<br>यथा मोक्षमिहाप्नोति ह्यान्यत्र न तथा क्वचित् ।<br>एतन्मम पुरं दिव्यं गुह्याद् गुह्यतरं महत् ॥ ५२<br>ब्रह्मादयस्तु जानन्ति येऽपि सिद्धा मुमुक्षवः ।<br>अतः प्रियतमं क्षेत्रं तस्माच्चेह रतिर्मम ॥ ५३<br>विमुक्तं न मया यस्मान्मोक्ष्यते वा कदाचन ।<br>महत् क्षेत्रमिदं तस्मादविमुक्तमिदं स्मृतम् ॥ ५४<br>नैमिषेऽथ कुरुक्षेत्रे गङ्गाद्वारे च पुष्करे ।<br>स्नानात् संसेविताद् वापि न मोक्षः प्राप्यते यतः ॥ ५५<br>इह सम्प्राप्यते येन तत एतद् विशिष्यते ।<br>प्रयागे च भवेन्मोक्ष इह वा मत्परिग्रहात् ॥ ५६ | देवाधिदेव शंकर बोले— देवि! मेरा यह वाराणसी क्षेत्र परम गुह्य है। यह सर्वदा सभी प्राणियोंके मोक्षका कारण है। देवि! इस क्षेत्रमें नाना प्रकारका स्वरूप धारण करनेवाले नित्य मेरे लोकके अभिलाषी मुक्तात्मा जितेन्द्रिय सिद्धगण मेरा व्रत धारण कर परम योगका अभ्यास करते हैं। अब इस नाना प्रकारके वृक्षोंसे व्याप्त, अनेकविध पक्षियोंद्वारा निनादित, कमल और उत्पलके पुष्पोंसे भरे हुए सरोवरोंसे सुशोभित और अप्सराओं तथा गन्धर्वोंद्वारा सदा संसेवित इस शुभमय उपवनमें जिस हेतुसे मुझे सदा निवास करना अच्छा लगता है, उसे सुनो। मेरा भक्त मुझमें मन लगाकर और सारी क्रियाएँ मुझमें समर्पित कर इस क्षेत्रमें जैसी सुगमतासे मोक्ष प्राप्त कर सकता है, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं प्राप्त कर सकता। यह मेरी महान् दिव्य नगरी गुह्यसे भी गुह्यतर है। ब्रह्मा आदि जो सिद्ध मुमुक्षु हैं, वे इसके विषयमें पूर्णरूपसे जानते हैं। अतः यह क्षेत्र मुझे परम प्रिय है और इसी कारण इसके प्रति मेरी विशेष रति है। चूँकि मैं कभी भी इस विमुक्त क्षेत्रका त्याग नहीं करता, इसलिये यह महान् क्षेत्र अविमुक्त नामसे कहा जाता है। नैमिष, कुरुक्षेत्र, गङ्गाद्वार और पुष्करमें निवास करने तथा स्नान करनेसे यदि मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती तो इस क्षेत्रमें वह प्राप्त हो जाता है, इसीलिये यह उनसे विशिष्ट है। प्रयागमें अथवा मेरा आश्रय ग्रहण करनेसे काशीमें मोक्ष प्राप्त हो जाता है ॥ ४७—५६ ॥ |