मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
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| ७५० | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| प्रयागादपि तीर्थाग्र्यादिदमेव महत् स्मृतम्।<br>जैगीषव्यः परां सिद्धिं योगतः स महातपाः॥ ५७<br>अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्याद् भक्त्या च मम भावनात्।<br>जैगीषव्यो मुनिश्रेष्ठो योगिनां स्थानमिष्यते॥ ५८<br>ध्यायत्तस्तत्र मां नित्यं योगाग्निर्द्रीप्यते भृशम्।<br>कैवल्यं परमं याति देवानाम्पि दुर्लभम्॥ ५९<br>अव्यक्तलिङ्गैर्मुनिभिः सर्वसिद्धान्तवेदिभिः।<br>इह सम्प्राप्यते मोक्षो दुर्लभो देवदानवैः॥ ६०<br>तेभ्यश्चाहं प्रयच्छामि भोगैश्वर्यमनुत्तमम्।<br>आत्मनश्चैव सायुज्यमीप्सितं स्थानमेव च॥ ६१<br>कुबेरस्तु महायक्षस्तथा सर्वार्पितक्रियः।<br>क्षेत्रसंवसनादेव गणेशत्वमवाप ह॥ ६२<br>संवर्तो भविता यश्च सोऽपि भक्त्या ममैव तु।<br>इहैवाराध्य मां देवि सिद्धिं यास्यत्यनुत्तमाम्॥ ६३<br>पाराशरसुतो योगी ऋषिर्व्यासो महातपाः।<br>धर्मकर्ता भविष्यश्च वेदसंस्थाप्रवर्तकः॥ ६४<br>रंस्यते सोऽपि पद्माक्षि क्षेत्रेऽस्मिन् मुनिपुङ्गवः।<br>ब्रह्मा देवर्षिभिः सार्धं विष्णुर्वायुर्दिवाकरः॥ ६५<br>देवराजस्तथा शक्रो येऽपि चान्ये दिवौकसः।<br>उपासन्ते महात्मानः सर्वे मामेव सुव्रते॥ ६६<br>अन्येऽपि योगिनः सिद्धाश्छन्नरूपा महाव्रताः।<br>अनन्यमनसो भूत्वा मामिहोपासते सदा॥ ६७ | यह तीर्थश्रेष्ठ प्रयागसे भी महान् कहा जाता है। महातपस्वी जैगीषव्य मुनि यहाँ परा सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं। मुनिश्रेष्ठ जैगीषव्य इस क्षेत्रके माहात्म्यसे तथा भक्तिपूर्वक मेरी भावना करनेसे योगियोंके स्थानको प्राप्त कर लिये हैं। वहाँ नित्य मेरा ध्यान करनेसे योगाग्नि अत्यन्त उदीप्त हो जाती है, जिससे देवताओंके लिये भी परम दुर्लभ कैवल्य पद प्राप्त हो जाता है। यहाँ सम्पूर्ण सिद्धान्तोंके ज्ञाता एवं अव्यक्त चिह्नवाले मुनियोंद्वारा देवों और दानवोंके लिये दुर्लभ मोक्ष प्राप्त कर लिया जाता है। मैं ऐसे मुनियोंको सर्वोत्तम भोग, ऐश्वर्य, अपना सायुज्य और मनोवाञ्छित स्थान प्रदान करता हूँ। महायक्ष कुबेर, जिन्होंने अपनी सारी क्रियाएँ मुझे अर्पित कर दी थीं, इस क्षेत्रमें निवास करनेके कारण ही गणाधिपत्यको प्राप्त हुए हैं। देवि! जो संवर्तनामक ऋषि होंगे, वे भी मेरे ही भक्त हैं। वे यहीं मेरी आराधना करके सर्वश्रेष्ठ सिद्धि प्राप्त करेंगे। पद्माक्षि! जो योगसम्पन्न, धर्मके नियामक और वैदिक कर्मकाण्डके प्रवर्तक होंगे, महातपस्वी मुनिश्रेष्ठ पराशरनन्दन महर्षि व्यास भी इसी क्षेत्रमें निवास करेंगे। सुव्रते! देवर्षियोंके साथ ब्रह्मा, विष्णु, वायु, सूर्य, देवराज इन्द्र तथा जो अन्यान्य देवता हैं, सभी महात्मा मेरी ही उपासना करते हैं। दूसरे भी योगी, सिद्ध, गुप्त रूपधारी एवं महाव्रती अनन्यचित्त होकर यहाँ सदा मेरी उपासना करते हैं॥ ५७—६७॥ |
| अलर्कश्च पुरीमेतां मत्प्रसादादवाप्स्यति।<br>स चैनां पूर्ववत्कृत्वा चातुर्वर्ण्याश्रमाकुलाम्॥ ६८<br>स्फीतां जनसमाकीर्णां भक्त्या च सुचिरं नृपः।<br>मयि सर्वार्पितप्राणो मामेव प्रतिपत्स्यते॥ ६९<br>ततः प्रभृति चार्वङ्गि येऽपि क्षेत्रनिवासिनः।<br>गृहिणो लिङ्गिनो वापि मद्भक्ता मत्परायणाः॥ ७०<br>मत्प्रसादाद् भजिष्यन्ति मोक्षं परमदुर्लभम्।<br>विषयासक्तचित्तोऽपि त्यक्तधर्मरतिर्नरः॥ ७१<br>इह क्षेत्रे मृतः सोऽपि संसारं न पुनविशेत्।<br>ये पुनर्निर्ममा धीराः सत्त्वस्था विजितेन्द्रियाः॥ ७२ | अलर्क भी मेरी कृपासे इस पुरीको प्राप्त करेंगे। वे नरेश इसे पहलेकी तरह चारों वर्णों और आश्रमोंसे युक्त, समृद्धिशालिनी और मनुष्योंसे परिपूर्ण कर देंगे। तत्पश्चात् चिरकालतक भक्तिपूर्वक मुझमें प्राणोंसहित अपना सर्वस्व समर्पित करके मुझे ही प्राप्त कर लेंगे। सुन्दर अङ्गोंवाली देवि! तभीसे इस क्षेत्रमें निवास करनेवाले जो भी मत्परायण मेरे भक्त, चाहे वे गृहस्थ हों अथवा संन्यासी, मेरी कृपासे परम दुर्लभ मोक्षको प्राप्त कर लेंगे। जो मनुष्य धर्मत्यागका प्रेमी और विषयोंमें आसक्त चित्तवाला भी हो, वह भी यदि इस क्षेत्रमें प्राणत्याग करता है तो उसे पुनः संसारमें नहीं आना पड़ता। सुव्रते! फिर जो ममतारहित, धैर्यशाली, पराक्रमी, जितेन्द्रिय, |