मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १८० * | ७५१ |
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| व्रतिनश्च निरारम्भाः सर्वे ते मयि भाविताः।<br>देहभङ्गं समासाद्य धीमन्तः सङ्गवर्जिताः।<br>गता एव परं मोक्षं प्रसादान्मम सुव्रते॥ ७३<br>जन्मान्तरसहस्रेषु युञ्जन् योगमवाप्नुयात्।<br>तमिहैव परं मोक्षं मरणादधिगच्छति॥ ७४<br>एतत् संक्षेपतो देवि क्षेत्रस्यास्य महत्फलम्।<br>अविमुक्तस्य कथितं मया ते गुह्यमुत्तमम्॥ ७५<br>अतः परतरं नास्ति सिद्धिगुह्यं महेश्वरि।<br>एतद् बुध्यन्ति योगज्ञा ये च योगेश्वरा भुवि॥ ७६<br>एतदेव परं स्थानमेतदेव परं शिवम्।<br>एतदेव परं ब्रह्म एतदेव परं पदम्॥ ७७<br>वाराणसी तु भुवनत्रयसारभूता<br>रम्या सदा मम पुरी गिरिराजपुत्रि।<br>अत्रागता विविधदुष्कृतकारिणोऽपि<br>पापक्षयाद् विरजसः प्रतिभान्ति मर्त्याः॥ ७८<br>एतत्स्मृतं प्रियतमं मम देवि नित्यं<br>क्षेत्रं विचित्रतरुगुल्मलतासुपुष्पम्।<br>अस्मिन् मृतास्तनुभृतः पदमाप्नुवन्ति<br>मूर्खागमेन रहितापि न संशयोऽत्र॥ ७९ | व्रतधारी, आरम्भरहित, बुद्धिमान् और आसक्तिहीन हैं, वे सभी मुझमें मन लगाकर यहाँ शरीरका त्याग करके मेरी कृपासे परम मोक्षको ही प्राप्त हुए हैं। हजारों जन्मोंमें योगका अभ्यास करनेसे जो मोक्ष प्राप्त होता है, वह परम मोक्ष यहाँ मरनेसे ही प्राप्त हो जाता है। देवि! मैंने तुमसे इस अविमुक्त क्षेत्रके इस उत्तम, गुह्य एवं महान् फलको संक्षेपरूपसे वर्णन किया है। महेश्वरि! भूतलपर इससे बढ़कर सिद्धिदाता दूसरा कोई गुह्य स्थान नहीं है। इसे जो योगेश्वर एवं योगके ज्ञाता हैं, वे ही जानते हैं। यही परमोत्कृष्ट स्थान है, यही परम कल्याणकारक है, यही परब्रह्म है और यही परमपद है। गिरिराजपुत्रि! मेरी रमणीय वाराणसीपुरी तो सदा त्रिभुवनकी सारभूता है। अनेकों प्रकारके पाप करनेवाले मानव भी यहाँ आकर पापोंके नष्ट हो जानेसे पापमुक्त हो सुशोभित होने लगते हैं। देवि! विचित्र वृक्षों, गुल्मों, लताओं और सुगन्धित पुष्पोंसे युक्त यह क्षेत्र मेरे लिये सदा प्रियतम कहा जाता है। वेदाध्ययनसे रहित मूर्ख प्राणी भी यदि यहाँ मरते हैं तो परम पदको प्राप्त हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है॥ ६८—७९॥ |
| सूत उवाच<br>एतस्मिन्नन्तरे देवो देवीं प्राह गिरीन्द्रजाम्।<br>दातुं प्रसादाद् यक्षाय वरं भक्ताय भामिनि॥ ८०<br>भक्तो मम वरारोहे तपसा हतकिल्बिषः।<br>अहो वरमसौ लब्धुमस्मत्तो भुवनेश्वरि॥ ८१<br>एवमुक्त्वा ततो देवः सह देव्या जगत्पतिः।<br>जगाम यक्षो यत्रास्ते कृशो धमनिसन्ततः॥ ८२<br>ततस्तं गुह्यकं देवी दृष्टिपातैर्निरीक्षती।<br>श्वेतवर्णं विचर्माणं स्नायुबद्धास्थिपञ्जरम्॥ ८३<br>देवी प्राह तदा देवं दर्शयन्ती च गुह्यकम्।<br>सत्यं नाम भवानुग्रो देवैरुक्तस्तु शङ्कर॥ ८४<br>ईदृशे चास्य तपसि न प्रयच्छसि यद्वरम्।<br>अतः क्षेत्रे महादेव पुण्ये सम्यगुपासिते॥ ८५<br>कथमेवं परिक्लेशं प्राप्तो यक्षकुमारकः।<br>शीघ्रमस्य वरं यच्छ प्रसादात् परमेश्वर॥ ८६<br>एवं मन्वादयो देव वदन्ति परमर्षयः।<br>रुष्टाद् वा चाथ तुष्टाद् वा सिद्धिस्तुभयतो भवेत्।<br>भोगप्राप्तिस्तथा राज्यमन्ते मोक्षः सदाशिवात्॥ ८७ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इसी बीच महादेवजीने गिरिराजकुमारी पार्वतीदेवीसे भक्तराज यक्षको कृपारूप वर प्रदान करनेके लिये यों कहा—'भामिनि! वह मेरा भक्त है। वरारोहे! तपस्यासे उसके पाप नष्ट हो चुके हैं, अतः भुवनेश्वरि! वह अब हमलोगोंसे वर प्राप्त करनेका अधिकारी हो गया है।' तदनन्तर ऐसा कहकर जगदीश्वर महादेव पार्वतीदेवीके साथ उस स्थानके लिये चल पड़े, जहाँ धमनियोंसे व्याप्त दुर्बल यक्ष वर्तमान था। वहाँ पहुँचकर पार्वती देवी दृष्टि घुमाकर उस गुह्यककी ओर देखने लगीं, जिसका शरीर श्वेत रङ्गका हो गया था, चमड़ा गल गया था और अस्थिपंजर नसोंसे आबद्ध था। तब उस गुह्यकको दिखलाती हुई देवीने महादेवजीसे कहा—'शंकर! इस प्रकारकी घोर तपस्यामें निरत इसे आप जो वर नहीं प्रदान कर रहे हैं, इस कारण देवतालोग आपको जो अत्यन्त निष्ठुर बतलाते हैं, वह सत्य ही है। महादेव! इस पुण्यक्षेत्रमें भलीभाँति उपासना करनेपर भी इस यक्षकुमारको इस प्रकारका महान् कष्ट कैसे प्राप्त हुआ? अतः परमेश्वर! कृपा करके इसे शीघ्र ही वरदान दीजिये। देव! मनु आदि परमर्षि ऐसा कहते हैं कि सदाशिव चाहे रुष्ट हों अथवा तुष्ट—दोनों प्रकारसे उनसे सिद्धि, भोगकी प्राप्ति, राज्य तथा अन्तमें मोक्षकी प्राप्ति होती ही है।' |